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किसान आंदोलन के एक साल: टीकरी बॉर्डर पर महापंचायत में जुटे लाखों किसान, कृषि कानूनों की वापसी का मना रहे जश्न

Fri, 26 Nov 2021 01:19 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: ajay kumar Updated Fri, 26 Nov 2021 01:19 PM IST
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Farmers hold Kisan Mahapanchayat on the first anniversary of protests against the three farm laws at Bahadurgarh
किसान महापंचायत में पहुंचीं महिलाएं। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

भारतीय किसान यूनियन एकता (उगराहां) ने टीकरी बॉर्डर पर आंदोलन का एक वर्ष पूरा होने के अवसर पर बहादुरगढ़ में नयागांव के पकोड़ा चौक पर विशाल रैली की। कृषि अधिनियमों के निरस्त होने की घोषणा के बाद विजयी नारे के साथ कार्यक्रम स्थल पहुंचे पंजाब और हरियाणा के किसानों व महिलाओं ने कृषि कानून रद्द होने की घोषणा पर जश्न मनाया। सभी मांगें पूरी न होने तक संघर्ष जारी रखने की घोषणा की गई।

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किसान नेताओं के मुताबिक, यह विशाल सभा जीत के उत्सव के साथ-साथ बाकी मांगों के लिए लड़ने का संकल्प भी था। कार्यक्रम की शुरुआत संघर्ष के दौरान शहीद हुए किसानों को श्रद्धांजलि देकर की गई। संत राम उदासी का गीत ..चढन वालियो हक्का दी भेंट उते.. सभी लोगों ने एक स्वर में गाया।
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विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए बीकेयू एकता (उगराहां) के अध्यक्ष जोगिंदर सिंह उगराहां ने कहा कि कृषि कानून को निरस्त करने का निर्णय एक ऐतिहासिक जीत है, जिसे देश के किसानों ने जीता है। लेकिन एमएसपी और सरकारी खरीद समेत बाकी मांगों पर सरकार अब भी खामोश है। संघर्ष का फैसला किसानों की संतुष्टि के अनुसार संसद में कृषि कानूनों को निरस्त करने और शेष मुद्दों के समाधान के बाद ही होगा। तब तक किसान दिल्ली के मोर्चों पर डटे रहेंगे। इस संघर्ष के माध्यम से देशभर के किसानों की एकता को उच्च स्तर पर ले जाने की जरूरत है, ताकि कृषि संकट के समाधान के लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक बड़े किसान आंदोलन का गठन किया जा सके।
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संगठन के राज्य महासचिव सुखदेव सिंह कोकरी कलां ने कहा कि एमएसपी पर सार्वजनिक खरीद और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के मुद्दों को हल नहीं किया जा रहा था, क्योंकि भारतीय अधिकारी विश्व व्यापार संगठन की नीतियों की धज्जियां उड़ा रहे थे। जो कृषि कानून पेश किए गए वे भी इन्हीं नीतियों का परिणाम थे। इसलिए विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने का संबंध इन मुद्दों के समाधान से है। 29 नवंबर से 3 दिसंबर तक जिनेवा में होने वाली संगठन की बैठक के दौरान संगठन भारतीय शासकों को विश्व व्यापार संगठन से बाहर आने के लिए आवाज उठाएगा। इसलिए 29 तारीख को दिल्ली के मोर्चे पर और पूरे पंजाब में सभी मोर्चों पर डब्ल्यूटीओ का पुतला फूंका जाएगा।

संगठन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष झंडा सिंह जेठुके और प्रदेश सचिव सिंगारा सिंह मान ने कहा कि इस संघर्ष ने दिखाया है कि किसान संघर्ष और एकता के बल पर अपना जीवन यापन कर सकते हैं। उन्होंने कहा कि अगर किसानों ने अवसरवादी पार्टियों के प्रति सतर्कता नहीं बरती तो आगामी पंजाब विधानसभा चुनाव राज्य के किसानों की एकता पर हमला साबित हो सकता है। इसलिए उनका संगठन भविष्य में चुनाव के दौरान लोगों से अपनी एकता बनाए रखने का आह्वान करेगा और अपने महत्वपूर्ण और मौलिक मुद्दों को उठाएगा। वोटों से अच्छाई की उम्मीद छोड़ संघर्ष का रास्ता ऊपर उठाने का नारा बुलंद करेगा।

संगठन की महिला विंग की नेता हरिंदर कौर बिंदु ने कहा कि इस संघर्ष को अनुकरणीय बनाने में महिलाओं की बहुत अहम भूमिका है। अगले बड़े संघर्षों के लिए इस भूमिका को और तेज किया जाना चाहिए। महिलाओं को नेताओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियों को निभाने के लिए आगे आना चाहिए।

पंजाब फार्म वर्कर्स यूनियन के राज्य महासचिव लक्ष्मण सिंह सेवेवाला ने कहा कि इस आंदोलन में खेत मजदूरों ने भी हिस्सा लिया और मजदूरों और किसानों की एकता को मजबूत किया गया है। पल्स मंच के प्रदेश अध्यक्ष अमोलक सिंह ने कहा कि पंजाब के लेखकों/कलाकारों ने हमेशा की तरह संघर्ष में अपनी भूमिका निभाई है और लोगों के संघर्ष ने इस गठबंधन को मजबूत किया है।

सभा को प्रमुख मानवाधिकार कार्यकर्ता डॉ. नवशरण, गोहर रजा, शबनम हाशमी, नंदनी सुंदर, पश्चिम बंगाल की संतू दास, हरियाणा की महिला किसान नेता सुशीला, एक पंजाबी दैनिक की वरिष्ठ पत्रकार हमीर सिंह, हरियाणा की रितु कौशिक, राजस्थान की कविता श्रीवास्तव, रामशरण जोशी, प्रो. अरजमंद आरा, सुभाष अली, रामचंद, शिक्षक नेता सुखविंदर सिंह सुखी ने भी संबोधित किया। इस अवसर पर बीकेयू एकता (उगराहां) के प्रदेश उपाध्यक्ष जसविंदर सिंह लौंगोवाल, हरदीप सिंह तालेवाल, जनक सिंह भूटाल, जगतार सिंह कालाझार, कथाकार अतरजीत सिंह, डॉ. मनजिंदर सरन भी मौजूद थे।
 

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