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किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों में खेल
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
Updated Fri, 20 Nov 2015 12:49 AM IST
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देश में किसानों की हो रही उपेक्षा और कर्ज के बोझ के चलते बढ़ रही किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़ों पर भी केंद्र और राज्य सरकारें खेल कर रही हैं।
सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में ऐसे तथ्य उजागर हुए हैं। जिसमें नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कह रही है कि किसानों की आत्महत्याएं हुईं हैं, लेकिन कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट आत्महत्याएं शून्य दर्शा रहा है।
राज्य सरकार भी आत्महत्याओं को नकार रही हैं। केंद्र सरकार की रिपोर्ट कहती है दस राज्यों को छोड़कर बाकी किसी राज्य में किसानों ने आत्महत्या नहीं की है।
अमरोहा के गांव नाजरपुर नाईपुरा के प्रगतिशील किसान चौधरी शिवराज सिंह ने सूचना अधिकार के तहत गृह मंत्रालय के अधीन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और कृषि मंत्रालय से देश के 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े मांगे।
क्राइम ब्यूरो ने वर्ष 2014 में 5,650 किसानों द्वारा आत्महत्याओं की जानकारी दी। जबकि कृषि मंत्रालय ने 1,462 किसानों द्वारा आत्महत्याएं करने की जानकारी उपलब्ध कराई है।
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कृषि मंत्रालय कह रहा है कि आत्महत्याओं की यह संख्या राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के आधार पर है। लेकिन मंत्रालय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि जब गृहमंत्रालय के पास आत्महत्याओं के आंकड़े हैं तो वह राज्य सरकारों पर आश्रित क्यों है?
इस तरह देश में किसान आत्महत्या के मामले में केंद्र सरकार के ही दो मंत्रालयों के आंकड़ों में 4,188 का भारी अंतर है। एनसीआरबी के मुताबिक आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या चार गुनी ज्यादा है।
वहीं राज्य सरकारों ने संसद को जो आंकड़े संदेह पैदा करते हैं। मसलन यूपी सरकार के अनुसार 2014 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की है, जबकि एनसीआरबी ने 63 किसानों की आत्महत्या के आंकड़े दिए हैं।
यही हाल अन्य राज्यों में है। एनसीआरबी के 2014 के आंकड़ों के अनुसार 18 राज्यों से भी अधिक राज्यों में कृषि कार्यों के कारण आत्महत्याएं की थीं, जबकि कृषि मंत्रालय 10 राज्यों को छोड़कर किसी अन्य राज्य में किसानों के आत्महत्या करने की बात को नकार रहा है।
जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटा वहां आत्महत्याएं अधिक
सूचना अधिकार से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक जिन राज्यों की जीडीपी में राज्यों की अर्थव्यवस्था में तृतीय क्षेत्र सेवा और उद्योग क्षेत्र का हिस्सा तेजी से बढ़ा व प्राथमिक क्षेत्र कृषि का हिस्सा घटा है, उन्हीं राज्यों में किसान आत्महत्या मामले बढ़े पाए गए। यानी खेती की आय का हिस्सा सेवा और उद्योग क्षेत्र में ट्रांसफर होना इन आत्महत्याओं का कारण माना जा सकता है।
राज्यवार किसान आत्महत्या के आंकड़े
राज्य कृषि मंत्रालय एनसीआरबी
महाराष्ट्र 1250 2568
तेलंगाना 110 898
मध्यप्रदेश 0 826
छत्तीसगढ़ 0 443
कर्नाटक 48 321
आन्ध्रप्रदेश 48 160
केरल 03 107
तमिलनाडु -- 68
उत्तर प्रदेश 0 63
पंजाब 0 24
असम 0 21
हरियाणा 0 14
जम्मू कश्मीर - 12
अंडमान 0 08
उड़ीसा 0 05
गुजरात 3 45
सिक्किम 0 35
हिमाचल 0 32
(आंकड़े 2014 के एनसीआरबी और कृषि मंत्रालय से प्राप्त हैं, दोनों में भारी अंतर प्रदर्शित कर रहे हैं।)
कुछ इस तरह घट रहा है जीडीपी में कृषि का हिस्सा
राज्य कृषि उद्योग सेवा क्षेत्र
महाराष्ट्र 11 फीसदी 29 फीसदी 62 फीसदी
तमिलनाडु 12 फीसदी 27 फीसदी 60 फीसदी
कर्नाटक 16 24 58
आंध्र प्रदेश 23 24 53
केरल 14 21 64
नोट-यह ज्यादा आत्महत्या वाले राज्य हैं।
(1954-55 में कृषि एवं संबद्ध कार्यकलापों से देश की सकल घरेलू उत्पाद में वर्तमान मूल्यों के आधार पर 46.26 फीसदी तथा 1999-2000 के आधार पर वर्ष 54.96 फीसदी कृषि का हिस्सा था, जो घटकर 13.90 फीसदी रह गया है, यानी एक चौथाई हो गया है। यही हाल राज्यों का भी है।)
-सभी आंकड़े कृषि मंत्रालय के अनुसार।
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सूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में ऐसे तथ्य उजागर हुए हैं। जिसमें नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो की रिपोर्ट कह रही है कि किसानों की आत्महत्याएं हुईं हैं, लेकिन कृषि मंत्रालय की रिपोर्ट आत्महत्याएं शून्य दर्शा रहा है।
राज्य सरकार भी आत्महत्याओं को नकार रही हैं। केंद्र सरकार की रिपोर्ट कहती है दस राज्यों को छोड़कर बाकी किसी राज्य में किसानों ने आत्महत्या नहीं की है।
अमरोहा के गांव नाजरपुर नाईपुरा के प्रगतिशील किसान चौधरी शिवराज सिंह ने सूचना अधिकार के तहत गृह मंत्रालय के अधीन नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) और कृषि मंत्रालय से देश के 29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों में किसानों की आत्महत्याओं के आंकड़े मांगे।
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क्राइम ब्यूरो ने वर्ष 2014 में 5,650 किसानों द्वारा आत्महत्याओं की जानकारी दी। जबकि कृषि मंत्रालय ने 1,462 किसानों द्वारा आत्महत्याएं करने की जानकारी उपलब्ध कराई है।
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कृषि मंत्रालय कह रहा है कि आत्महत्याओं की यह संख्या राज्य सरकारों द्वारा उपलब्ध कराई गई रिपोर्ट के आधार पर है। लेकिन मंत्रालय के पास इस बात का कोई जवाब नहीं कि जब गृहमंत्रालय के पास आत्महत्याओं के आंकड़े हैं तो वह राज्य सरकारों पर आश्रित क्यों है?
