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पीजीआई में पहली बार पांच महीने के बच्चे का बोन मैरो ट्रांसप्लांट
आशीष वर्मा/अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़
Updated Mon, 25 Jul 2016 01:00 AM IST
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bone marrow transplant CHILD
- फोटो : amar ujala
पीजीआई ने मात्र पांच महीने के बच्चे का बोन मैरो ट्रांसप्लांट करने में सफलता हासिल की है। यह पहली बार है जब पीजीआई ने पांच महीने के बच्चे का बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया है। अब बच्चा पूरी तरह से ठीक है। डाक्टरों का दावा है कि एक साल तक बच्चे को दिक्कत आ सकती है, इसलिए उसकी सावधानीपूर्वक केयर करनी होगी। उसे डिस्चार्ज भी कर दिया गया है। बच्चे के पेरेंट्स का कहना है कि पीजीआई के डाक्टरों ने उनके बेटे को नई जिंदगी दी है।
बार-बार हो रहा था पीलिया-निमोनिया
पांच महीने के हरमन के पिता संदीप कांबोज ने बताया कि जन्म के बाद उनके बेटे को पीलिया हो गया। करनाल में प्राइवेट डाक्टर ने पांच से छह दिन तक इलाज किया और वापस भेज दिया। घर पर आने वह एक दो दिन ठीक रहा। बाद में उसकी छाती से आवाज आने लगी। खूनी दस्त की भी शिकायत हो गई। इसके बाद उसे पीजीआई लेकर आ गए। टेस्ट किया तो पता चला कि हरमन सीवियर कम्बाइंड इम्यूनोडिफिसिएंसी (स्किड) से पीड़ित है, जिसकी वजह से उसे निमोनिया और इंफेक्शन हो रहा है। इससे बहुत ही कम लोग पीड़ित होते हैं। इसका इलाज ही बोन मेरो ट्रांसप्लांट है।
अमेरिका भेजे गए सैंपल, पिता के मैच हुए टिश्यू
बोन मेरो ट्रांसप्लांट के लिए एचएलए टाइपिंग (टिश्यू मैच) टेस्ट कराने का फैसला लिया गया। हरमन के पिता, मां और बहन के लार के सैंपल जांच के लिए अमेरिका की लैब हिस्टोजेनेटिक्स भेजे गए। जब रिपोर्ट आई तो बताया गया कि हरमन और उसके पिता के सैंपल मैच हो गए हैं। सैंपल टेन प्लस टेन मैच हुए, जो बहुत ही कम केसों में देखने को मिलता है। उसके बाद पीजीआई ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट करने की तैयारी शुरू कर दी।
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बार-बार हो रहा था पीलिया-निमोनिया
पांच महीने के हरमन के पिता संदीप कांबोज ने बताया कि जन्म के बाद उनके बेटे को पीलिया हो गया। करनाल में प्राइवेट डाक्टर ने पांच से छह दिन तक इलाज किया और वापस भेज दिया। घर पर आने वह एक दो दिन ठीक रहा। बाद में उसकी छाती से आवाज आने लगी। खूनी दस्त की भी शिकायत हो गई। इसके बाद उसे पीजीआई लेकर आ गए। टेस्ट किया तो पता चला कि हरमन सीवियर कम्बाइंड इम्यूनोडिफिसिएंसी (स्किड) से पीड़ित है, जिसकी वजह से उसे निमोनिया और इंफेक्शन हो रहा है। इससे बहुत ही कम लोग पीड़ित होते हैं। इसका इलाज ही बोन मेरो ट्रांसप्लांट है।
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अमेरिका भेजे गए सैंपल, पिता के मैच हुए टिश्यू
बोन मेरो ट्रांसप्लांट के लिए एचएलए टाइपिंग (टिश्यू मैच) टेस्ट कराने का फैसला लिया गया। हरमन के पिता, मां और बहन के लार के सैंपल जांच के लिए अमेरिका की लैब हिस्टोजेनेटिक्स भेजे गए। जब रिपोर्ट आई तो बताया गया कि हरमन और उसके पिता के सैंपल मैच हो गए हैं। सैंपल टेन प्लस टेन मैच हुए, जो बहुत ही कम केसों में देखने को मिलता है। उसके बाद पीजीआई ने बोन मैरो ट्रांसप्लांट करने की तैयारी शुरू कर दी।
