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पीयू छात्रसंघ चुनाव: खत्म हो रहा बुद्धिजीवी राजनीति का दौर, अब शक्ति प्रदर्शन के भरोसे चुनाव जीतने पर जोर

Sun, 16 Oct 2022 04:56 PM IST
निवेदिता वर्मा कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़
कविता बिश्नोई, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Sun, 16 Oct 2022 04:56 PM IST
सार

यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के राजनीतिक दंगल को छात्रों के लिए राजनीति की नर्सरी माना जाता है। जहां पर छात्र नेता अच्छे वक्ता, कुशल रणनीतिकार, राजनीतिक मुद्दों पर दांव-पेंच लगाना, मुद्दों को समझने जैसे कौशल सीखते हैं जो उन्हें भविष्य में अच्छा बुद्धिजीवी नेता बनाता है।

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Era of intellectual politics in Panjab university is over, emphasis on show of strength
पीयू छात्रसंघ चुनाव - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

पंजाब यूनिवर्सिटी की राजनीति को पंजाब और हरियाणा की आम राजनीति का गढ़ माना जाता है। पीयू ने पुराने समय में कुशल नेता, वक्ता और अधिवक्ता देश को दिए हैं। लेकिन आधुनिक दौर में पीयू में बुद्धिजीवी राजनीति का दौर खत्म हो गया है। वर्तमान चुनाव में छात्रों की कैंपेनिंग में छात्रों के मुद्दे ही गायब हैं। कोई भी छात्र संगठन मुद्दों पर बहस नहीं कर रहा है, शक्ति प्रदर्शन पर ही छात्र नेताओं का जोर है। छात्रों को स्टीकर और प्रदर्शन रैलियों के जरिए अपने संगठन और नेता को वोट देने की अपील की जा रही है। 

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यूनिवर्सिटी और कॉलेजों के राजनीतिक दंगल को छात्रों के लिए राजनीति की नर्सरी माना जाता है। जहां पर छात्र नेता अच्छे वक्ता, कुशल रणनीतिकार, राजनीतिक मुद्दों पर दांव-पेंच लगाना, मुद्दों को समझने जैसे कौशल सीखते हैं जो उन्हें भविष्य में अच्छा बुद्धिजीवी नेता बनाता है। इस बार कॉलेजों और पीयू की राजनीति में ये सब गायब है। पीयू और कॉलेज परिसर से लेकर सोशल मीडिया तक छात्र संगठन शक्ति प्रदर्शन, भीड़, चुनावी जीत के अहम की खुशी का अहसास लेने तक ही सीमित है। 
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छात्र संघ चुनाव में आया बदलाव, विचार गायब  
पीयू के पहले और वर्तमान के छात्र संघ चुनावों में बहुत बड़ा बदलाव आया है। पहला तो सोशल मीडिया को अधिक महत्ता दी जा रही है। टेक्नोलॉजी इस्तेमाल करना अच्छा है, लेकिन वहां पर मुद्दे नहीं दिख रहे हैं। दूसरी ओर परिसर में मुद्दों पर चुनाव होते थे, छात्र नेता छात्रों के मुद्दों पर विचार रखते थे। आम विद्यार्थी उस बहस की ऑर्ब्जेवेशन के जरिए अपने नेता का चुनाव करते थे। - डॉ. इमैनुअल नाहर, प्रोफेसर, राजनीति विज्ञान 
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छात्रों के मुद्दे और बहस सब गायब
इस बार छात्र संघ चुनाव से छात्रों के मुद्दे और बहस सब गायब है। किसी समय चुनावों के समय कक्षाओं में मुद्दों पर बहस से विद्यार्थियों की समस्याएं और शिक्षण संस्थान की बेहतरी के मुद्दे बाहर निकल कर आते थे। छात्र संगठनों का शक्ति प्रदर्शन पर जोर हैं। राजनीतिक दांव-पेच, भाषण आदि के जरिए ही पुराने समय में पीयू से कुशल राजनेता और लीडर निकले हैं जो कि इस चुनावों में छात्र नहीं सीख पाएंगे। - डॉ. भारत, प्रोफेसर, यूआईएलएस  

छात्र संगठनों का भीड़ दिखाने पर जोर
 
वर्ष 2018 से पीयू की छात्र राजनीति देख रहा हूं। धीरे-धीरे छात्रों की राजनीति से मुद्दे गायब हो गए हैं और छात्र नेताओं ने थापियां मारकर शक्ति प्रदर्शन पर जोर दिया है। जिससे कि शिक्षित युवा राजनेता की झलकी एकदम खत्म हो गई है। सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत अधिक बढ़ गया है, लेकिन उसमें भी रील और भीड़ को दिखाने पर जोर हैं। राज्यों सरकारों की छात्र राजनीति में दखलअंदाजी भी छात्र राजनीति को प्रभावित कर रही है। - अमताज सिंह सिद्ध, छात्र, कानून विभाग 


छात्र राजनीति से बौद्धिकता खत्म हो रही 

पीयू में इस बार जिस तरीके से चुनावी प्रचार हो रहा है, राजनीति से बौद्धिकता खत्म हो रही है। भीड़ के जरिए छात्रों को मोबिलाइज किया जा रहा है। वर्ष 2018 और 2019 के चुनाव में सोशल मीडिया का पहले मुद्दों पर बहस के लिए इस्तेमाल होता था। इस बार रील के ट्रेंड ने मुद्दों की राजनीति को खत्म कर शक्ति प्रदर्शन को बढ़ावा दिया है। शैक्षणिक संस्थानों से राजनीति के अपराधीकरण को खत्म करने पर बात होनी चाहिए, लेकिन समय के साथ इसमें बढ़ावा हो रहा है। पार्टी वेव का चुनाव बनकर रह गया है। - मनप्रीत माहल, पूर्व जनरल सेक्रेटरी, 2019

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