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माटी के दीये बनाकर सहेज रहे परंपरा
ब्यूरो/अमर उजाला अमरोहा
Updated Wed, 04 Nov 2015 12:19 AM IST
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गजरौला/हसनपुर में दिवाली नजदीक आते ही पूजन के लिए मिट्टी के दीये बनाने कार्य शुरू हो गया है। इसको लेकर यह व्यवसाय छोड़ चुके तमाम परिवार परंपरा सहेजने के लिए एक बार फिर इस कार्य में जुट गए हैं।
फिलहाल मजदूरी से परिवार का भरण पोषण करने वाले गजरौला के मंडी रोड निवासी रामकुंवर भी परंपरा निभाने के लिए पांच बेटों और परिवार की महिलाओं-बच्चों के साथ मिलकर दीये बना रहे हैं, ताकि मिट्टी के दीये बनाने का पुस्तैनी व्यवसाय दम न तोड़े।
रामकुंवर का कहना है कि आजकल मिट्टी के बर्तनों की मांग कम होती है। इससे यह कार्य ठप होने की कगार पर है, उनके यहां पुरखे अरसे से बर्तन बनाने का कार्य कर रहे हैं, मगर रोजी-रोटी के लिए पूरे साल यह कार्य नहीं करते। दिवाली पर दीये का महत्व और मांग को देखते हुए पुरखों की परंपरा निभा रहे हैं।
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हर दिवाली पर वे परिवार के साथ मिलकर मिट्टी के दीये आदि बनाते हैं। इसमें उनके पांच बेटे रामौतार, चंद्रपाल, शिवकुमार, नन्हें, कृपाल और घर की महिलाएं मदद करती हैं।
रामकुंवर ने बताया कि गजरौला में इस बार मिट्टी के दीये बनाने के लिए मिट्टी भी नहीं मिली। इसके लिए पांच किलोमीटर दूर से मिट्टी लानी पड़ी है। दिन भर में वह 1500 दीये तैयार कर लेते हैं।
वहीं हसनपुर के गांव सकतपुर निवासी कुम्हार बसंतराम प्रजापति ने बताया कि दिवाली पर पहले मिट्टी के दीपकों से ही घरों को रोशन किया जाता था। लेकिन अब मोमबत्ती के आने से मिट्टी के दीपकों की मांग कम हुई है।
मेहनत के मुताबिक कीमत भी नहीं मिल पाती, अन्य समस्याएं भी होती हैं। इससे महज सप्ताह भर पहले जरूरत के मुताबिक दीपक बनाते हैं।
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फिलहाल मजदूरी से परिवार का भरण पोषण करने वाले गजरौला के मंडी रोड निवासी रामकुंवर भी परंपरा निभाने के लिए पांच बेटों और परिवार की महिलाओं-बच्चों के साथ मिलकर दीये बना रहे हैं, ताकि मिट्टी के दीये बनाने का पुस्तैनी व्यवसाय दम न तोड़े।
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रामकुंवर का कहना है कि आजकल मिट्टी के बर्तनों की मांग कम होती है। इससे यह कार्य ठप होने की कगार पर है, उनके यहां पुरखे अरसे से बर्तन बनाने का कार्य कर रहे हैं, मगर रोजी-रोटी के लिए पूरे साल यह कार्य नहीं करते। दिवाली पर दीये का महत्व और मांग को देखते हुए पुरखों की परंपरा निभा रहे हैं।
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हर दिवाली पर वे परिवार के साथ मिलकर मिट्टी के दीये आदि बनाते हैं। इसमें उनके पांच बेटे रामौतार, चंद्रपाल, शिवकुमार, नन्हें, कृपाल और घर की महिलाएं मदद करती हैं।
रामकुंवर ने बताया कि गजरौला में इस बार मिट्टी के दीये बनाने के लिए मिट्टी भी नहीं मिली। इसके लिए पांच किलोमीटर दूर से मिट्टी लानी पड़ी है। दिन भर में वह 1500 दीये तैयार कर लेते हैं।
वहीं हसनपुर के गांव सकतपुर निवासी कुम्हार बसंतराम प्रजापति ने बताया कि दिवाली पर पहले मिट्टी के दीपकों से ही घरों को रोशन किया जाता था। लेकिन अब मोमबत्ती के आने से मिट्टी के दीपकों की मांग कम हुई है।
मेहनत के मुताबिक कीमत भी नहीं मिल पाती, अन्य समस्याएं भी होती हैं। इससे महज सप्ताह भर पहले जरूरत के मुताबिक दीपक बनाते हैं।