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पंजाब में जातीय समीकरण: दलित आबादी पर सभी का फोकस, चार आरक्षित सीटों पर सभी दलों ने लगाई ताकत
Sat, 13 Apr 2024 10:45 AM IST
निवेदिता वर्मा
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर (पंजाब)
Published by: निवेदिता वर्मा
Updated Sat, 13 Apr 2024 10:45 AM IST
सार
पंजाब की राजनीति इस बात की गवाह रही है कि दलितों का समूचा वोट कभी भी किसी एक पार्टी को नहीं पड़ा है। इसके कई कारण हैं। पंजाब में दलित भाईचारा 39 जातियों में बंटा हुआ है। उनके आपसी हित भी टकराते हैं। पंजाब में दलितों की मुख्य जातियों में रामदासिया, रविदास समाज, मजहबी व मजहबी सिख, वाल्मीकि समाज, भगत अथवा कबीरपंथी प्रमुख हैं।
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विस्तार
पंजाब में दलितों की आबादी करीब 32 फीसदी से अधिक है, जो अन्य राज्यों से सबसे ज्यादा है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह आबादी 37 फीसदी तक हो जाती है। दोआबा क्षेत्र के कई इलाकों में यह अनुपात 45 से 50 फीसदी तक चला जाता है। इस बार सभी राजनीतिक दलों का फोकस चार आरक्षित सीटों पर हो गया है। इसके लिए उन्होंने पूरी ताकत लगा दी है। पंजाब की अधिकतर सीटों पर जीत-हार का फैसला दलित वोटरों के हाथ रहता है।
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मालवा-माझा में मजहबी सिख अधिक
मालवा व माझा में मजहबी सिख बड़ी तादाद में हैं। दोआबा में ज्यादातर रविदास और वाल्मीकि समाज की आबादी है। रविदास समाज कांग्रेस का परंपरागत वोट बैंक रहा है, लेकिन 1997 के बाद रविदासिया समाज ने किसी एक पार्टी के हित में वोट नहीं किया है। शिरोमणि अकाली दल, बसपा, कांग्रेस व भाजपा को वोट बांटकर देते रहे हैं। पंजाब की दलित राजनीति में गर्माहट उस समय आई, जब 2021 में कांग्रेस ने पंजाब में दलित नेता चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बना दिया और 2022 में कांग्रेस ने चरणजीत सिंह चन्नी को दलित मुख्यमंत्री के तौर पर पेश किया, लेकिन इसका फायदा कांग्रेस को सिर्फ दोआबा इलाके में ही मिला। दोआबा क्षेत्र में 23 में से कांग्रेस ने नौ सीटें जीती थीं।
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1996 में शिअद-बसपा गठबंधन ने जीती थीं 11 सीटें
1996 के लोकसभा चुनाव में भी शिरोमणि अकाली दल ने बसपा के साथ गठबंधन किया था। अकाली-बसपा गठबंधन ने पंजाब की कुल 13 सीटों में से 11 सीटें जीती थीं। शिरोमणि अकाली दल के हिस्से आठ, जबकि बसपा के हिस्से तीन सीटें आई थीं। इनमें से होशियारपुर सीट से बसपा के संस्थापक कांशीराम विजयी हुए थे, फिरोजपुर से मोहन सिंह और फिल्लौर से हरभजन सिंह लाखा ने अपनी सीटें जीत कर बसपा की झोली में डालीं। उस चुनाव में कांग्रेस को सिर्फ दो सीटें मिली थीं। इस जीत के कुछ महीने बाद ही बसपा को बिना बताए अकाली दल ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर लिया और बसपा से अपना नाता तोड़ लिया, जिससे कांशीराम बहुत हताश हुए। अकाली दल ने बिना शर्त केंद्र में बीजेपी को समर्थन दिया था। पंजाब में चार दलित लोकसभा की सीटें आरक्षित हैं, जिसमें जालंधर, होशियारपुर, फरीदकोट व फतेहगढ़ साहिब हैं।
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होशियारपुर: आप से चब्बेवाल मैदान में, अन्य पार्टियां खोज रहीं मजबूत उम्मीदवार
होशियारपुर सीट के अंतर्गत कुल नौ विधानसभा की सीटें आती हैं। इनमें से चार विधानसभा सीटें (श्री हरगोबिंदपुर, फगवाड़ा, शाम चौरासी, चब्बेवाल) की सीटें एससी समुदाय के लोगों के लिए आरक्षित हैं। 1996 में बहुजनों के नायक कांशी राम यहां से सांसद चुने गए। 1996-1998 तक कांशीराम ने इस सीट का प्रतिनिधित्व किया। उनके बाद यह सीट अधिकतर समय भारतीय जनता पार्टी के पास रही। 2014 में इस सीट से भारतीय जनता पार्टी के विजय सांपला सांसद चुने गए तो 2019 में पार्टी के अहम नेता सोम प्रकाश बतौर सांसद इस सीट से दिल्ली पहुंचे। इस सीट पर भाजपा अपनी हैट्रिक लगाने के लिए पूरी ताकत लगाने की तैयारी कर रही है। यहां से पूर्व डीजीपी इकबाल प्रीत सहोता का नाम भाजपा कार्यालय में चल रहा है, जबकि सोमप्रकाश दोबारा टिकट हासिल करने के लिए दिल्ली में जोर लगा रहे हैं। कांग्रेस के संभावित उम्मीदवार राजकुमार चब्बेवाल आप की तरफ जाकर वहां पर उम्मीदवार बन चुके हैं। कांग्रेस वहां से किसी दमदार चेहरे की तलाश कर रही है और अकाली दल पहली बार अकेले इस सीट पर चुनाव लड़ने जा रहा है।
