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Chandigarh News: जीएसटी घटा पर राहत नहीं... कंपनियों ने बेस प्राइस बढ़ा दी

Wed, 29 Oct 2025 01:34 AM IST
Chandigarh Bureau चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Wed, 29 Oct 2025 01:34 AM IST
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GST reduced but no relief... companies increased the base price

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चंडीगढ़। गुड्स एंड सर्विस टैक्स (जीएसटी) के नए स्लैब लागू होने के बाद आम लोगों को कीमतों में राहत की उम्मीद थी लेकिन बाजार में तस्वीर उलटी है। कंपनियों ने टैक्स दरों में कमी लागू होने से पहले ही अपने उत्पादों की बेस प्राइस बढ़ा दी जिसके चलते उपभोक्ताओं तक राहत पहुंचने के बजाय महंगाई और बढ़ गई है।
दैनिक जरूरत के सामान जैसे घी, रिफाइंड, ड्राईफ्रूट, साबुन और शैंपू के दाम अब भी ऊंचे हैं। होलसेल कारोबारियों का कहना है कि जब उन्हें माल पहले से महंगा मिल रहा है तो वे उपभोक्ताओं को सस्ते दाम पर सामान नहीं बेच सकते।
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सेक्टर-26 मंडी के कारोबारी देवेंद्र कुमार ने बताया कि केरका घी जो पहले 580 रुपये में मिल रहा था, अब 600 रुपये का हो गया है। कंपनियों ने टैक्स कम होने से पहले ही बेस प्राइस 20 रुपये बढ़ा दी। इसी तरह बादाम जो पहले 680 रुपये किलो आता था, अब 750 रुपये किलो में मिल रहा है। कारोबारी कहते हैं कि टैक्स घटा जरूर है पर कंपनियों ने पहले ही रेट बढ़ाकर संतुलन बिगाड़ दिया।
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रिफाइंड और ड्राईफ्रूट भी नहीं बचे महंगाई से
होलसेल कारोबारी राहुल गोयल ने बताया कि रिफाइंड का पैकेट जो पहले 104 रुपये का था, अब 109 रुपये का हो गया है। इतना ही नहीं, 850 एमएल का पैक अब 750 एमएल में बेच रहे हैं। यानी रेट थोड़ा घटाकर मात्रा कम कर दी गई है। ब्रांडेड पिस्ता का भाव भी 980 रुपये से बढ़कर 1125 रुपये किलो तक पहुंच गया है।
शैंपू और साबुन के दामों में भी बढ़ोतरी
शैंपू जो पहले 70 रुपये में आता था, अब 80 रुपये का हो गया है जबकि इसका जीएसटी स्लैब 18 से घटाकर 5 फीसदी कर दिया गया था। कारोबारी आशीष ने बताया कि पतंजलि जैसी कुछ कंपनियों ने बेस प्राइस घटाकर नया रेट जारी किया है, लेकिन ज्यादातर बड़ी कंपनियों ने उपभोक्ताओं को कोई राहत नहीं दी। उधर, कंपनियों ने रेट बढ़ाने के लिए निर्माण लागत बढ़ने का हवाला दिया है। कई कच्चे माल पर जीएसटी 12 से बढ़ाकर 18 फीसदी कर दिया गया है। यहां तक कि कोयले पर टैक्स 5 से बढ़ाकर 18 फीसदी कर दिया गया, जिससे उत्पादन खर्च बढ़ गया है।

उपभोक्ताओं में नाराजगी
इस बारे में लोगों का कहना है कि सरकार की नीतियों से राहत मिलने की जगह कंपनियों ने टैक्स घटने की खुशी भी छीन ली। उपभोक्ता संगठन अब मांग कर रहे हैं कि सरकार एमआरपी में पारदर्शिता लाने और कंपनियों की ओर से की गई बेस प्राइस वृद्धि की समीक्षा करे।
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