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उभरते हुए बिजनेस इकोसिस्टम में बिहार से भी पीछे है चंडीगढ़
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चंडीगढ़। व्यापार सुधार कार्य योजना (बीआरएपी) 2020 के कार्यान्वयन के आधार पर केंद्र सरकार ने टॉप अचीवर, अचीवर, आकांक्षी और उभरते हुए राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों की घोषणा की है। हैरानी की बात है कि देश का पहला और सबसे योजनाबद्ध शहर चंडीगढ़ उभरते हुए बिजनेस ईको सिस्टम की श्रेणी में बिहार से भी पीछे है। यह चिंता की बात है। शहर के उद्योगपतियों का मानना है कि ऐसा प्रशासन की नीतियों की वजह से हुआ है।
केंद्र की सूची में आंध्र प्रदेश, गुजरात और हरियाणा टॉप अचीवर हैं। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र को अचीवर की श्रेणी में रखा गया है। असम, छत्तीसगढ़, गोवा को आकांक्षी श्रेणी और अंडमान और निकोबार, बिहार, चंडीगढ़ को उभरते हुए बिजनेस ईको सिस्टम में रखा गया है। शहर के लिए बड़ी चिंता की बात है लेकिन बिहार से पीछे होने पर चंडीगढ़ के उद्योगपति हैरान नहीं हैं। उनका कहना है कि ये तो होना ही था क्योंकि प्रशासन के अधिकारियों का कभी भी शहर के उद्योगों पर ध्यान ही नहीं गया। सभी हेरिटेज को लेकर चिंतित रहते हैं लेकिन लगातार उद्योगों का पलायन हो रहा है, उस पर किसी का ध्यान नहीं।
प्रशासनिक स्तर पर भी अनदेखी की गई है। अधिकारियों की बेरुखी की वजह से औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो से करीब आधे उद्योग मोहाली, पंचकूला, डेराबस्सी, बद्दी शिफ्ट हो चुके हैं। ईज ऑफ डूइंग रैंकिंग में भी चंडीगढ़ लगातार पिछड़ रहा है। शहर के कई उद्योगपति अपने काम को बंद कर इस आस में हैं कि प्रशासन उनके लिए कोई राहत की नीति लेकर आएगा। बता दें बीआरएपी एक तरह का इंडेक्स है, जिसमें कारोबार सुगमता के लिए कई तरह के पैमाने रखे गए हैं। इनमें लेबर रेगुलेशन, ऑनलाइन सिंगल विंडो, सूचनाओं तक पहुंच, पारदर्शिता आदि शामिल हैं।
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पिछड़ने के पीछे ये हैं बड़े कारण
- वर्ष 2015 में इंडस्ट्रियल पॉलिसी बनी, फरवरी 2019 में मंजूर हुई लेकिन आज तक पूरी तरह से लागू नहीं
- कई वर्षों से इंडस्ट्रियल प्लॉट्स के लीज होल्ड से फ्री होल्ड का मुद्दा लटका
- टाइटल क्लियर नहीं होने से उद्योगपति परेशान, लोन तक नहीं मिल रहा
- ट्रांसफर फीस बहुत ज्यादा, अधिकतर उद्योग पलायन कर चुके हैं
- युवा प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन आज तक नहीं बना पाया स्टार्टअप पॉलिसी
व्यापारियों से बातचीत
चंडीगढ़ में काम करना बहुत मुश्किल
उद्योगपतियों के लिए चंडीगढ़ में काम करना बहुत मुश्किल है। एस्टेट ऑफिस को हर काम में बीच में रखा हुआ है, जिसकी वजह से कई साल से काम अटके हुए हैं। इमटेक, पेक, पीयू जैसे कई महत्वपूर्ण संस्थान चंडीगढ़ में हैं फिर भी हम पीछे हैं। ये सोचने वाली बात है। निदेशक उद्योग को नोडल ऑफिसर बनाना चाहिए, ताकि उद्योगपतियों को इधर-उधर न भागना पड़े।
- नवीन मंगलानी, पूर्व अध्यक्ष, चैंबर ऑफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज
यहां पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नहीं
चंडीगढ़ पीछे इसलिए है, क्योंकि यहां पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नहीं है। उद्योगपतियों को कई मामलों में मुश्किलें आ रही हैं। कई उद्योगपति-व्यापारी कोर्ट के चक्करों में पड़े हैं। कई मांगे प्रशासनिक स्तर पर लंबित पड़ी हैं। सबसे बड़ा मुद्दा लीज होल्ड से फ्री होल्ड का है। इसकी वजह से कई उद्योगपति चंडीगढ़ छोड़ कर मोहाली और पंचकूला जा चुके हैं। चंडीगढ़ एक प्लान और स्मार्ट सिटी है। इसे तो सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में होना चाहिए।
