'खाकी' के साथ चली रामपाल की 'संत लीला'
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इन दिनों विवादों में घिरे सतलोक आश्रम के प्रमुख रामपाल ने संत बनने की प्लानिंग कुरुक्षेत्र में ही रची थी। यहां पर रामपाल अकसर अपने पुलिस कर्मचारी दोस्त से मिलने आता था। 90 के दशक में दोनों ने पुलिस लाइन में बैठकर ‘धर्म का साम्राज्य’ बनाने की खूब चर्चा की।
इन दोनों में इस बात को लेकर खूब बहस होती थी कि कौन गुरु बनेगा और कौन चेला। असल में पुलिस कर्मचारी भी बाबा बनना चाहता था, लेकिन रामपाल की इच्छा उससे ज्यादा जोर मार रही थी। ऐसे में पुलिस कर्मचारी सोचता ही रह गया और रामपाल ने करोड़ों-अरबों का साम्राज्य खड़ा कर दिया।
इन दिनों यह पुलिस कर्मचारी एएसआई के पद पर पंचकूला में तैनात है। करीब दो दशक पहले यह पुलिस कर्मी कुरुक्षेत्र के ही आरमोर (असलाह की रिपेयर) करने वाली ब्रांच में था।
वर्तमान में कुरुक्षेत्र में ही तैनात तीन पुलिस अधिकारियों ने अमर उजाला से बातचीत में नाम न छापने की शर्त पर बताया कि उन्होंने भी संत रामपाल को कई बार अपने सहयोगी पुलिस कर्मी के साथ देखा था। तब संत रामपाल के पास ऐसा कुछ नहीं था और रामपाल कई बार घंटों पुलिस लाइन के ग्राउंड में रहता और अपने दोस्त से बातें करता था।
जेल के पास ही हुई संत की शुरुआत
पुलिस अधिकारियों की माने तो इनमें कई बार आश्रम खोलने और गुरु बनने की प्लानिंग भी बनी। मगर दोनों धार्मिक आश्रम-डेरा खोलने पर तो राजी थे, मगर दोनों में गुरु कौन होगा और शिष्य कौन? इस बात पर सहमति नहीं बन सकी।
दरअसल पुलिस कर्मी ब्राह्मण समुदाय से था और उसे रामपाल का शिष्य बनना गवारा नहीं था, लिहाजा पुलिस कर्मी भी नौकरी छोड़कर खुद गुरु बनना चाहता था। मगर यह प्लान सिरे नहीं चढ़ा, क्योंकि रामपाल खुद संत बनकर पुलिस कर्मी को अपना चेला बनाना चाहता था।
पुराने वक्त में रामपाल के संपर्क में रहे पंचकूला में तैनात सहायक उप निरीक्षक ने मोबाइल पर हुई बातचीत में बताया कि जब वह रामपाल के संपर्क में आया तो वह बिलकुल साधारण सा व्यक्ति था। आज के संत रामपाल जैसी उसमें कोई बात नहीं दिखती थी।
एएसआई ने बताया कि रामपाल ने वर्ष 1999 में अपनी पहली कुटिया जींद जेल के सामने अर्बन एस्टेट में बनाई थी, जबकि कुरुक्षेत्र में संत रामपाल ने अपना पहला कीर्तन भी कुरुक्षेत्र जेल के निकट स्थित एक एफसीआई इंस्पेक्टर के घर ही किया था। अब रामपाल खुद जेल में है।
इंजीनियरिंग में सिक्का नहीं चला
नीलोखेड़ी तकनीकी संस्थान से सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा कर चुके रामपाल ने एचएसएमआईटीसी में बतौर कनिष्ठ अभियंता नौकरी ज्वाइन की थी, लेकिन बतौर डिप्लोमा इंजीनियर इस कार्पोरेशन में तो वे कोई महारथ नहीं दिखा पाए, मगर एक खास तरह की सोशल इंजीनियरिंग करके उन्होंने सतलोक आश्रम के जरिये राजशाही रियासत बनाकर वारे-न्यारे जरूर कर लिए।
डबवाली में मिली थी गुरु की संगत
संत रामपाल के पुराने सहपाठी शीशपाल सिंह सिंधु ने बताया कि वे एक साथ एक ही महकमे में नौकरी भी कर चुके हैं। जब रामपाल डबवाली मे तैनात था, तभी यहां से साथ लगे पंजाब के एक इलाके में एक धर्मगुरु से उसका संपर्क हो गया था।
ड्यूटी से बंक मारकर रामपाल अक्सर हरियाणा की सीमा से सटे पंजाब के निकटवर्ती इलाके में उक्त गुरु जी के पास जाता था। संत बनने से पहले रामपाल जींद, हिसार, सिरसा और डबवाली जैसे कई स्टेशनों पर बतौर जेई नौकरी कर चुका है।