फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Haryana ›   Even after so many years could not change the technology of colonial

बातें बुलेट और टैल्गो ट्रेन चलाने की, धुंध में तकनीक अंग्रेजों के जमाने की

Tue, 08 Nov 2016 09:34 AM IST
बृजेश कुमार मिश्र/अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा)
बृजेश कुमार मिश्र/अमर उजाला, रोहतक(हरियाणा) Updated Tue, 08 Nov 2016 09:34 AM IST
विज्ञापन
Even after so many years could not change the technology of colonial
- फोटो : File Photo
देश में तेज गति से चलने वाली बुलेट और टैल्गो ट्रेन चलाने की बातें हो रही हैं, लेकिन रेलवे कोहरे में ट्रेनों के संचालन की तकनीक नहीं खोज पाया है। आज भी अंग्रेजों के जमाने की पटाखा पद्धति से ही ट्रेनों का संचालन किया जा रहा है। यही कारण है कि सर्दी के मौसम में कोहरे की वजह से ट्रेनें बैलगाड़ी की गति से चलकर पांच से 15 घंटे तक लेट हो जाती हैं।
विज्ञापन


देरी की वजह से कई ट्रेनें हर रोज रद्द कर दी जाती हैं। कुछ ट्रेनें तो पूरी सर्दियों के लिए रद्द कर दी जाती हैं। पिछले कुछ दिनों से वातावरण में स्मॉग छाने की वजह से कई ट्रेनें निर्धारित समय से देरी से चल रही हैं। इस वजह से यात्रियों को खासी परेशानी हो रही है। समय पर अपने गंतव्य तक पहुंचना मुश्किल हो गया है।  
विज्ञापन


कोहरे में ट्रेनों के संचालन को सुचारू बनाने के लिए रेलवे नई तकनीक नहीं खोज पाया है। हालांकि इसके लिए कई बार प्रयास किए गए हैं, लेकिन सफलता नहीं मिल पाई है। इस कारण रेलवे आज भी सर्दियों में धुंध की काट के लिए पटाखों का इस्तेमाल कर रहा है। धुंध में पटाखों के माध्यम से रेल चालक को पता लगता है कि ट्रैक पर आगे सिग्नल आ रहा है। इससे वह रेल की गति को धीमा कर देता है और सिग्नल के अनुसार कार्य करता है। पटाखा तकनीक बहुत पुरानी है। रेलवे इसी से शुरू से काम चलाता आ रहा है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

क्या है रेलवे की पटाखा नीति

Even after so many years could not change the technology of colonial
Smog - फोटो : Bureau
क्या है रेलवे की पटाखा नीति
रेलवे के पास ढक्कन नुमा एक पटाखा होता है। यह लोहे की धातु का बना होता है। इसकी ऊ परी सतह पर रेलवे की पहचान और नाम लिखा होता है। पीछे की ओर दो तार निकले होते हैं। इसकी बनावट राखी जैसी होती है। जैसे हाथ पर राखी बांधते हैं वैसे ही रेलवे ट्रैक पर इसे बांध दिया जाता है।

जब कोई ट्रेन इसके ऊपर से गुजरती है तो यह फट जाता है। फटने पर आवाज होती है जिसे सुनकर रेल चालक  अनुमान लगाता है कि आगे कोई सिग्नल आने वाला है। इससे वह रेल की गति को कम कर देता है। आगे सिग्नल के अनुसार वह रेल को चलाता है। एक बार में इस तरह के तीन पटाखे रेलवे ट्रैक पर बिछाए जाते हैं। जो एक दूसरे से दस मीटर की दूरी पर रखे जाते हैं।

पटाखा बिछाने वाला एक रेलकर्मी अलग से होता है। उसका काम पटाखा बिछाना और फटने के बाद उसे इकट्ठा करके संबंधित विभाग को सूचित करना होता है। पटाखा बिछाने के बाद वह करीब 45 मीटर की दूरी पर खड़ा हो जाता है। 

धुंध से निपटने के प्रयास नहीं हुए कामयाब 

Even after so many years could not change the technology of colonial
द‌िल्ली में जहरीली धुंध - फोटो : फाइल फोटो
धुंध से निपटने के प्रयास नहीं हुए कामयाब 
रेलवे की शोध शाखा रिसर्च डिजाइन एंड स्टैंडर्ड ऑर्गेनाइजेशन (आरडीएसओ) ने कानपुर आईआईटी की मदद से एक तकनीक विकसित की थी। इसका नाम उन्होंने त्रिनेत्र रखा था। यह स्वदेशी फॉग विजन यंत्र था।

लखनऊ जोन में आर्टीफिशियल कोहरा बनाकर इस यंत्र का ट्रायल किया गया था, लेकिन यह सफल नहीं हुआ। इस यंत्र की खासियत यह थी कि यह दो किलोमीटर पहले से ही ट्रैक के बीच में आने वाली वस्तु और सिग्नल की पहचान कर लेती। इसे राडार और नेवीगेशन की तकनीक को मिलाकर तैयार किया गया था। 

इसी तरह रेलवे ने एक एंटी फॉग विजन कैमरा तैयार किया था। इसका ट्रायल रेलवे ने नई दिल्ली से इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के बीच में प्रयाग राज एक्सप्रेस में किया गया था। लेकिन बजट अधिक और तकनीक के कई बार सही से काम नहीं करने के कारण इसे रेलवे ने नहीं अपनाया। यह ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) पर काम करता था। इसे लोको पायलट को दे दिया जाता जो ट्रैक से सिग्नल को देख सकता था। कैमरे में यह ब्लैक  एंड व्हाइट में दिखाई दे रहा था। जबकि रेलवे इससे रंगीन फोटो चाहता था। तकनीक विकसित नहीं हो सकी और योजना ठंडे बस्ते में चली गई।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed