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Chandigarh: बस नाम की ही स्मार्ट सिटी है चंडीगढ़, बिजली-पानी के मीटर के लिए महीनों खाने पड़ते हैं धक्के

Mon, 16 Jan 2023 04:26 PM IST
निवेदिता वर्मा रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़
रिशु राज सिंह, अमर उजाला, चंडीगढ़ Published by: निवेदिता वर्मा Updated Mon, 16 Jan 2023 04:26 PM IST
सार

नई जगह पर बिजली मीटर लगवाने के लिए दो गवाह, उनके हस्ताक्षर और आखिरी बिजली बिल की ओरिजनल कॉपी की मांग की जाती है। इससे लोगों के सामने समस्या खड़ी हो जाती है कि जिस इलाके में वह नए हैं, ऐसे में वह किसे गवाह बनाएं।
 

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Chandigarh: People have to wait for months for basic facilities like electricity and water meters
चंडीगढ़ - फोटो : file photo

विस्तार

चंडीगढ़ को भले कई साल पहले स्मार्ट सिटी का तमगा मिल गया है, लेकिन शहर की कई व्यवस्थाएं जस की तस हैं। लोगों को बिजली-पानी के मीटर जैसी मूलभूत सुविधा के लिए भी कई महीने चक्कर काटने पड़ते हैं। कई दफ्तरों की ठोकरें खानी पड़ती हैं। नियम पुराने और बोझिल हैं, जिसकी वजह से लोग बहुत परेशान होते हैं।
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एक तरफ सरकारी दफ्तरों में अनुपालन बोझ (कंप्लायंस बर्डन) को कम करने के लिए केंद्र सरकार अभियान चला रही है, दूसरी तरफ शहर में बेवजह के दस्तावेजों की मांग कर परेशान किया जाता है। उदाहरण स्वरूप, बिजली के मीटर के लिए कुल मिलाकर करीब 16 तरह के दस्तावेजों की मांग की जाती है। इन दस्तावेजों को एकत्रित करने में ही कई दिन निकल जाते हैं। पानी के मीटर के मामले में आवेदन ऑनलाइन करना होता है, लेकिन बाद में सभी दस्तावेजों को ऑफलाइन भी जमा कराना पड़ता है। अगर कागजों को लेकर सरकारी दफ्तरों के चक्कर ही काटने हैं, फिर ऑनलाइन क्यों आवेदन कराया जाता है। 
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लोगों का कहना है कि घर के बिजली का लोड पता कराने के लिए भी एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर भगाया जाता है, जबकि विभागों के पास लगभग सारी जानकारी होती है। लोगों का आरोप है कि घर बदलने के बाद लोगों को बिजली और पानी की सबसे पहले जरूरत होती है, लेकिन चंडीगढ़ में दोनों के मीटर लगवाने में भी दो से तीन महीने निकल जाते हैं। आखिर में मीटर भी लोगों को खुद अपने पैसे से खरीदना पड़ता है, लेकिन सिक्योरिटी सरकार लेती है। लोगों का कहना है कि विभागों के कई तर्क समझ से परे हैं।
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सरकार ने दिया आवंटन पत्र, फिर भी गवाह की जरूरत? 
नई जगह पर बिजली मीटर लगवाने के लिए दो गवाह, उनके हस्ताक्षर और आखिरी बिजली बिल की ओरिजनल कॉपी की मांग की जाती है। इससे लोगों के सामने समस्या खड़ी हो जाती है कि जिस इलाके में वह नए हैं, ऐसे में वह किसे गवाह बनाएं। सरकारी कर्मचारियों ने बताया कि सरकारी मकान मिलने के बाद भी उनसे गवाह की मांग की जाती है, जबकि उनके पास सरकार की तरफ से जारी अलॉटमेंट लेटर व अन्य दस्तावेज होते हैं। कहा कि विभाग को सरकार की तरफ से जारी कागज पर भी भरोसा नहीं है। समय बदल चुका है, जमाना कहां से कहां पहुंच चुका है लेकिन सरकारी दफ्तर व उनकी व्यवस्थाएं वहीं खड़ी है। लोगों का कहना है कि प्रशासन का ध्यान व्यवस्थाओं को स्मार्ट बनाने पर होना चाहिए।

16 तरह से दस्तावेज मांगे, इकट्ठा करने में लग गए 10 दिन
सेक्टर-43ए में रहने वाले शेषपाल शर्मा दूसरे फ्लोर से ग्राउंड फ्लोर पर रहने के लिए जा रहे हैं। बिजली के मीटर के लिए विभाग के दफ्तर गए तो 16 दस्तावेजों की एक सूची थमा दी गई। इसमें कई ऐसे थे, जिनकी आज से समय में उपयोगिता नहीं है। सरकार से मकान आवंटित होने के बावजूद उनसे गवाह, उनके हस्ताक्षर और उनका बिजली बिल मांगा गया। सभी दस्तावेजों को जुटाने में ही 10 दिन लग गए। इसके बाद कहा गया कि घर का बिजली लोड की जांच भी उन्हें खुद करानी होगी। मीटर की जांच भी करानी होगी। सब कुछ कराने में कई दिन बीत गए। फिर ऑनलाइन आवेदन को कहा गया। अब वो पिछले सात दिन से रोजाना वेबसाइट देख रहे हैं। वेबसाइट बंद हैं। उन्होंने कहा कि स्मार्ट सिटी की ये हालत है कि 15 दिन से ज्यादा हो गए हैं। अब तक बिजली का मीटर नहीं लग पाया है। पानी के मीटर के लिए भी जद्दोजहद कर रहे हैं।

नाम बदलवाना था, चार महीने लगा दिए
खुड्डा अलीशेर में रहने वाले प्रवीण कुमार ने बताया कि बिजली विभाग ने मीटर अकाउंट का नाम बदलने में चार महीने लगा दिए। इसके बाद भी करीब छह महीने तक परेशान रहे। आवेदन करने के एक महीने तक कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली। न कोई रीडिंग लेने आया। इसके बाद उन्होंने बिल के पीछे दिए गए ईमेल आईडी पर शिकायत की। इसके बाद कर्मचारी रीडिंग लेने आए। उसके बाद फिर कोई जवाब नहीं मिला, न कई महीने तक घर में बिल आया। फिर सेक्टर-10 स्थित बिजली विभाग के दफ्तर गए। वहां पता चला कि बिजली विभाग ने मीटर अकाउंट का नाम तो बदल दिया लेकिन नंबर भी बदल दिया है। इसके बाद कई महीने तक बिल का इंतजार किया। दफ्तर जाने के बाद ही बिल का पता चला। करीब 16 हजार रुपये इकट्ठे भरने पड़े।


पानी के मीटर के काटे एक से दूसरे दफ्तर के चक्कर
रामदरबार में रहने वाले सतीश कुमार ने बताया कि पानी का मीटर लगवाना बहुत कठिन है। कम पढ़े लिखे लोगों के लिए तो ये एक जंग जीतने के बराबर है। पहले ऑनलाइन फॉर्म भरना पड़ता है। फॉर्म में ऐसी जानकारियां मांगी जाती हैं, जिसकी ज्यादातर लोगों को जानकारी ही नहीं होती। उसकी वजह से कई बार फॉर्म आधा छूट जाता है। राशि के भुगतान के बाद भी मीटर लगवाने की प्रक्रिया बहुत बोझिल है। उन्होंने बताया कि उन्होंने मीटर की टेस्टिंग के लिए एक सेक्टर से दूसरे सेक्टर के दफ्तर में कई चक्कर काटे। ऑनलाइन आवेदन में जो दस्तावेज व फॉर्म लगाए थे, उन सभी को विभाग के दफ्तर में ऑफलाइन भी जमा कराना पड़ा। ऐसे में ऑनलाइन व्यवस्था का क्या मतलब है।
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