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‘संध्या छाया’ में झलका शहीदों के परिजनों का अकेलापन
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Fri, 25 Nov 2016 01:14 AM IST
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संध्या छाया नाटक का मंचन
- फोटो : अमर उजाला
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सेक्टर-16 स्थित पंजाब कला भवन में संस्कार भारती और टीएफटी के तीसरे राष्ट्रीय नाट्य समारोह के पहले दिन नाटक ‘संध्या छाया’ का मंचन थिएटर फॉर थिएटर ग्रुप की ओर से किया गया। नाटक का लेखन जयंत दालवी और निर्देशन सुदेश शर्मा ने किया।
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90 मिनट के नाटक में कलाकारों ने दर्शाया कि जब एक फौजी की मौत हो जाती है तो उसके माता पिता कितने अकेले हो जाते हैं। नाटक में शहीदों के परिजनों के अकेलेपन की पीड़ा को जीवंत कर दिखाया गया है।
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ये है कहानी : नाना नाम के एक युवक के दो बेटे होते हैं। उनका पहला बेटा जम्मू कश्मीर में लड़ाई के दौरान शहीद हो जाता है। वहीं उसका छोटा बेटा श्याम अमेरिका चला जाता है। वह हर बार भारत देश की सरकारी दफ्तरों और अन्य जगह की कार्यशैली से नाखुश होता है।
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इस पर नाना उसे कहता है कि वह देश से शिकायत न रखे। उसके भाई ने देश के लिए इसलिए बलिदान नहीं दिया है, लेकिन वह किसी कीमत पर घर नहीं आता है। इससे वह परेशान होते हैं। नाना बहुत बूढ़े हो जाते हैं।
इस हालात पर उनकी देखरेख उनका नौकर महाटू करता है। वह कई बार अकेले होने से परेशान रहते हैं। आपसी झगड़ों से परेशान होने के बाद श्याम के मां-बाप एक दिन जहर खाने की कोशिश करते हैं, तभी उनके दरवाजे की घंटी बजती है और एक आदमी अपने बच्चे के साथ पता पूछता है।
इस पर वह उससे पूछते हैं कि तुम्हें काम चाहिए। वह हां कहता है। इस पर उसे वह अपने घर में रख लेते हैं। उसी छोटे बच्चे के सहारे वह अपना बचा हुआ जीवन जीने का प्रयास करते है।