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मेयर चुनावः चंडीगढ़ BJP में असली लड़ाई तो लोकसभा चुनाव के टिकट की भाई!
राजेश ढल्ल/अमर उजाला, चंडीगढ़
Updated Thu, 04 Jan 2018 10:10 AM IST
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चंडीगढ़ बीजेपी, संजय टंडन
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देवेश मोदगिल को मेयर पद का उम्मीदवार बनाया तो चंडीगढ़ बीजेपी की गुटबाजी खुलकर सामने आ गई, जबकि असली लड़ाई तो लोकसभा चुनाव टिकट की है। इसलिए बवाल कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है। सांसद किरण खेर और भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन अपने गुट का मेयर बनवाना चाहते हैं ताकि वह शहर में अपनी स्थिति मजबूत कर सकें। मेयर के बहाने नगर निगम पर कब्जा रहेगा और ज्यादा से ज्यादा काम करवाकर शहर में अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकेंगे।
हालांकि, मोदगिल को मेयर का उम्मीदवार घोषित करवाकर सांसद किरण खेर ने बाजी मार ली है। बुधवार को हुए हंगामे ने साबित कर दिया है लोकसभा चुनाव तक गुटबाजी अब ज्यादा बढ़ेगी। भाजपा को इस साल के अंत या फिर नए साल के शुरुआत में लोकसभा चुनाव होने की उम्मीद है, इसलिए नए चुने गए मेयर का काफी अहम रोल होगा। नया मेयर अपने कामों से किसी भी सीनियर नेता और लोकसभा के टिकट दावेदार को प्रमोट कर सकता है।
जैन ने भी अपनी पकड़ का परिचय दिया
मोदगिल को मेयर का उम्मीदवार बनने से पूर्व सांसद सत्यपाल जैन ने भी पार्टी में अपनी पकड़ का परिचय दिया है। सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों जैन अहमदाबाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को मिले थे, वहीं से देवेश मोदगिल की दावेदारी को मजबूत कर दिया था। सत्यपाल जैन संजय टंडन के खिलाफ हैं। जैन सांसद किरण खेर को ही फिर से टिकट देने के समर्थन में हैं। जैन के सुझावों पर कई साल से टंडन गुट भारी था, लेकिन पहली बार जैन ने मोदगिल को मेयर बनवाकर अपनी पार्टी में मजबूती बता दी है। जैन मोदगिल के राजनीतिक गुरू भी हैं।
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पिछले तीन साल में पहली बार टंडन की नहीं चली
भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन हाईकमान के खासमखास और काफी मजबूत स्थिति में भी हैं। पिछले तीन साल में यह पहली बार हुआ है कि जब किसी निर्णय में भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन की नहीं मानी गई। पिछले साल हुए नगर निगम चुनाव में टंडन ने 14 समर्थकों को टिकट दिलवाई थी। उसके बाद प्रशासन की ओर से नियुक्त 9 मनोनीत पार्षदों में से छह टंडन की सिफारिश पर बने।
टंडन देशभर में अकेले ऐसे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हैं, जिनका दो बार का कार्यकाल पूरा हो चुका है। कार्यकाल पूरा होने के दो साल बाद भी वह एक्सटेंशन पर चल रहे हैं, लेकिन मेयर चुनाव में मोदगिल को उम्मीदवार तय कर पार्टी हाईकमान ने टंडन गुट को राजनीतिक तौर पर कमजोर करने का प्रयास किया है। मालूम हो कि पार्टी पर भी टंडन का पूरी तरह से कब्जा है।
इससे पहले खेर ने नेगी को बनवाया था उम्मीदवार
2015 में सांसद किरण खेर ने हीरा नेगी को भाजपा का मेयर उम्मीदवार बनवाया था, लेकिन उस समय गुटबाजी के कारण नेगी मेयर का चुनाव हार गई थी। उस समय खेर ने भी हराने के लिए टंडन गुट के पार्षदों को जिम्मेवार बताया था। पिछले दो मेयर के उम्मीदवार भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन के कहने पर ही बने, लेकिन इस बार सांसद किरण खेर की चली है।
1999 में जीता था बागी उम्मीदवार