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बच्चे के लिए जमीन गिरवी रखी, मदद की दरकार
bone marrow transplant CHILD
- फोटो : amar ujala
पहले इंफेक्शन को कंट्रोल किया, फिर ट्रांसप्लांट
हरमन को जबरदस्त इंफेक्शन था। तेज बुखार, एनल में इंफेक्शन, दस्त में खून आना जैसे लक्षण आ रहे थे। डाक्टरों ने पहले उसे कंट्रोल किया। इस दौरान अमेरिका के डाक्टरों से भी कंसलटेंट किया गया। उसे हरमन को कीमो देकर उसके शरीर के सेल्स खत्म किए गए। फिर उसके पिता के बोन मैरो लेकर हरमन के शरीर में ट्रांसप्लांट किए गए। इस दौरान उसे काफी परेशानी आई। हरमन की स्किन उतरने लगी और उसे डायरिया भी हो गया। डाक्टरों के मुताबिक जब शरीर में बाहरी सेल्स इंजेक्ट किए जाते हैं तो उस शरीर के सेल्स के बीच लड़ाई होती है, जिससे इंफेक्शन होने के चांस बढ़ते हैं।
बच्चे के लिए जमीन गिरवी रखी, मदद की दरकार
हरमन के पिता संदीप कांबोज मूल रूप से करनाल के फूसगढ़ में रहते हैं। वे खेती-बाड़ी करते हैं। इलाज में करीब आठ लाख रुपय खर्च हो चुका है। इसके लिए उन्होंने अपनी डेढ़ किले जमीन गिरवी रख दी है। इस जमीन से जो रुपया आया, वह भी कम पड़ गया। बाद में ढाई लाख रुपया और उधार लिया। अभी इलाज में और खर्चा होना है। संदीप ने हरियाणा सरकार से मदद की गुहार लगाई है। पीएम फंड के लिए भी उसने अप्लाई किया, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला है।
पीजीआई के डाक्टरों ने फैमिली की तरह रखा
संदीप ने बताया कि उसका बेटा तीन महीने तक पीजीआई में दाखिल रहा। डाक्टरों ने उसके बेटे को फैमिली के एक सदस्य की तरह रखा। इंटरनल मेडिसिन की डाक्टर अलका खंडवाल ने देर रात तक सिर्फ बच्चे के लिए ही अस्पताल में रुकती थीं। सभी जूनियर डाक्टरों ने भी पूरी मदद की। नर्सिंग स्टाफ ने भी बच्चे की बहुत केयर की।
हरमन को जबरदस्त इंफेक्शन था। तेज बुखार, एनल में इंफेक्शन, दस्त में खून आना जैसे लक्षण आ रहे थे। डाक्टरों ने पहले उसे कंट्रोल किया। इस दौरान अमेरिका के डाक्टरों से भी कंसलटेंट किया गया। उसे हरमन को कीमो देकर उसके शरीर के सेल्स खत्म किए गए। फिर उसके पिता के बोन मैरो लेकर हरमन के शरीर में ट्रांसप्लांट किए गए। इस दौरान उसे काफी परेशानी आई। हरमन की स्किन उतरने लगी और उसे डायरिया भी हो गया। डाक्टरों के मुताबिक जब शरीर में बाहरी सेल्स इंजेक्ट किए जाते हैं तो उस शरीर के सेल्स के बीच लड़ाई होती है, जिससे इंफेक्शन होने के चांस बढ़ते हैं।
बच्चे के लिए जमीन गिरवी रखी, मदद की दरकार
हरमन के पिता संदीप कांबोज मूल रूप से करनाल के फूसगढ़ में रहते हैं। वे खेती-बाड़ी करते हैं। इलाज में करीब आठ लाख रुपय खर्च हो चुका है। इसके लिए उन्होंने अपनी डेढ़ किले जमीन गिरवी रख दी है। इस जमीन से जो रुपया आया, वह भी कम पड़ गया। बाद में ढाई लाख रुपया और उधार लिया। अभी इलाज में और खर्चा होना है। संदीप ने हरियाणा सरकार से मदद की गुहार लगाई है। पीएम फंड के लिए भी उसने अप्लाई किया, लेकिन कोई उत्तर नहीं मिला है।
पीजीआई के डाक्टरों ने फैमिली की तरह रखा
संदीप ने बताया कि उसका बेटा तीन महीने तक पीजीआई में दाखिल रहा। डाक्टरों ने उसके बेटे को फैमिली के एक सदस्य की तरह रखा। इंटरनल मेडिसिन की डाक्टर अलका खंडवाल ने देर रात तक सिर्फ बच्चे के लिए ही अस्पताल में रुकती थीं। सभी जूनियर डाक्टरों ने भी पूरी मदद की। नर्सिंग स्टाफ ने भी बच्चे की बहुत केयर की।