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जटीवन में 50 फीसदी दुर्लभ वृक्षों में लगे दीमक

Thu, 11 Feb 2016 12:32 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा Updated Thu, 11 Feb 2016 12:32 AM IST
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jatiwan men peon ko laga deemak
शहर के निकट स्थित प्राचीन प्राकृतिक धरोहर के रूप में विख्यात जटीवन के 50 फीसदी वृक्षों में दीमक लग गए हैं और इन्हें बचाने के प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। यह हाल तब है जब, जटीवन के भीतर वन विभाग का दफ्तर है, जनप्रतिनिधि भी इस तरफ नहीं ध्यान दे रहे हैं।
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शहर के उत्तर पश्चिमी छोर पर वासुदेव तीर्थ स्थल के पास स्थित जटीवन प्राचीन धरोहर के रूप में वन संपदा के मामले में जिले की पहचान है। इसमें दुर्लभ औषधीय और बहुमूल्य पेड़ लगे हुए हैं। जटीवन जंगली पशु-पक्षी का आश्रयदाता होने के साथ ही शहर के नागरिकों के मार्निंग वॉक का भी ठिकाना है।
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57 हेेक्टेयर जमीन पर फैला यह विशाल वन देखभाल नहीं होने के कारण अब नष्ट होने लगा है। इसके पचास प्रतिशत से अधिक पेड़ों में दीमक लग चुका है। जिससे पेड़ सूखने के कगार पर पहुंच गए हैं, मगर इन्हें बचाने के लिए अब भी प्रयास नहीं किए जा रहे हैं। 
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19 साल से वन विभाग का दफ्तर है जटीवन में
वन विभाग का डीएफओ कार्यालय जटीवन में जिला बनने के बाद 1997 से है। इससे पहले वहां डिप्टी रेंजर दफ्तर था। करीब 19 साल से वन विभाग जटीवन में दफ्तर चला रहा है, लेकिन किसी अधिकारी ने जटीवन में दुर्लभ पेड़ों को दीमक से बचाने के कोई प्रयास नहीं किए हैं।

स्पेशल ग्रांट की आस
वन्य संपदा को नष्ट होने से रोकने की जिम्मेदारी वन विभाग की है। लेकिन इसके बाद भी वन विभाग लगातार जटीवन के संरक्षण के लिए स्पेशल ग्रांट की मांग कर टालमटोल कर रहा है। स्पेशल ग्रांट मांग के पीछे भी मकसद दस लाख रुपये सालाना लेकर उसका बंदरबांट करना ही होगा।

दुर्लभ पेड़ों की हो रही चोरी
विशाल क्षेत्रफल में फैले जटीवन की देखभाल के लिए एक भी कर्मचारी नहीं है, जबकि पांच हेक्टेयर क्षेत्र में फैले वन की देखभाल के लिए एक कर्मचारी होना चाहिए। इसी का फायदा लकड़ी तस्कर उठा रहे हैं। जटीवन के कीमती एवं इमारती पेड़ों की तस्करी कर रहे हैं।



जिला कृषि अधिकारी चरन सिंह का कहना है कि पेड़ों में सेलूलोज तत्व होता है जो दीमक का भोजन है, इसीलिए लकड़ी में दीमक लगती है। इसे रोकने के लिए कीटनाशकों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। ऐसे नहीं होने पर दीमक लकड़ी को मिट्टी में तब्दील कर देती है।

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