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कुफ्रके छंटे बादल आमना घराने से...
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
Updated Mon, 05 Oct 2015 11:56 PM IST
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उझारी नगर में चल रहे हजरत शेख दाउद मियां बंदगी के उर्स के चौथी रात को आल इंडिया मुशायरे का आयोजन किया गया। मुशायरे में नातिया दौर की शमा चौ. बब्बी ने रोशन की और गजल के दौर की शमा राज्यमंत्री कमाल अख्तर ने रोशन की। मुशायरे का आगाज तिलावते कलामे पाक से किया गया।
झांसी से आए सरवर कमाल ने पढ़ा कि, कुफ्र के छंटे बादल आमना घराने से, सारा जग हुआ रोशन मुस्तफा के आने से। अल्ताफ जिया ने कहा, जिसे कहते हैं जन्नत मैं वो जीना देख लेता हूं, जब आंखें बंद करता हूं मदीना देख लेता हूं। इसके बाद गजल का दौर प्रारंभ हुआ। दानिश गजल ने पढ़ा,ये खबर न थी एक दिन वो मुझे दगा देगा, बिन पढे़ ही वो जालिम खत मेरा जला देगा।
वसीम राजू पुरी ने कहा कि, ये जमाना बड़ा शातिर है नजर देख न ले, मेरी आंखों में मोहब्बत का असर देख न ले। फारुक बिजनौरी ने कहा कि, मैं क्या करूं कि दिल में समाता नहीं कोई, अब तेरे बाद दूसरा भाता नहीं कोई। वारिस वारसी ने कहा, गम खुशी की फिजाओं में ढलते रहते हैं, उनकी यादों के मौसम बदलते रहते हैं।
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काविश रदौलवी ने पढ़ा, सारे रिश्ते भुला के आया था, अपनी दुनिया जला के आया था, तूने अच्छा किया रुलाके मुझे, मैं भी मां को रुला के आया था। महनाज स्योहारवी, रजा खतौलवी, शेदा अमरोहवी, निकहत अमरोहवी, सरवर कमाल, अल्ताफ जिया, इरफान हैदर, नियाज रिफअत, जौन बाकरी, इमरान रिफअत, मालेगांव से आए वाहिद अंसारी,मुजम्मिल नियाज, सुलेमान फराज, वसीम अलवी आदि ने भी कलाम पेश किया। इस अवसर पर शिबली चौधरी, चमन चौधरी, अथर अहसान, नदीम मुशाहिद, चमन हैदर बाकरी, अलीमुददीन सैफी, चमन सैफी, हाफिज अनवर, जफर सलमानी, मुईन खान, मैराज कस्सार, आदि लोग मौजूद रहे। संचालन फाखिर अदीब ने, अध्यक्षता भूरे वारसी और जुल्फिकार अहमद ने की।
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झांसी से आए सरवर कमाल ने पढ़ा कि, कुफ्र के छंटे बादल आमना घराने से, सारा जग हुआ रोशन मुस्तफा के आने से। अल्ताफ जिया ने कहा, जिसे कहते हैं जन्नत मैं वो जीना देख लेता हूं, जब आंखें बंद करता हूं मदीना देख लेता हूं। इसके बाद गजल का दौर प्रारंभ हुआ। दानिश गजल ने पढ़ा,ये खबर न थी एक दिन वो मुझे दगा देगा, बिन पढे़ ही वो जालिम खत मेरा जला देगा।
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वसीम राजू पुरी ने कहा कि, ये जमाना बड़ा शातिर है नजर देख न ले, मेरी आंखों में मोहब्बत का असर देख न ले। फारुक बिजनौरी ने कहा कि, मैं क्या करूं कि दिल में समाता नहीं कोई, अब तेरे बाद दूसरा भाता नहीं कोई। वारिस वारसी ने कहा, गम खुशी की फिजाओं में ढलते रहते हैं, उनकी यादों के मौसम बदलते रहते हैं।
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काविश रदौलवी ने पढ़ा, सारे रिश्ते भुला के आया था, अपनी दुनिया जला के आया था, तूने अच्छा किया रुलाके मुझे, मैं भी मां को रुला के आया था। महनाज स्योहारवी, रजा खतौलवी, शेदा अमरोहवी, निकहत अमरोहवी, सरवर कमाल, अल्ताफ जिया, इरफान हैदर, नियाज रिफअत, जौन बाकरी, इमरान रिफअत, मालेगांव से आए वाहिद अंसारी,मुजम्मिल नियाज, सुलेमान फराज, वसीम अलवी आदि ने भी कलाम पेश किया। इस अवसर पर शिबली चौधरी, चमन चौधरी, अथर अहसान, नदीम मुशाहिद, चमन हैदर बाकरी, अलीमुददीन सैफी, चमन सैफी, हाफिज अनवर, जफर सलमानी, मुईन खान, मैराज कस्सार, आदि लोग मौजूद रहे। संचालन फाखिर अदीब ने, अध्यक्षता भूरे वारसी और जुल्फिकार अहमद ने की।