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मेरा गांव मेरी शान: इतिहास समृद्ध विरासत, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गौरवशाली अतीत से परिपूर्ण है बहल

शाहिल शर्मा Updated Mon, 24 Aug 2026 09:03 PM IST

राजस्थान सीमा से सटे भिवानी जिले के प्रमुख गांव में से एक बहल कस्बा का इतिहास समृद्ध विरासत, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और गौरवशाली अतीत से परिपूर्ण है। जहां मुगलकालीन शासन में बहल का जिक्र है वहीं अंग्रेजी शासन में भी बहल को इसकी भोगौलिक महत्वता के चलते जनपद का गौरव हासिल था। बहल के इतिहास के बारे में जानकारों के अलग अलग मत है। पर, सर्वमान्य बात यह है कि बहल ने अपने काल में कई उतार चढ़ाव देखे हैं। बहल एक बार नहीं बसा है, यह कई बार उजड़ा और फिर से एक नए अध्याय के साथ बसा है। माना जा रहा है कि बहल के समृद्ध इतिहास में इस बात का संकेत है कि जहां शिल्पकारों ने इसे पहचान देने का काम किया तो संतों ने आध्यात्मिक चेतना प्रदान की। वहीं, शेखावत जागीरदारों और स्थानीय समाज ने इसे सामाजिक और आर्थिक स्वरूप को सुदृढ़ करने का काम किया। करीब एक हजार वर्ष से ज्यादा पुराने इतिहास वाले इस कस्बे का धार्मिक, व्यापारिक, साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र में ऐतिहासिक महत्व रहा है। सामरिक दृष्टि से कस्बे का विशेष महत्व होने की वजह से अंग्रेजी शासन में बहल को जिले का दर्जा प्राप्त था। दिल्ली और बिकानेर के व्यापारियों के लिए बहल एक सुरक्षित आश्रय स्थल रहा है और यही वजह रही कि दोनों बड़े शहरों के व्यापारियों के बीच पारस्परिक संबंध की कड़ी में बहल की खास भूमिका रही। पहले शील गोत्र के लोगों ने बसाया था बहल बहल का इतिहास किसी एक राजवंश, किसी एक समुदाय अथवा किसी एक युग तक सीमित नहीं है। इसकी ऐतिहासिक यात्रा प्राचीन भदानक (भण्डानक) जनपद से शुरू होकर चौहान साम्राज्य, दिल्ली सल्तनत, तैमूरी आक्रमण, लोदी शासन, जांगल प्रदेश, शेखावत जागीर, दशनामी संत परंपरा से आधुनिक काल तक निरंतर चलती रही है। वास्तविक परिचय किसी राजवंश या अन्य शासन, शासक से नहीं मिलता है वरन उन लोगों की जीवनी में मिलता है, जिन्होंने इस भूमि को बसाया, संवारा और इसे मिटने के बाद भी पुनर्जीवित करने का काम किया। जनश्रुति के अनुसार बहल का प्रारंभिक विकास शील गौत्रीय खाती शिल्पकारों के हाथों हुआ। उत्कृष्ट काष्ठ कला के सिद्धहस्त कारिगरों के रूप में इनकी पहचान थी। बैलों द्वारा खींची जाने वाली सुंदर लकड़ी की गाड़ी, जिसे स्थानीय बोली में बहली कहा जाता था, वो इनके शिल्प कौशल की पहचान थी और दूर दराज तक उसकी प्रसिद्धी थी। माना जाता है कि बहली शब्द ही कालांतर में बहल के नाम से प्रचलित हुआ। लेकिन, बाद में किसी कारणवश उनको बहल से जाना पड़ा। माना जा रहा है कि सत्रहवीं शताब्दी में सिद्ध संत बाबा गोविंद गिरी व उनके सहोदर एवं गुरु भाई बाबा गोपाल गिरी ने इस उजड़े क्षेत्र को फिर से अपनी तपस्या के बल पर जीवित किया और गोसाई मठ की स्थापना की।

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