इस तरह देश में किसान आत्महत्या के मामले में केंद्र सरकार के ही दो मंत्रालयों के आंकड़ों में 4,188 का भारी अंतर है। एनसीआरबी के मुताबिक आत्महत्या करने वाले किसानों की संख्या चार गुनी ज्यादा है।
वहीं राज्य सरकारों ने संसद को जो आंकड़े संदेह पैदा करते हैं। मसलन यूपी सरकार के अनुसार 2014 में किसी किसान ने आत्महत्या नहीं की है, जबकि एनसीआरबी ने 63 किसानों की आत्महत्या के आंकड़े दिए हैं।
यही हाल अन्य राज्यों में है। एनसीआरबी के 2014 के आंकड़ों के अनुसार 18 राज्यों से भी अधिक राज्यों में कृषि कार्यों के कारण आत्महत्याएं की थीं, जबकि कृषि मंत्रालय 10 राज्यों को छोड़कर किसी अन्य राज्य में किसानों के आत्महत्या करने की बात को नकार रहा है।
जीडीपी में कृषि का हिस्सा घटा वहां आत्महत्याएं अधिक
सूचना अधिकार से प्राप्त आंकड़ों के मुताबिक जिन राज्यों की जीडीपी में राज्यों की अर्थव्यवस्था में तृतीय क्षेत्र सेवा और उद्योग क्षेत्र का हिस्सा तेजी से बढ़ा व प्राथमिक क्षेत्र कृषि का हिस्सा घटा है, उन्हीं राज्यों में किसान आत्महत्या मामले बढ़े पाए गए। यानी खेती की आय का हिस्सा सेवा और उद्योग क्षेत्र में ट्रांसफर होना इन आत्महत्याओं का कारण माना जा सकता है।
राज्यवार किसान आत्महत्या के आंकड़े
राज्य कृषि मंत्रालय एनसीआरबी
महाराष्ट्र 1250 2568
तेलंगाना 110 898
मध्यप्रदेश 0 826
छत्तीसगढ़ 0 443
कर्नाटक 48 321
आन्ध्रप्रदेश 48 160
केरल 03 107
तमिलनाडु -- 68
उत्तर प्रदेश 0 63
पंजाब 0 24
असम 0 21
हरियाणा 0 14
जम्मू कश्मीर - 12
अंडमान 0 08
उड़ीसा 0 05
गुजरात 3 45
सिक्किम 0 35
हिमाचल 0 32
(आंकड़े 2014 के एनसीआरबी और कृषि मंत्रालय से प्राप्त हैं, दोनों में भारी अंतर प्रदर्शित कर रहे हैं।)
कुछ इस तरह घट रहा है जीडीपी में कृषि का हिस्सा
राज्य कृषि उद्योग सेवा क्षेत्र
महाराष्ट्र 11 फीसदी 29 फीसदी 62 फीसदी
तमिलनाडु 12 फीसदी 27 फीसदी 60 फीसदी
कर्नाटक 16 24 58
आंध्र प्रदेश 23 24 53
केरल 14 21 64
नोट-यह ज्यादा आत्महत्या वाले राज्य हैं।
(1954-55 में कृषि एवं संबद्ध कार्यकलापों से देश की सकल घरेलू उत्पाद में वर्तमान मूल्यों के आधार पर 46.26 फीसदी तथा 1999-2000 के आधार पर वर्ष 54.96 फीसदी कृषि का हिस्सा था, जो घटकर 13.90 फीसदी रह गया है, यानी एक चौथाई हो गया है। यही हाल राज्यों का भी है।)
-सभी आंकड़े कृषि मंत्रालय के अनुसार।