विस चुनावः जिसकी दिल्ली, उसका हरियाणा
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हरियाणा विधानसभा की चुनाव जंग का इतिहास गवाह है कि दिल्ली की सियासी हवा सबसे पहले यहीं पहुंचती रही है। अब तक के चुनाव नतीजों के ट्रेंड बताते हैं कि केंद्र में जिस भी पार्टी की सरकार बनी है। हरियाणा में वही अथवा उसके पाले में रहने वाली पार्टी के नेता की ही प्रदेश के सिंहासन पर ताजपोशी होती रही है।
इसलिए हरियाणा में आम तौर पर कहा जाता रहा है कि जिसकी दिल्ली उसका हरियाणा। चुनाव मैदान में भाजपा इसी बात को पुरजोर तरीके से प्रचारित कर रही है, जबकि पिछले चुनाव में कमोबेश यही बात कांग्रेस बोलती थी।
भाजपा नेता कैप्टन अभिमन्यु कहते हैं कि हरियाणा के लोग हमेशा से ही दिल्ली के साथ रहे हैं। केंद्र में मोदी सरकार बन चुकी है, और अब हरियाणा में भी भाजपा की ही सरकार बनेगी।
यही कहता है चुनावी ट्रेंड
पंजाब से अलग होने के बाद एक नवंबर 1966 को हरियाणा का गठन हुआ। केंद्र में तब कांग्रेस की सरकार थी और प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी। हरियाणा में 1967 में पहली सरकार कांग्रेस की बनी और मुख्यमंत्री भगवत दयाल शर्मा बने।
कांग्रेस सरकार मात्र 143 दिन ही चल पाई और निर्दलीय विधायकों के समर्थन से विशाल हरियाणा पार्टी के राव बीरेंद्र सिंह ने सत्ता संभाल ली। हालांकि, राव सरकार भी 224 दिन ही चल पाई और प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाना पड़ा।
इसके बाद 1968 के चुनाव में कांग्रेस सत्ता में लौटी और बंसीलाल मुख्यमंत्री बने। केंद्र में तब कांग्रेस की ही सरकार थी। लगातार 1977 तक यही सिलसिला चला।
इमरजेंसी के बाद भी केंद्र का साथ रहा हरियाणा
इमरजेंसी के बाद देशभर में आए बदलाव का गवाह हरियाणा बना और केंद्र की तरह यहां भी जनता पार्टी ने परचम फहरा दिया। दिल्ली में प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई बने और हरियाणा में चौधरी देवीलाल ने सत्ता संभाली।
हालांकि, उन्हें बीच में ही मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़नी पड़ी और भजनलाल मुख्यमंत्री बन गए। जनता पार्टी में टूट के बाद अंतत: 1980 में लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी सत्ता में लौट आईं।
हरियाणा में तब जनता पार्टी की सरकार के मुखिया भजनलाल थे। वे पूरी जनता पार्टी सरकार का दलबदल करके इंदिरा गांधी की शरण में लौट गए। इस तरह बिना चुनाव के ही हरियाणा में कांग्रेस सरकार बन गई।
इसके बाद 1989 में केंद्र में जनता दल नेता वीपी सिंह की सरकार बनी। हालांकि, हरियाणा में दो साल पहले ही चौधरी देवीलाल के नेतृत्व में जनता दल सरकार बन चुकी थी।
केंद्र में दिन फिरते ही हरियाणा में लौटी कांग्रेस
वीपी सिंह और फिर चंद्रशेखर की सरकार गिर जाने के बाद 1991 के लोकसभा चुनाव में केंद्र में कांग्रेस लौटी और पीवी नरसिंहा राव ने सत्ता संभाली। इधर, हरियाणा भी कांग्रेस की झोली में आ गया और बंसीलाल मुख्यमंत्री बने।
इसके बाद 1996 में केंद्र में 13 दिन की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार भी रही। उनके बाद जनता दल नेतृत्व की सरकारें रहीं। यानी केंद्र में गैर कांग्रेस सरकारें थीं, तो हरियाणा की कमान हरियाणा विकास पार्टी (हविका) के बैनर तले बंसीलाल के हाथ आ गई।
तब भाजपा और हविका का गठबंधन था। बाद में भाजपा ने साढ़े तीन साल बाद हविका को मंझधार में छोड़ दिया और इनेलो को समर्थन देकर ओम प्रकाश चौटाला की ताजपोशी कर दी।
अटल सरकार बनने पर भाजपा ने चखा सत्ता का स्वाद
1998 चुनाव में केंद्र में भाजपा नेतृत्व वाला एनडीए सत्ता में आ गया। दिल्ली में अटल बिहारी वाजपेयी पीएम बने। हरियाणा में 2000 में चुनाव हुए। तब इनेलो-भाजपा गठबंधन सत्ता में आ गया।
इसके बाद 2004 और 2009 के चुनाव में केंद्र में लगातार दो बार कांग्रेस की ही सरकार बनी, हरियाणा में भी 2005 और 2009 में कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की और हुड्डा के हाथ कमान रही। इसलिए भाजपा इसी ट्रेंड को देखकर जनता से कह रही है कि इस बार हरियाणा में कमल खिलेगा।