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Haryana Assembly Election: कांग्रेस ने चल दिया वोट काटू फॉर्मूला, भाजपा ने क्षेत्रीय दलों पर साधी चुप्पी

Wed, 25 Sep 2024 01:58 PM IST
निवेदिता वर्मा सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़
सोमदत्त शर्मा, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Wed, 25 Sep 2024 01:58 PM IST
सार

कांग्रेस नेता सीधे भाजपा से मुकाबले की बात कह रहे हैं, जबकि दांव की काट में भाजपा क्षेत्रीय दलों इनेलो, जजपा और हलोपा पर बोलेने से बच रही है। कांग्रेस अब इसी को चुनावी मुद्दा बना रही है।

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Congress adopted vote-dividing formula in Haryana Assembly elections
नायब सिंह सैनी और भूपेंद्र हुड्डा। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

लोकसभा चुनाव की तर्ज पर हरियाणा विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस ने वोट काटू फार्मूले का दांव चल दिया है। कांग्रेस के छोटे से लेकर बड़े दिग्गज नेता हरियाणा के क्षेत्रीय दलों को निशाना बना रहे हैं और उनको वोट काटू की संज्ञा देकर प्रहार कर रहे हैं। कांग्रेस नेता सीधे भाजपा से मुकाबले की बात कह रहे हैं, जबकि दांव की काट में भाजपा क्षेत्रीय दलों इनेलो, जजपा और हलोपा पर बोलेने से बच रही है। कांग्रेस अब इसी को चुनावी मुद्दा बना रही है। अगर लोकसभा चुनाव की तर्ज पर विधानसभा चुनाव में कांग्रेस का यह फार्मूला काम कर गया तो क्षेत्रीय दलों के लिए विधानसभा की राह आसान नहीं होगी।

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साढ़े तीन माह पहले संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में यह फार्मूला खूब चला था। कांग्रेस के साथ-साथ भाजपा नेताओं ने भी क्षेत्रीय दलों पर जमकर हमला बोला था और मुकाबला सीधे राष्ट्रीय दलों कांग्रेस और भाजपा के बीच बताया था।
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इसका असर ये रहा था कि लोकसभा चुनाव में क्षेत्रीय दल दो प्रतिशत मत भी हासिल नहीं कर पाए। इनेलो को 1.74 प्रतिशत और जजपा को 0.87 फीसदी और अन्य दलों को 1.84 प्रतिशत ही मत मिले थे। आम आदमी पार्टी 3.94 प्रतिशत और बसपा 1.28 फीसदी मत पर सिमट गए थे। लेकिन विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा ने अपनी रणनीति में बदलाव किया है। 
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क्षेत्रीय दलों को साधने के लिए भाजपा ने अप्रत्यक्ष रूप से इनके प्रति नरमी दिखाई है। कुुरुक्षेत्र में हुई पीएम मोदी की रैली और भिवानी में हुई केंद्रीय मंत्री अमित शाह की रैली में कांग्रेस ही निशाने पर रही। 
किसी अन्य दल के नेताओं के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा गया, जबकि लोकसभा चुनाव में इन भाजपा के दिग्गजों ने पूर्व ओमप्रकाश चौटाला से लेकर अन्य नेताओं पर प्रहार किए थे। विधानसभा चुनाव में भाजपा सधी हुए रणनीति के तहत क्षेत्रीय दलों पर सहानुभूति दिखा रही है, ताकि जरूरत पड़ने पर इनको अपने साथ लाया जा सके।

भाजपा के अघोषित समझौते

विधानसभा चुनाव में भाजपा के क्षेत्रीय दलों के प्रति प्रेम का पहला उदाहरण हरियाणा जन शक्ति पार्टी है। इसके सुप्रीमो विनोद शर्मा हैं और उनकी पत्नी को भाजपा ने कालका से उम्मीदवार बनाया है। विनोद शर्मा हर बार अंबाला सिटी से चुनाव लड़ते थे, लेकिन इस बार वह असीम गोयल के रास्ते से हट गए हैं।

हलोपा विधायक गोपाल कांडा पहले भी सरकार को समर्थन दे रहे थे। हलोपा के साथ गठबंधन की बात सिरे नहीं चढ़ी, लेकिन भाजपा प्रत्याशी ने अपना नामांकन वापस लेकर कांडा की राह आसान करने की कोशिश की है। जबकि गोपाल कांडा और इनेलो-बसपा गठबंधन भी हाथ मिला चुके हैं।

जजपा के समर्थन से साढ़े चार साल चलाई सरकार

2019 के चुनाव में कम सीटें आने पर भाजपा ने क्षेत्रीय दल जजपा व हलोपा के साथ गठबंधन किया था। साढ़े चार साल गठबंधन चला और बाद में दोनों दल अलग हो गए। भाजपा कांग्रेस और हुड्डा परिवार पर तो हमले जरूर कर रही है, लेकिन जजपा, इनेलो के प्रति साफ्ट कॉर्नर अपनाए हुए है। वहीं, कांग्रेस के पूर्व सीएम भूपेंद्र सिंह हुड्डा भाजपा पर इनेलो के साथ मिलीभगत के आरोप लगा रहे हैं। साथ ही जजपा को भी भाजपा की बी टीम करार दे रहे हैं और इन दलों को वोट काटू की संज्ञा देकर इनको वोट नहीं देने की अपील कर रहे हैं।

सिरसा में बार-बार बदलने पड़ रहे बयान

सिरसा सीट पर नए गठजोड़ के चलते भाजपा से लेकर हलोपा नेताओं को बार-बार बयान बदलने पड़ रहे हैं। पहले गोपाल कांडा ने कहा था कि वह एनडीए का हिस्सा हैं और जीते तो भाजपा के ही साथ जाएंगे। बाद में वे अपने बयान से पलट गए और कहा कि समझौता तो इनेलो-बसपा गठबंधन से हो चुका है। वहीं, भाजपा के प्रत्याशी रोहताश जांगड़ा सिरसा से अपना नामांकन वापस ले चुके हैं। उनका


कहना है कि हाईकमान के आदेश पर ऐसा किया, जबकि भाजपा प्रदेशाध्यक्ष मोहन लाल बड़ौली कहे रहे हैं कि उन्हें जानकारी नहीं है और जांगड़ा से जवाब-तलब किया गया है।

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