फरीदकोट: यहां कलाकारों के बीच ही होगा मुकाबाला
फरीदकोट सीट के अंतर्गत 9 विधानसभा सीटें हैं। इनमें से 2 सीटें (निहाल सिंह वाला, जैतों) फिलहाल एससी समुदाय के लोगों के लिए आरक्षित है। 2004 में इस सीट से सुखबीर सिंह बादल, 2009 में परमजीत कौर गुलशन, बतौर शिरोमणि अकाली दल के प्रत्याशी जीत दर्ज कर सदन पहुंचे। 2014 का चुनाव कई लोगों के लिए चौंकाने वाला था। पंजाब की इस सीट से साधू सिंह आम आदमी पार्टी की सीट पर चुनाव जीत कर जब सदन पहुंचे तो कई राजनीतिक पंडितों के लिए ये चौंकाने वाला फैसला था। हालांकि, 2019 में आम आदमी पार्टी इस सीट को बरकरार नहीं रख पाई और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के मोहम्मद सद्दीक विजयी हो गए। भाजपा इस सीट पर पहली बार उतरने जा रही है और वहां से हंसराज हंस को मैदान में उतारा है। कांग्रेस के लिए इस सीट को दोबारा जीतना एक बड़ी चुनौती है। आप ने कलाकार कर्मजीत अनमोल को मैदान में उतारकर हंसराज हंस को कड़ी चुनौती दी है।
जालंधर: भाजपा ने रिंकू को उतारा, कांग्रेस में चन्नी का नाम, आप-शिअद में मंथन
जालंधर आरक्षित सीट इस बार सबसे हॉट बनने जा रही है। यहां से आप के इकलौते सांसद सुशील रिंकू भाजपा की टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, जबकि कांग्रेस चरणजीत सिंह चन्नी को मैदान में उतारने जा रही है। यह सीट कांग्रेस के वर्चस्व की सीट है, जहां पर कांग्रेस 2023 के उपचुनाव में हार गयी थी और आप के सुशील रिंकू जीत गए थे। कांग्रेस अपनी खोई हुई सीट को दोबारा पाने के लिए ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है, जबकि अकाली दल किसी मजबूत चेहरे की तलाश में है। आप भी ऐसे चेहरे पर मंथन कर रही है, जो उनकी उपचुनाव में जीती सीट को वापस दिला सके। लिहाजा, जालंधर पर तमाम नेताओं व दिग्गजों का पूरा फोकस है।
फतेहगढ़ साहिब: कांग्रेस से आए जीपी को उतार आप ने बिगाड़ा समीकरण
फतेहगढ़ साहिब सीट 2009 में ही अस्तित्व में आई। अब तक कुल तीन सांसद इस सीट से चुने गए हैं। दो बार ये सीट कांग्रेस के पास गई। 2009 में कांग्रेस से सुखदेव सिंह लिबरा और 2019 में अमर सिंह इस सीट से चुनाव जीतकर सदन पहुंचे। वहीं, 2014 के आम चुनाव में एक दफा इस सीट से आम आदमी पार्टी की टिकट पर हरिंदर सिंह खालसा लोकसभा पहुंचे।
2019 के आम चुनाव की बात करें तो इस सीट पर मुख्य मुकाबला कांग्रेस के अमर सिंह और शिरोमणि अकाली दल के दरबारा सिंह गुरु के बीच हुआ था। कांग्रेस के अमर सिंह जीत गए थे। इस सीट पर कांग्रेस अपनी जीत बरकरार रखने के लिए पूरी रणनीति बना रही है। दलितों की आबादी मतदाताओं की कुल आबादी 33 फीसदी के करीब है।
फतेहगढ़ साहिब लोकसभा सीट पर कांग्रेस के शमशेर सिंह दूलो व मौजूदा सांसद डॉ. अमर सिंह के बीच टिकट को लेकर मुकाबला है। शमशेर सिंह दूलो पंजाब से कांग्रेस के राज्यसभा सदस्य रह चुके हैं। दूलो 2019 में फतेहगढ़ साहिब सीट से कांग्रेस का टिकट चाहते थे, लेकिन पार्टी ने उनकी जगह डॉ. अमर सिंह को कैंडिडेट बनाया। चुनाव में डॉ. अमर सिंह विजयी भी रहे। टिकट न मिलने के कारण शमशेर सिंह दूलो तब पार्टी से नाराज हो गए थे। उन्होंने पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह पर जमकर भड़ास भी निकाली थी। इस बार आप ने फतेहगढ़ साहब से कांग्रेस से दमदार चेहरे गुरप्रीत सिंह जीपी को अपनी पार्टी में शामिल कर लोकसभा की टिकट दे दी है। 2014 के इतिहास को आप दोहराने के लिए पूरी ताकत झोंकने की तैयारी कर रही है। वहीं भाजपा व अकाली दल भी मजबूत चेहरे की तलाश में हैं। लोकसभा के पूर्व डिप्टी स्पीकर चरणजीत सिंह अटवाल के बेटे रिंकू अटवाल पर भाजपा दांव खेल सकती है। डॉ. दीपक ज्योति भी टिकट की रेस में हैं। अकाली दल की तरफ से दरबारा सिंह खालसा, दरबारा सिंह गुरु भी टिकट की दौड़ में हैं।