साल 1999 में केवल कृष्ण आदीवाल ने बगावत करके मेयर पद के लिए नामांकन भरा था और उन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार राजेंद्र को हरा दिया था। उस समय शहर में भाजपा के प्रभारी नरेंद्र मोदी थे। आदीवाल जीतने के बाद भी भाजपा में ही रहे। कोर ग्रुप की बैठक में उपाध्यक्ष रघुवीर लाल अरोड़ा ने इस पुरानी बात को भी दोहराया। साल 2001 में भी कांग्रेस ने भाजपा की गुटबाजी के कारण तीन पार्षदों के दम पर मेयर की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था।
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हालांकि, मोदगिल को मेयर का उम्मीदवार घोषित करवाकर सांसद किरण खेर ने बाजी मार ली है। बुधवार को हुए हंगामे ने साबित कर दिया है लोकसभा चुनाव तक गुटबाजी अब ज्यादा बढ़ेगी। भाजपा को इस साल के अंत या फिर नए साल के शुरुआत में लोकसभा चुनाव होने की उम्मीद है, इसलिए नए चुने गए मेयर का काफी अहम रोल होगा। नया मेयर अपने कामों से किसी भी सीनियर नेता और लोकसभा के टिकट दावेदार को प्रमोट कर सकता है।
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जैन ने भी अपनी पकड़ का परिचय दिया
मोदगिल को मेयर का उम्मीदवार बनने से पूर्व सांसद सत्यपाल जैन ने भी पार्टी में अपनी पकड़ का परिचय दिया है। सूत्रों का कहना है कि पिछले दिनों जैन अहमदाबाद में राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को मिले थे, वहीं से देवेश मोदगिल की दावेदारी को मजबूत कर दिया था। सत्यपाल जैन संजय टंडन के खिलाफ हैं। जैन सांसद किरण खेर को ही फिर से टिकट देने के समर्थन में हैं। जैन के सुझावों पर कई साल से टंडन गुट भारी था, लेकिन पहली बार जैन ने मोदगिल को मेयर बनवाकर अपनी पार्टी में मजबूती बता दी है। जैन मोदगिल के राजनीतिक गुरू भी हैं।
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पिछले तीन साल में पहली बार टंडन की नहीं चली
भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन हाईकमान के खासमखास और काफी मजबूत स्थिति में भी हैं। पिछले तीन साल में यह पहली बार हुआ है कि जब किसी निर्णय में भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन की नहीं मानी गई। पिछले साल हुए नगर निगम चुनाव में टंडन ने 14 समर्थकों को टिकट दिलवाई थी। उसके बाद प्रशासन की ओर से नियुक्त 9 मनोनीत पार्षदों में से छह टंडन की सिफारिश पर बने।
टंडन देशभर में अकेले ऐसे भाजपा प्रदेश अध्यक्ष हैं, जिनका दो बार का कार्यकाल पूरा हो चुका है। कार्यकाल पूरा होने के दो साल बाद भी वह एक्सटेंशन पर चल रहे हैं, लेकिन मेयर चुनाव में मोदगिल को उम्मीदवार तय कर पार्टी हाईकमान ने टंडन गुट को राजनीतिक तौर पर कमजोर करने का प्रयास किया है। मालूम हो कि पार्टी पर भी टंडन का पूरी तरह से कब्जा है।
इससे पहले खेर ने नेगी को बनवाया था उम्मीदवार
2015 में सांसद किरण खेर ने हीरा नेगी को भाजपा का मेयर उम्मीदवार बनवाया था, लेकिन उस समय गुटबाजी के कारण नेगी मेयर का चुनाव हार गई थी। उस समय खेर ने भी हराने के लिए टंडन गुट के पार्षदों को जिम्मेवार बताया था। पिछले दो मेयर के उम्मीदवार भाजपा अध्यक्ष संजय टंडन के कहने पर ही बने, लेकिन इस बार सांसद किरण खेर की चली है।
1999 में जीता था बागी उम्मीदवार
साल 1999 में केवल कृष्ण आदीवाल ने बगावत करके मेयर पद के लिए नामांकन भरा था और उन्होंने पार्टी के अधिकृत उम्मीदवार राजेंद्र को हरा दिया था। उस समय शहर में भाजपा के प्रभारी नरेंद्र मोदी थे। आदीवाल जीतने के बाद भी भाजपा में ही रहे। कोर ग्रुप की बैठक में उपाध्यक्ष रघुवीर लाल अरोड़ा ने इस पुरानी बात को भी दोहराया। साल 2001 में भी कांग्रेस ने भाजपा की गुटबाजी के कारण तीन पार्षदों के दम पर मेयर की कुर्सी पर कब्जा कर लिया था।