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इसलिए नवंबर के अंतिम सप्ताह से रहें सावधान

ज्योतिषशास्त्री / पण्डित जयगोविंद शास्त्री

बृहस्पति कल 7 नवंबर से वक्री हो गए हैं, चार माह बाद 6 मार्च 2014 को मार्गी होगें। इनका वक्री होना पृथ्वी वासियों के लिए अशुभ संकेत है। ये ज्ञान-आध्यात्म, शिक्षण संस्थाओं, धार्मिक कार्यों, धर्माचार्यों एवं शासन सत्ता के सलाहकारों के स्वामी हैं।

गुरु इस संवत्सर के राजा भी हैं और सलाहकार भी, जबकि इस वर्ष इनके मंत्री शनि हैं परिणाम स्वरुप सर्वोच्च सत्ता दिशाहीन रहेगी और मंत्रीगण अपनी मर्जी से जो चाहेंगें जैसा चाहेंगें वैसा करेंगें। अब संत समाज को अपने आचरण में और भी पवित्रता लानी चाहिए, अन्यथा मृत्यु लोक के दंडाधिकारी शनि इन लोगों को क्षमा करना के मूड में नही हैं।

पढ़ें, वक्री गुरू का आपकी राशि पर क्या प्रभाव पड़ेगा

इनका अधिक प्रभाव 23 नवंबर से शुरू होगा क्योंकि उसी दिन शनि उदय होंगे। परिणाम स्वरूप सरकार गिराने की भी गतिविधियां आरम्भ हो जाएंगी। इनकी स्थिति जन्म कुंडली में हमें आत्मबोध की ज्योति प्रदान करती हैं। इसलिए इनका वक्री होना, उच्च राशि अथवा नीचराशिगत होना, स्वगृही, मित्रगृही, दिग्बली, दृष्टि संबंधी आदि सब जीवन के अति महत्वपूर्ण अंग हैं।
    
जिनकी कुंडली में गुरु अशुभ भाव अथवा अशुभ राशि में हों वे इस अवधि में अधिक परेशान होंगें, क्योंकि अशुभ गुरु के समय व्यक्ति भावावेश में कई ऐसे निर्णय ले लेता है जो स्वयं उसी के लिए आत्मघाती सिद्ध होते हैं यहां तक कि सरकारें भी न्याय और नीति परक निर्णय लेने में असमर्थ हो जाती हैं।

पढ़ें, नवंबर महीने का राशिफल विस्तार से


इसलिए इनका वक्री होना गोचर कुंडली में बहुत मायने रखता है सभी राशि के लोंगों के लिए यह संकेत चाल-चेहरा एवं चरित्र की दृष्टि से सावधानी बरतने का हैं। वरना कठोर दंड मिल सकता है। अशुभ गुरु की शांति के लिए ॐ बृहस्पतये नमः का जप करें और गुरुवार के दिन पीले वस्त्र धारण करें।
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