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डॉ. गुरमीत ताशकंद में हिंदी के विजिटिंग प्रोफेसर बने
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चंडीगढ़। विदेशों में हिंदी की मांग लगातार बढ़ रही है। विद्यार्थी हिंदी पढ़ना चाहते हैं और उसमें अपना भविष्य बनाना चाहते हैं। इसी को ध्यान में रखकर उज्बेकिस्तान से पीयू को बुलाया आया है। यहां हिंदी विभाग में तैनात एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. गुरमीत वहां के ताशकंद विश्वविद्यालय ऑफ ऑरियंटल स्टडीज में विजिटिंग प्रोफेसर बने हैं। वहां के अंतरराष्ट्रीय पत्रकारिता और अनुवाद अध्ययन विभाग में बीए और एमए के छात्रों को पढ़ाएंगे।
1918 में स्थापित हुआ था प्राच्य अध्ययन विभाग
उज्बेकिस्तान का ताशकंद ऐतिहासिक शहर है। इस ऐतिहासिक शहर में चालू सत्र में ही एक सेमेस्टर के लिए पढ़ाने के लिए डॉ. गुरमीत सिंह की नियुक्ति हुई है। पीयू वीसी प्रो. राज कुमार के पास ताशकंद विश्वविद्यालय की रेक्टर की ओर से पत्र आया है। ताशकंद विश्वविद्यालय में विभिन्न स्तरों पर हिंदी साहित्य, अनुवाद और पत्रकारिता की पढ़ाई होती है। 1918 में स्थापित प्राच्य अध्ययन (ऑरियंटल स्टडीज) का यह सरकारी विश्वविद्यालय मध्य एशिया का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता है जहां पूर्व की अनेक भाषाओं को पढ़ाया जाता है।
जार्डन के अम्मान विश्वविद्यालय से भी आया था बुलावा
डॉ. गुरमीत सिंह वर्ष 2017 से 2020 के बीच हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने देश-विदेश से विभाग को जोड़कर उसे नई पहचान दिलवाई थी। इससे पहले विदेशों में स्थित विश्वविद्यालयों में भारत सरकार द्वारा स्थापित हिंदी चेयर के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् (आईसीसीआर) ने भी उनका चयन किया था। वर्ष 2018 में उन्हें जार्डन के अम्मान विश्वविद्यालय में आईसीसीआर चेयर पर नियुक्ति मिली थी, लेकिन तब विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी को उन्होंने प्राथमिकता दी थी। वर्ष 2007 में शिक्षण में आने से पहले डॉ. गुरमीत सिंह हिंदी पत्रकारिता में भी एक दशक से ज्यादा समय तक काम कर चुके हैं और उन्होंने कारगिल युद्ध व गुजरात भूकंप जैसी कई घटनाओं की रिपोर्टिंग की। कई महत्वपूर्ण समितियों और सम्मेलनों में शिरकत करते रहे। डॉ. गुरमीत दो बार पंजाब यूनिवर्सिटी की सीनेट के मनोनीत सदस्य भी रहे हैं।
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डॉ. गुरमीत को मिले हैं कई पुरस्कार
डॉ. गुरमीत ने ताशकंद विश्वविद्यालय में विजटिंग प्रोफेसर के रूप में अपनी नियुक्ति पर कहा है कि हिंदी की सेवा के लिए देश के बाहर से निमंत्रण मिलना गर्व का विषय है। डॉ. गुरमीत सिंह को साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 2008 में हरियाणा साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय पुरस्कार और 2016 में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का सर्वश्रेष्ठ पुस्तक पुरस्कार भी मिल चुका है। यह पुरस्कार उनकी पुस्तक हिंदी का बदलता परिवेश के लिए दिया गया था।
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1918 में स्थापित हुआ था प्राच्य अध्ययन विभाग
उज्बेकिस्तान का ताशकंद ऐतिहासिक शहर है। इस ऐतिहासिक शहर में चालू सत्र में ही एक सेमेस्टर के लिए पढ़ाने के लिए डॉ. गुरमीत सिंह की नियुक्ति हुई है। पीयू वीसी प्रो. राज कुमार के पास ताशकंद विश्वविद्यालय की रेक्टर की ओर से पत्र आया है। ताशकंद विश्वविद्यालय में विभिन्न स्तरों पर हिंदी साहित्य, अनुवाद और पत्रकारिता की पढ़ाई होती है। 1918 में स्थापित प्राच्य अध्ययन (ऑरियंटल स्टडीज) का यह सरकारी विश्वविद्यालय मध्य एशिया का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित केंद्र माना जाता है जहां पूर्व की अनेक भाषाओं को पढ़ाया जाता है।
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जार्डन के अम्मान विश्वविद्यालय से भी आया था बुलावा
डॉ. गुरमीत सिंह वर्ष 2017 से 2020 के बीच हिंदी विभाग के अध्यक्ष भी रहे हैं। इस दौरान उन्होंने देश-विदेश से विभाग को जोड़कर उसे नई पहचान दिलवाई थी। इससे पहले विदेशों में स्थित विश्वविद्यालयों में भारत सरकार द्वारा स्थापित हिंदी चेयर के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् (आईसीसीआर) ने भी उनका चयन किया था। वर्ष 2018 में उन्हें जार्डन के अम्मान विश्वविद्यालय में आईसीसीआर चेयर पर नियुक्ति मिली थी, लेकिन तब विभागाध्यक्ष के रूप में अपनी जिम्मेदारी को उन्होंने प्राथमिकता दी थी। वर्ष 2007 में शिक्षण में आने से पहले डॉ. गुरमीत सिंह हिंदी पत्रकारिता में भी एक दशक से ज्यादा समय तक काम कर चुके हैं और उन्होंने कारगिल युद्ध व गुजरात भूकंप जैसी कई घटनाओं की रिपोर्टिंग की। कई महत्वपूर्ण समितियों और सम्मेलनों में शिरकत करते रहे। डॉ. गुरमीत दो बार पंजाब यूनिवर्सिटी की सीनेट के मनोनीत सदस्य भी रहे हैं।
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डॉ. गुरमीत को मिले हैं कई पुरस्कार
डॉ. गुरमीत ने ताशकंद विश्वविद्यालय में विजटिंग प्रोफेसर के रूप में अपनी नियुक्ति पर कहा है कि हिंदी की सेवा के लिए देश के बाहर से निमंत्रण मिलना गर्व का विषय है। डॉ. गुरमीत सिंह को साहित्यिक पत्रकारिता के लिए 2008 में हरियाणा साहित्य अकादमी का राज्यस्तरीय पुरस्कार और 2016 में चंडीगढ़ साहित्य अकादमी का सर्वश्रेष्ठ पुस्तक पुरस्कार भी मिल चुका है। यह पुरस्कार उनकी पुस्तक हिंदी का बदलता परिवेश के लिए दिया गया था।