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संभल जाएं: नहाने के बाद डियो लगाने की आदत है खराब... पूरा दिन महकने की चाह में त्वचा पर पड़ेगा ऐसा दुष्प्रभाव
Tue, 12 Sep 2023 02:27 AM IST
चंडीगढ़ ब्यूरो
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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Published by: चंडीगढ़ ब्यूरो
Updated Tue, 12 Sep 2023 02:27 AM IST
सार
त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास शर्मा का कहना है कि नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा प्रकाशित हालिया शोध से पता चलता है कि इनके लगातार उपयोग से संवेदनशील कोशिकाओं को नुकसान हो सकता है। डियो सुबह की दिनचर्या का एक नियमित हिस्सा बन चुका है।
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deodorant
विस्तार
डियो को बनाने में एल्यूमीनियम, अल्कोहल, आर्टिफिशियल एसेंस और कई तरह के पैराबींस का उपयोग किया जाता है जो त्वचा के लिए नुकसानदेह होते हैं। इसके इस्तेमाल से त्वचा पर लाल दाने, खुजली, रैशेज, जलन की समस्या हो सकती है। कई बार डियो के साइड इफेक्ट इतने ज्यादा हो जाते हैं कि त्वचा पर पपड़ी जमने लगती है। त्वचा पर सूजन और लालिमा भी आ सकती है। त्वचा रोग विशेषज्ञों का कहना है कृत्रिम रूप से खूशबू पाने की चाह त्वचा के साथ ही शारीरिक सेहत को प्रभावित कर सकती है।
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जीएमएसएच-16 के त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. मंजीत सिंह का कहना है कि गर्मी में इस तरह की परेशानी काफी बढ़ जाती है। युवा खुद को तरोताजा दिखाने के चक्कर में दिन में तीन से चार बार डियो का उपयोग कर रहे हैं जिससे त्वचा संबंधी परेशानी तेजी से बढ़ रही है। वहीं, पीजीआई के त्वचा रोग विशेषज्ञ विग्नेश का कहना है कि डियो के हानिकारक तत्व शरीर के अच्छे बैक्टीरिया को भी मार देते हैं जिससे कई तरह की परेशानी शुरू हो जाती है।
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युवा के साथ बच्चे भी शौकीन
त्वचा रोग विशेषज्ञ डॉ. विकास शर्मा का कहना है कि नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन द्वारा प्रकाशित हालिया शोध से पता चलता है कि इनके लगातार उपयोग से संवेदनशील कोशिकाओं को नुकसान हो सकता है। एक हालिया सर्वेक्षण से पता चला है कि केवल वयस्क ही नहीं, 11 वर्ष से कम उम्र के 50 प्रतिशत बच्चे भी डियो का उपयोग करते हैं। ऐसे में एक बात ठीक से समझनी जरूरी है कि शरीर की दुर्गंध का कारण पसीना नहीं है, बल्कि त्वचा पर मौजूद बैक्टीरिया हैं जो पसीने को खाते हैं। डियो सुबह की दिनचर्या का एक नियमित हिस्सा बन चुका है। युवा जिम जाने या घर से बाहर जाने से पहले डियो जरूर लगा रहे हैं। इसकी अधिकता परेशानी बन रही है।
डियो इसलिए है हानिकारक
डिओडोरेंट्स और एंटीपर्सपिरेंट्स का उपयोग करने से रोम छिद्र बंद हो सकते हैं। ये स्थिति पसीने के माध्यम से विषाक्त पदार्थों को निकलने से रोक देती है। डॉ. विकास ने बताया कि प्रोपलीन ग्लाइकोल एक न्यूरोटॉक्सिन और त्वचा में जलन पैदा करने वाला पदार्थ है। यह केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, हृदय और यकृत को नुकसान पहुंचा सकता है। इनके कारण कई बार त्वचा में घाव या अजीब तरह के निशान भी बन जाते हैं। जिनमें बैक्टीरिया पनप सकते हैं। इनमें मौजूद कुछ केमिकल सेहत को बिगाड़कर, हार्मोन्स में असंतुलन पैदा कर सकते हैं। इससे कई गंभीर बिमारियों का खतरा बढ़ सकता है।