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देवभूमि की अनूठी सांस्कृतिक विरासत है बग्वाल

Haldwani Bureau हल्द्वानी ब्यूरो
Updated Mon, 12 Aug 2019 11:12 PM IST
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Army of imperfections started getting ready for Bagwal
देवीधुरा बग्वाल मेले में मंदिर के परिक्रमा करते रणबांकुरे। (फाइल फोटो) - फोटो : CHAMPAWAT
चंपावत। जिले के बाराही धाम देवीधुरा में 15 अगस्त (स्वतंत्रता दिवस) को होने वाले बगवाल लिए चार खामों की सेनाएं तैयार होने लगी हैं। यहां का ऐतिहासिक खोलीखाड़ दुर्वाचौड़ मैदान एक बार फिर बगवाल के लिए सजने लगा है। इस मैदान में रक्षाबंधन के दिन दो पक्षों के बीच आमने-सामने युद्ध की अनूठी सांस्कृतिक परंपरा फिर से जीवंत रूप लेगी।
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ये है मान्यता
देवीधुरा का बगवाल यहां के लोगों की धार्मिक मान्यता का पवित्र रूप है। किंवदंती है कि एक वृद्धा के पौत्र का जीवन बचाने के लिए यहां के चारों खामों की विभिन्न जातियों के लोग आपस में युद्ध कर एक मानव के रक्त के बराबर खून बहाते हैं। क्षेत्र में रहने वाली विभिन्न जातियों में से चार प्रमुख खामों चम्याल, वालिक, गहरवाल और लमगडिय़ा के लोग पूर्णिमा के दिन पूजा अर्चना कर एक दूसरे को बगवाल का निमंत्रण देते हैं। कहा जाता है कि पूर्व में यहां नरबलि देने की प्रथा थी, लेकिन जब चम्याल खाम की एक वृद्धा के एकमात्र पौत्र की बलि देने की बारी आई तो वंश नाश के डर से उसने मां बाराही की तपस्या की। माता के प्रसन्न होने पर वृद्धा की सलाह पर चारों खामों के मुखियाओं ने आपस में युद्ध कर एक मानव के बराबर रक्त बहाकर कर पूजा करने की बात स्वीकार ली, तभी से ही बगवाल का सिलसिला चला आ रहा है।
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स्वयं को बचाकर दूसरे पर वार करना है बगवाल
चंपावत। बगवाल में भाग लेने के लिए रणबांकुरों को विशेष तैयारियां करनी होती हैं। बगवाल लाठी और रिंगाल की बनी ढालों से खेली जाती है। स्वयं को बचाकर दूसरे दल की ओर से फेंके गए फल, फूल या पत्थर को फिर से दूसरी ओर फेंकना ही बगवाल कहलाता है।
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अब फल और फूलों से खेली जाती है बगवाल
चंपावत। अतीत से ही आषाड़ी कौतिक के नाम से मशहूर देवीधुरा की बगवाल को देखने देश-विदेश के हजारों पर्यटक और श्रद्धालु देवीधुरा पहुंचते हैं। पांच वर्ष पूर्व तक बगवाल पत्थरों से खेली जाती थी, लेकिन हाईकोर्ट के रोक लगाने के बाद अब फल और फूलों से बगवाल युद्ध लड़ा जा रहा है।
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