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आशुतोष महाराज समर्थकों के बड़ी संख्या में जमा होने पर हाईकोर्ट ने जताई आपत्ति

Tue, 24 Jan 2017 10:28 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़
ब्यूरो/अमर उजाला, चंडीगढ़ Updated Tue, 24 Jan 2017 10:28 PM IST
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Ashutosh Maharaj case, punjab and haryana highcourt
आशुतोष महाराज - फोटो : File Photo
दिव्य ज्योति जागृति संस्थान नूरमहल जालंधर के संस्थापक आशुतोष महाराज के अंतिम संस्कार के आदेश को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई के दौरान समर्थकों के भारी संख्या में कोर्ट रूम में मौजूद रहने पर पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने आपत्ति जताई। कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार से कोर्ट पर दबाव बनाने का प्रयास न किया जाए, इस तरह की हरकत से अपना हित साधने की सोचे भी नहीं। इसपर संस्थान के वकील ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि अगली सुनवाई से जो लोग आवश्यक हैं, केवल वे ही कोर्ट आएंगे। 
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सुनवाई आरंभ होते ही दिव्य ज्योति जागृति संस्थान की ओर से अपना पक्ष रखा गया। संस्थान की ओर से कहा गया कि परंपरा के अनुसार ही आशुतोष महाराज के बेटे ने पिता के अंतिम संस्कार को हक बताते हुए शरीर सुपुर्द करने की अपील की है। परंपरा को निभाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है और यदि ऐसा होता तो जयललिता का भी अंतिम संस्कार किया जाता परंतु जय ललिता के समर्थकों के चलते उनके शरीर का निपटारा करने के लिए अलग विधि अपनाई गई। यदि परंपरा की बात की जाए तो कल कोई भी कोर्ट आकर उनके अंतिम संस्कार के लिए आदेश जारी करने की अनुमति मांग सकता है।
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हाईकोर्ट ने कहा कि यदि कोई कोर्ट जाना चाहता है तो उसे रोका नहीं जा सकता है, जयललिता के मामले में भी कोई किसी को याचिका डालने से नहीं रोक सकता है। संस्थान ने कहा कि हाईकोर्ट ने पूछा था कि आशुतोष महाराज के संन्यासी होने का क्या प्रमाण है, ऐसे किसी प्रमाण को साक्ष्य के रूप में पेश किया जाना बहुत मुश्किल है। 
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'इस तरह से संख्या दिखाकर कोर्ट पर दबाव बनाने का प्रयास न करें'

Ashutosh Maharaj case, punjab and haryana highcourt
Punjab And Haryana Highcourt Chandigarh - फोटो : File Photo
इस पर हाईकोर्ट ने कहा कि यह समस्या है कि संत की कोई निश्चित परिभाषा नहीं है और कोई भी खुद को संन्यासी घोषित कर देता है। हिंदू धर्म में इस बात को लेकर कोई स्पष्टीकरण नहीं है। संस्थान की ओर से दलील आगे बढ़ाते हुए कहा गया कि जब परंपरा निभाने की कोई कानूनी बाध्यता नहीं है और ऐसी कोई बाध्यता नहीं है कि शरीर का अंतिम संस्कार अनिवार्य है तो ऐसे में समर्थकों के विश्वासन को न तोड़ते हुए आशुतोष महाराज के शरीर को संरक्षित रखने की अनुमति दी जाए। वैसे भी जहां अनिवार्य नहीं है, वहां ड्यूटी निभाने के लिए राज्य को आदेश जारी नहीं किए जा सकते। 

हाईकोर्ट ने कहा कि विश्वास मामले में कोर्ट का हस्तक्षेप संभव है क्योंकि हाल ही में दो मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश की हाईकोर्ट ने अनुमति दी थी, जहां मान्यता के अनुसार महिलाओं का प्रवेश वर्जित था। संस्थान ने कहा कि वहां मामला भेदभाव का था, जो संविधान के अनुसार अवैध है। यहां आशुतोष महाराज के शरीर को संरक्षित रखने से किसी अन्य के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं हो रहा है। 

इसी बीच संस्थान ने दलील दी कि सिंगल बेंच ने आशुतोष महाराज के शरीर का निपटारा करने के आदेशों में यह कहा था कि वे समाधि के विषय से हटकर अपना निर्णय दे रहे हैं और शरीर को मृत मानकर शरीर का निपटारा करने के आदेश जारी कर दिए। जिन 3 जजमेंट को अपने आदेशों में सिंगल बेंच ने आधार बनाया था, उनका सीधे इस मामले से कोई लेना देना नहीं है। संस्थान ने कहा कि तीन साल बीत गए हैं और शरीर को संरक्षित करके रखा गया है। किसी भी प्रकार की कोई हिंसा या किसी भी तरह से लॉ एंड ऑर्डर बिगड़ने की कोई स्थिति नहीं बनी है। ऐसे में लोगों को उनके विश्वास के साथ छोड़ दिया जाए। पंजाब सरकार ने इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि संस्थान ने जिस तरह से आशुतोष महाराज के शरीर को संरक्षित रखा है वह आदर्श स्थिति है और इस प्रकार से उनके शरीर को अनिश्चितकाल के लिए संरक्षित किया जा सकता है। संस्थान की दलीलें पूरी होने के बाद अन्य पक्षों को सुनने के लिए 7 फरवरी को सुनवाई निर्धारित की है।
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