मातृ दिवस विशेष: चंडीगढ़ के दफ्तरों में मिलेगी क्रेच की सुविधा, कामकाजी महिलाओं को बच्चों के पालन में नहीं होगी परेशानी
आयुक्त आनिंदिता मित्रा ने बताया कि नगर निगम में भी कई महिलाओं ने मांग की है कि उनके बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच होना चाहिए इसलिए प्रथम तल पर जगह देख ली गई है। वहां बच्चों के लिए क्रेच बनाया जाएगा।
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मां अपने कामकाज के बीच बच्चे के पालन पोषण को लेकर न परेशान हो इसके लिए समाज कल्याण विभाग महिलाओं को सुविधा देने जा रही है। हाल ही में विभाग ने जिला अदालत और आयकर विभाग में क्रेच खोल दिया है। वहीं, जल्द ही जीएसटी विभाग और नगर निगम में भी क्रेच खोलने की तैयारी में है। इससे जहां महिलाओं की कार्य क्षमता में बढ़ोतरी होगी, वहीं उसी भवन में उनके बच्चों के रहने से पालन पोषण की चिंता भी नहीं रहेगी।
समाज कल्याण अधिकारी शालिनी चेतल ने कहा कि एक महिला के जीवन में उसका परिवार काफी महत्व रखता है। वह बच्चों के प्रति ज्यादा सजग रहती हैं। ऐसे में कामकाजी महिलाओं के लिए इस दोहरी जिम्मेदारी को निभाना जैसे किसी चुनौती से कम नहीं होता। कहीं बच्चे को कोई समस्या होती है तो उसका काम भी प्रभावित होता है। ऐसे में जिस भवन में वह काम कर रही है और वहीं उसके बच्चे की बेहतर देखभाल हो जाए तो इससे अच्छा क्या हो सकता है। इसी उद्देश्य से कुछ विभागों ने अपने यहां काम करने वाली महिलाओं के लिए क्रेच बनाने की मांग की। हमने भी तत्परता दिखाते हुए कुछ जगह क्रेच बना दिए हैं और कुछ जगह बनाने जा रहे हैं। हमारा उद्देश्य है कि एक मां को उसके बच्चे की देखभाल की चिंता से मुक्त करके कार्यालय में तनाव मुक्त माहौल उपलब्ध कराना है।
नगर निगम में जगह तय, जल्द खुलेगा क्रेच
आयुक्त आनिंदिता मित्रा ने बताया कि नगर निगम में भी कई महिलाओं ने मांग की है कि उनके बच्चों की देखभाल के लिए क्रेच होना चाहिए इसलिए प्रथम तल पर जगह देख ली गई है। वहां बच्चों के लिए क्रेच बनाया जाएगा। इसका जल्द निरीक्षण हो जाएगा, उसके बाद क्रेच को खोलने की तैयारी शुरू कर देंगे।
घर जैसा खाना उपलब्ध करा रहीं स्वयं सहायता समूह की महिलाएं
घर से दूर रहने वालों को मां के हाथ का खाना बहुत याद आता है। इस कमी को दूर करने के लिए स्वयं सहायता समूह की महिलाएं आगे आईं और चंडीगढ़ में नौकरी या पढ़ाई करने वालों को ‘मॉम्स टिफिन’ उपलब्ध कराने की योजना बनाई। नगर निगम के सहयोग से दीनदयाल अंत्योदय योजना के अंतर्गत समूह को फंड उपलब्ध कराया गया ताकि महिलाओं को रोजगार के साथ लोगों को बेहतर खाना मिल सके।
मॉम्स टिफिन को संचालित करने वालीं टीना का कहना है कि शहर में अकेले रहने वाले लोगों की समस्या को देखते हुए हमने यह योजना बनाई। अन्य महिलाओं से बातचीत कर निगम के सामने प्रस्ताव रखा, जो उन्हें भी पसंद आया। संस्था की सदस्य पूजा ने बताया कि कोविड काल में कई ऐसे लोगों ने संपर्क किया जो अकेले रहते हैं और घर के खाने को याद करते हैं। ऐसे 50 लोगों को हम रोज घर जैसा खाना उपलब्ध करा रहे हैं।
महिला अधिकारियों ने कहा-काम के बीच जब मौका मिले बच्चों को समय दें