- चंदर वर्मा, चेयरमैन, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल कन्वर्टेड प्लॉट ओनर्स एसोसिएशन
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केंद्र की सूची में आंध्र प्रदेश, गुजरात और हरियाणा टॉप अचीवर हैं। हिमाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र को अचीवर की श्रेणी में रखा गया है। असम, छत्तीसगढ़, गोवा को आकांक्षी श्रेणी और अंडमान और निकोबार, बिहार, चंडीगढ़ को उभरते हुए बिजनेस ईको सिस्टम में रखा गया है। शहर के लिए बड़ी चिंता की बात है लेकिन बिहार से पीछे होने पर चंडीगढ़ के उद्योगपति हैरान नहीं हैं। उनका कहना है कि ये तो होना ही था क्योंकि प्रशासन के अधिकारियों का कभी भी शहर के उद्योगों पर ध्यान ही नहीं गया। सभी हेरिटेज को लेकर चिंतित रहते हैं लेकिन लगातार उद्योगों का पलायन हो रहा है, उस पर किसी का ध्यान नहीं।
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प्रशासनिक स्तर पर भी अनदेखी की गई है। अधिकारियों की बेरुखी की वजह से औद्योगिक क्षेत्र-एक और दो से करीब आधे उद्योग मोहाली, पंचकूला, डेराबस्सी, बद्दी शिफ्ट हो चुके हैं। ईज ऑफ डूइंग रैंकिंग में भी चंडीगढ़ लगातार पिछड़ रहा है। शहर के कई उद्योगपति अपने काम को बंद कर इस आस में हैं कि प्रशासन उनके लिए कोई राहत की नीति लेकर आएगा। बता दें बीआरएपी एक तरह का इंडेक्स है, जिसमें कारोबार सुगमता के लिए कई तरह के पैमाने रखे गए हैं। इनमें लेबर रेगुलेशन, ऑनलाइन सिंगल विंडो, सूचनाओं तक पहुंच, पारदर्शिता आदि शामिल हैं।
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पिछड़ने के पीछे ये हैं बड़े कारण
- वर्ष 2015 में इंडस्ट्रियल पॉलिसी बनी, फरवरी 2019 में मंजूर हुई लेकिन आज तक पूरी तरह से लागू नहीं
- कई वर्षों से इंडस्ट्रियल प्लॉट्स के लीज होल्ड से फ्री होल्ड का मुद्दा लटका
- टाइटल क्लियर नहीं होने से उद्योगपति परेशान, लोन तक नहीं मिल रहा
- ट्रांसफर फीस बहुत ज्यादा, अधिकतर उद्योग पलायन कर चुके हैं
- युवा प्रतिभा को बढ़ावा देने के लिए प्रशासन आज तक नहीं बना पाया स्टार्टअप पॉलिसी
व्यापारियों से बातचीत
चंडीगढ़ में काम करना बहुत मुश्किल
उद्योगपतियों के लिए चंडीगढ़ में काम करना बहुत मुश्किल है। एस्टेट ऑफिस को हर काम में बीच में रखा हुआ है, जिसकी वजह से कई साल से काम अटके हुए हैं। इमटेक, पेक, पीयू जैसे कई महत्वपूर्ण संस्थान चंडीगढ़ में हैं फिर भी हम पीछे हैं। ये सोचने वाली बात है। निदेशक उद्योग को नोडल ऑफिसर बनाना चाहिए, ताकि उद्योगपतियों को इधर-उधर न भागना पड़े।
- नवीन मंगलानी, पूर्व अध्यक्ष, चैंबर ऑफ चंडीगढ़ इंडस्ट्रीज
यहां पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नहीं
चंडीगढ़ पीछे इसलिए है, क्योंकि यहां पर ईज ऑफ डूइंग बिजनेस नहीं है। उद्योगपतियों को कई मामलों में मुश्किलें आ रही हैं। कई उद्योगपति-व्यापारी कोर्ट के चक्करों में पड़े हैं। कई मांगे प्रशासनिक स्तर पर लंबित पड़ी हैं। सबसे बड़ा मुद्दा लीज होल्ड से फ्री होल्ड का है। इसकी वजह से कई उद्योगपति चंडीगढ़ छोड़ कर मोहाली और पंचकूला जा चुके हैं। चंडीगढ़ एक प्लान और स्मार्ट सिटी है। इसे तो सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में होना चाहिए।
- चंदर वर्मा, चेयरमैन, चंडीगढ़ इंडस्ट्रियल कन्वर्टेड प्लॉट ओनर्स एसोसिएशन