32 मिनट में देखिए सारी रिसर्च, अब कहां से निकलेगी सरस्वती?
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सरस्वती नदी की धारा को जन-जन तक पहुंचाने का जिम्मा चाणक्य ने संभाला है। सरस्वती पुत्रों तक ये धारा 32 मिनट की एक डाक्यूमेंटरी फिल्म के जरिए पहुंचेंगी। यह भगीरथ प्रयास बालीवुड और छोटे पर्दे की नामचीन हस्ती डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी कर रहे हैं।
जाहिर है कि दो दशक पहले दिल्ली दूरदर्शन के बहुचर्चित सीरियल चाणक्य के जरिए डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी चर्चा में आए थे। उनके कार्य की सराहना भारत-पाक विभाजन पर बनी बालीवुड फिल्म पिंजर के लिए भी जमकर हुई।
विशिष्ट शैली की फिल्में और सीरियल निर्माण के अलावा अभिनय के जरिए सुर्खियों में रहने वाले डॉ. चंद्रप्रकाश द्विवेदी महाभारत पर आधारित मृत्युंजय, गंगा जैसे सीरियलों के अलावा सन्नी देयोल की फिल्म मुहल्ला अस्सी के लिए भी जाने जाते हैं।
बहरहाल डॉ. चंद्रप्रकाश और उनकी टीम सरस्वती नदी पर डाक्युमेंटरी लगभग पूरा कर चुकी है। नगर के निजी होटल में ठहरी इस टीम की जानकारी मिलने के बाद जब अमर उजाला ने डॉ. द्विवेदी से बात की तो उन्होंने फिल्म की जानकारी दी।
सरस्वती से जुड़ी शंकाओं का निवारण करेगी डोक्यूमेंट्री
भारतीय फिल्म सेंसर बोर्ड के सदस्य डॉ. चंद्रप्रकाश ने एक्सक्लूसिव बातचीत में बताया कि ये फिल्म उन शंकाओं का निवारण करेगी, जो संदेह सरस्वती नदी के अस्तित्व को लेकर जहन में पैदा होते है।
उन्होंने बताया कि सरस्वती पर डाक्यूमेंटरी फिल्म जल्द लोगों को देखने को मिलेगी, इसके फिल्मांकन में सरस्वती नदी के उद्गम स्थल आदीबद्री से लेकर गुजरात कच्छ के रण और अरब सागर तक किया गया है।
फिल्म निर्माण का कार्य लगभग पूरा हो चुका है, अब इस डाक्यूमेंटरी फिल्म का म्यूजिक तैयार किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि फिल्म थोड़ी लंबी बनाई गई है, लेकिन संपादित करके इसकी अवधि 30 से 32 मिनट रखी जाएगी।
पिछले दिनों जिला यमुनानगर के मुगलावाली में मिली सरस्वती की धारा पर डॉ. द्विवेदी ने कहा कि ये धारा अब नहीं मिली है, ये तो बहुत पहले से है, लेकिन लोगों को अब पता लगा है। उन्होंने कहा कि इस धरा पर पवित्र सरस्वती नदी का अस्तित्व है और इसका उद्गम स्थल आदीबद्री में है, इसे वैज्ञानिक और सरस्वती शोध संस्थान बहुत पहले प्रमाणित कर चुका है।
डॉ. द्विवेदी के अनुसार सरस्वती नदी की प्रमाणिकता के लिए वैज्ञानिकों, इतिहासकारों ने वर्षों पहले जो काम किया था, इनमें चेन्नई ने कल्याण रमण की भी विशेष भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि लोगों के संज्ञान में ये बहुत देरी से आया है कि सरस्वती इस देश की संस्कृति का अभिभाज्य अंग है।
12 लोगों की टीम कर रही है डोक्यूमेंट्री पर काम
डॉ. द्विवेदी ने कहा कि अब तक तो लोगों को संदेह था कि क्या सरस्वती है? पर वो समझे नहीं। उनके मुताबिक जैसे सिंधु है, गंगा है, उसी तरह सरस्वती एक नदी है, जिसने इस देश को हजारों वर्षों तक पल्लवित किया है, पोषित किया है, लेकिन दुर्भाग्यवश उसे हमने भुला दिया था। शायद इसलिए भुला दिया था, क्योंकि भारत के इतिहास पर हमेशा प्रश्न चिन्ह लगाए गए।
इसका नतीजा ये हुआ कि लोग पूछने लगे कहां है सरस्वती? कहां है सरस्वती? कहां है सरस्वती? किंतु सरस्वती हमें मिल गई है, ये प्रमाणिक भी हो चुकी है और अब वो अविवादित है। सरस्वती के किनारे भी जितने अवशेष मिले हैं, वे सिंधु घाटी के किनारे प्राप्त हुए अवशेषों से कहीं ज्यादा हैं।
अब प्रश्न है कि भारत की संस्कृति को सिंधु घाटी की सभ्यता कहना चाहिए या भारत की सभ्यता को सिंधु सरस्वती की सभ्यता कहा जाए, ये बड़ा मुद्दा है। मुझे लगता है कि आने वाले दिनों में हम ये कहेंगे कि हम सरस्वती तट के वासी है।
द्विवेदी ने बताया कि इस फिल्म के लिए एक पूरी टीम जुटी हुई है, जिसमें विशेष रूप से उनकी पत्नी मंदिरा कश्यप सहित मुख्य रूप से 12 लोग जुड़े हैं।