एक मां को अपने परिवार और बच्चे के पालन-पोषण से ज्यादा कोई काम महत्वपूर्ण नहीं लगता है लेकिन जब वह नौकरी करती हों तो दोहरी जिम्मेदारी निभाना एक चुनौती बन जाती है। खासकर एक महिला अधिकारी के लिए शहर की योजनाएं तैयार करना और परिवार को संभालना थोड़ा मुश्किल होता है। ऐसे में परिवार का साथ काफी महत्वपूर्ण होता है। ऐसे में कामकाजी महिलाओं को जब मौका मिले बच्चों को समय दें। उनसे अपने अनुभव साझा करें और उनकी गतिविधियों के बारे में भी पूछें, ताकि मां और बच्चे के बीच एक दोस्ती का संबंध बना रहे।
मां की गतिविधियों पर बच्चे ज्यादा देते हैं ध्यान : आनिंदिता मित्रा
निगम आयुक्त आनिंदिता मित्रा बतातीं हैं कि वर्ष 2009 में वह रोपड़ में एसडीएम के पद पर पदस्थ थीं। उस समय उनकी बेटी करीब साढ़े तीन साल की थी। परिवार और बच्चे के बीच तालमेल बनाने के लिए वह बिटिया को अपने साथ दफ्तर लेकर आती थीं। इसके बाद सुबह स्कूल भेजने के बाद वहां से सीधे दफ्तर में ले आती थीं। बेटी की बेहतर परवरिश में मां का काफी साथ मिला। अभी भी सुबह 6 से रात 12 बजे तक काम हो जाता है तो बिटिया को अखरता नहीं है। क्योंकि वह समय से पहले समझदार हो गई और मदद करती है। हम बच्चों को जो नसीहत देते हैं उससे ज्यादा हम जो करते हैं उस पर बच्चे ज्यादा ध्यान देते हैं। इसलिए परिजनों को अपने काम के जरिए ही उन्हें बेहतर संदेश देना चाहिए।
काम को बांटकर परिवार का सहयोग लें : नितिका पवार
प्रशासन में पर्सोनल विभाग की सचिव नितिका पवार बतातीं हैं कि वर्ष 2012 में नौकरी लगी। इसके बाद विवाह हुआ। उनकी चार साल की एक बेटी है। काम के साथ बेटी को दिनभर में चार से पांच घंटे दे पाती हैं लेकिन जितना समय देती हैं उस समय पूरी तरह से मां की भूमिका निभाती हैं। उस समय ऑफिसर वाली भूमिका नहीं होती है। एक महिला के लिए जरूरी है कि वह स्वस्थ रहे। क्योंकि परिवार और काम की दोनों जिम्मेदारी उसे निभानी है। इसलिए उसे अपने काम को बांटकर परिवार का सहयोग लेना चाहिए।
बच्चों को चुनौतियों की कहानी सुनाएं: शालिनी चेतल
समाज कल्याण अधिकारी और संयुक्त आयुक्त शालिनी चेतल बतातीं हैं कि वर्ष 2008 में उनकी नौकरी लगी थी। उनके दो बेटे हैं। उस समय परिवार का साथ न होता तो काफी मुश्किल होती लेकिन संयुक्त परिवार होने के कारण काफी सहयोग मिला। अभी चंडीगढ़ में अकेली रहती हैं। पति हरियाणा में मुख्य चिकित्सा अधिकारी हैं। दोनों ही बच्चों के लिए मुश्किल से समय निकाल पाते हैं लेकिन जेठानी का पूरा सहयोग मिलता है। वर्तमान में संयुक्त परिवार कम हो रहे हैं। कामकाजी परिवार के लोगों को अपनी मुश्किलें बच्चों से साझा नहीं करनी चाहिए, बल्कि अपनी साहस की कहानी सुनानी चाहिए, ताकि बच्चे भी हर चुनौती का सामना कर सकें।
घर और काम दोनों जगह बच्चों की जिम्मेदारी: पालिका अरोड़ा
शिक्षा निदेशक पालिका अरोड़ा बतातीं हैं कि उनकी तीन साल की बेटी है। चंडीगढ़ आने के बाद उन्हें शिक्षा विभाग जैसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिली। ऐसे में घर और काम दोनों जगह बच्चों की जिम्मेदारी मिलने से एक मां की भूमिका महत्वपूर्ण दिखी। घर पर परिवार का सहयोग मिला तो बेटी की देखभाल की चिंता कम हुई। ऐसे में स्कूल के बच्चों के लिए बेहतर काम करने का भी बीड़ा मजबूती से उठाया। पति पंजाब पुलिस में होने के कारण उनके ऊपर जिम्मेदारी ज्यादा है। इसलिए दफ्तर के बाद जो समय मिलता है बेटी को देती हैं।