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सूखा प्रभावित क्षेत्रों में भी लहलहाएगी गेहूं की फसल
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चंडीगढ़। सूखा प्रभावित क्षेत्रों और खारे पानी वाले इलाकों में भी गेहूं की फसल लहलहाएगी। पीयू के दो वैज्ञानिक गेहूं की प्रजाति में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाने के लिए शोध करेंगे। इसके लिए भारत सरकार ने 62 लाख रुपये अनुदान दिया है।
देश के कई हिस्सों में पानी की कमी है। इससे पूरी तरह गेहूं की खेती नहीं हो पाती। साथ ही कुछ इलाकों में पानी है, लेकिन उस पानी में नमक की मात्रा अधिक होती है। इससे फसल का विकास नहीं हो पाता और गेहूं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उत्पादन भी कम होता है। इसे देखते हुए पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष के उपाध्याय व जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रो. कश्मीर सिंह गेहूं की प्रजाति पर शोध करेंगे। ये वैज्ञानिक गेहूं में पाए जाने वाले टीएएमएसएल 5-डी प्रोटीन की मात्रा शोध के जरिए बढ़ाएंगे। जब प्रोटीन प्रजाति में अधिक हो जाएगा तो उसका विकास होता जाएगा। कम पानी में भी फसल अच्छी होगी और नमक का प्रभाव भी फसल पर नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन से भी फसल आसानी से निपट पाएगी। डॉ. उपाध्याय ने बताया कि शोध इस पर पहले से चल रहा है, लेकिन इसे और आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अच्छे परिणाम आएंगे। किसानों को इसका बड़ा लाभ मिलेगा।
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देश के कई हिस्सों में पानी की कमी है। इससे पूरी तरह गेहूं की खेती नहीं हो पाती। साथ ही कुछ इलाकों में पानी है, लेकिन उस पानी में नमक की मात्रा अधिक होती है। इससे फसल का विकास नहीं हो पाता और गेहूं की गुणवत्ता प्रभावित होती है। उत्पादन भी कम होता है। इसे देखते हुए पीयू के वनस्पति विज्ञान विभाग के सहायक प्रोफेसर डॉ. संतोष के उपाध्याय व जैव प्रौद्योगिकी विभाग के प्रो. कश्मीर सिंह गेहूं की प्रजाति पर शोध करेंगे। ये वैज्ञानिक गेहूं में पाए जाने वाले टीएएमएसएल 5-डी प्रोटीन की मात्रा शोध के जरिए बढ़ाएंगे। जब प्रोटीन प्रजाति में अधिक हो जाएगा तो उसका विकास होता जाएगा। कम पानी में भी फसल अच्छी होगी और नमक का प्रभाव भी फसल पर नहीं होगा। जलवायु परिवर्तन से भी फसल आसानी से निपट पाएगी। डॉ. उपाध्याय ने बताया कि शोध इस पर पहले से चल रहा है, लेकिन इसे और आगे बढ़ाया जाएगा। इसके अच्छे परिणाम आएंगे। किसानों को इसका बड़ा लाभ मिलेगा।
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