जज्बा: कर्नल जेएस गिल ने बिना ट्रेनिंग 1971 की जंग में लगाई थी पहली पैराशूट छलांग, दुश्मन के इलाके में हासिल किया था लक्ष्य
1971 के युद्ध में शामिल रहे कर्नल एलजेएस गिल ने पश्चिमी कमान मुख्यालय में अपने अनुभव साझा किए। उन्होंने लड़ाई शुरू होने के बाद कमांडर से कहा कि पिता को वही संदेश देना, जो एक सैनिक की शहादत पर दिया जाता है। जिद करके जंग में शामिल हुए और दुश्मन के इलाके में अपना लक्ष्य हासिल किया।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
न मंजूरी थी और न ही प्रशिक्षण। था केवल देश के लिए कुछ करने का जज्बा। युद्ध में उतरने की जिद को देखते हुए कमांडर ने जब 21 साल के सेकेंड लेफ्टिनेंट से पूछा कि अनुभव के बिना युद्ध में भेजा और कुछ हो गया तो हम आपके पिता को क्या जवाब देंगे। नौजवान का जवाब था कि वही संदेश देना, जो युद्ध में शहादत पाए शहीद के परिवार को देते हैं। इतना कहते ही कमांडर की मंजूरी मिली और युवक ने 1971 के युद्ध में अपनी पहली पैराशूट छलांग लगा दी। न केवल दुश्मन के इलाके में वह सफलतापूर्वक उतरे, बल्कि अपना लक्ष्य भी हासिल किया।
कर्नल जेएस गिल
ये भी पढ़ें-नारनौल में बड़ा हादसा: शादी समारोह से लौट रहे परिवार की कार नहर में गिरी, तीन लोगों की मौत
बात हो रही है मोहाली निवासी 71 साल के रिटायर्ड कर्नल एलजेएस गिल की। रविवार को पश्चिमी कमान मुख्यालय में पहुंचे कर्नल ने अमर उजाला को बताया कि 50 साल पहले वह भारतीय सैन्य अकादमी (एनडीए) देहरादून में सैन्य प्रशिक्षण ले रहे थे, लेकिन उनके बैच के प्रशिक्षण को छह सप्ताह तक कम करके 14 नवंबर, 1971 को पासआउट कर दिया गया। युद्ध शुरू होने से ठीक पहले उन्हें 2-पैरा रेजिमेंट में नियुक्त किया गया था। यूनिट 27 नवंबर, 1971 को कोलकाता के पास बसीरहाट में युद्ध के लिए पूर्वाभ्यास कर रही थी।
ये भी पढ़ें-Petrol Diesel Price: हरियाणा में 94.94 रुपये प्रति लीटर हुआ पेट्रोल का भाव, 83.75 रुपये बिक रहा डीजल
ऐसे मिली थी कूदने की अनुमति
1 दिसंबर, 1971 को यूनिट को हवाई ऑपरेशन के बारे में जानकारी दी गई। गिल बताते हैं कि युद्ध में शामिल होने को लेकर उनका पैरा जंपिंग का प्रशिक्षण नहीं लेना आड़े आ रहा था। उन्होंने कमांडिंग ऑफिसर कर्नल (बाद में मेजर जनरल) कुलवंत पन्नू से अनुमति मांगी, लेकिन उन्होंने तत्कालीन ब्रिगेड कमांडर ब्रिगेडियर मैथ्यू थॉमस के पास जाने को कहा। ब्रिगेडियर मैथ्यू ने पूछा कि अगर कोई दुर्घटना हो जाती है तो वह आपके पिता को क्या जवाब देंगे। मैंने जवाब दिया कि सर आप वही संदेश दें, जो युद्ध में शहादत पाए एक सैनिक के परिवार को देते हैं। इस पर उन्होंने कूदने की अनुमति दी।
पाकिस्तान के पुल पर जमाया कब्जा
गिल ने बताया कि पाकिस्तानी क्षेत्र में भारतीय सेना का पहला हवाई अभियान था। उन्हें पूर्वी पाकिस्तान में तंगैल शहर के पास पुंगाली पुल पर कब्जा करने का आदेश दिया गया था, ताकि भारतीय सैनिकों की आवाजाही हो सके। 10 दिसंबर की रात उनकी यूनिट दमदम एयरबेस पहुंची। जहां उन्हें पैरा जंपिंग इंस्ट्रक्टर ने जंपिंग के दौरान इमरजेंसी स्थितियों के बारे में जानकारी दी। वे डकोटा विमान से कूद एक तालाब पर उतर गए। हालांकि यह एक खराब लैंडिंग थी। बटालियन पुल पर कब्जा करने में कामयाब रही।
ये भी पढ़ें-हरियाणा: आज सुबह 6 बजे से 24 घंटे बंद रहेंगे पेट्रोल पंप, सिर्फ इन वाहनों को मिलेगा तेल
गार्ड ऑफ आनर का भी हिस्सा बने
कर्नल गिल उस दल का भी हिस्सा बने, जिसने पाकिस्तानी सेना के लेफ्टिनेंट जनरल एएके नियाजी के कमांडर लेफ्टिनेंट जनरल जगजीत सिंह अरोड़ा के साथ पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण पर हस्ताक्षर करने के बाद ढाका में गार्ड ऑफ ऑनर किया था। 2-पैरा यूनिट की कमान संभालने के बाद 1995 में रिटायरमेंट लेने वाले कर्नल गिल ने कहा कि ऐतिहासिक आत्मसमर्पण समारोह के बाद उनकी भूमिका को बदल दिया गया। उन्हें मुक्ति वाहिनी के कुछ हिंसक सदस्यों को नियंत्रित करना पड़ा, जो पाकिस्तानी सैनिकों को मारना चाहते थे।
ये भी पढ़ें-झज्जर: शादी समारोह में हर्ष फायरिंग से बाराती घायल, जयमाल के समय हुई घटना, छाती में लगी है गोली
प्रशिक्षण के बाद भी ऐसी छलांग नहीं लगा पाया
गिल ने बताया कि युद्ध के बाद फरवरी, 1972 में उन्होंने छह सप्ताह का पैराशूट प्रशिक्षण पाठ्यक्रम पूरा किया। प्रशिक्षण के बाद उन्होंने 112 छलांगें लगाई, लेकिन ऐसी छलांग दोबारा नहीं लगाया पाया, जो उस समय लगाई थी। बाद में गिल को ब्रिटेन के पीटरबरो पैराशूट सेंटर में फ्री फॉल का प्रशिक्षण भी दिया गया।