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...हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन
Amroha
Updated Mon, 19 Nov 2012 12:00 PM IST
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अमरोहा। पहले इंसान को बेदार तो हो लेने दो, फिर हर कौम पुकारेगी हमारे हैं हुसैन, अमरोहा की सरजमीं पर शब्बीर हसन खां जोश मलिहाबादी की रूबाई के इन मिसरों की झलक देखने को मिलती है।
मुहर्रम का चांद नजर आते ही रसूले खुदा के नवासे हजरत इमाम हुसैन की करबला मेें शहादत की याद में अजादारी की तकरीबन ढाई सौ साल पुरानी तारीख में सभी मजहब के लोगों की आंख नम रहती हैं। दस मुहर्रम तक हरसू शोहदाए कर्बला का जिक्र और फिजा में सिर्फ सदाए हुसैन की गूंज सुनाई देती है। मैदान-ए-करबला में नाना के दीन व इंसानियत के खातिर इमाम हुसैैन और उनके 72 साथियों की यजीद की फौज के जुल्म ओ सितम से शहादत पर अमरोहा का माहौल इन दिनों बेहद गमगीन है। अजाखानों में मजलिसों के दौर के साथ ही इतवार अजाखाना वलिया से मातमी जुलूस निकलने का सिलसिला शुरू हो चुका है।
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मुहर्रम का चांद नजर आते ही रसूले खुदा के नवासे हजरत इमाम हुसैन की करबला मेें शहादत की याद में अजादारी की तकरीबन ढाई सौ साल पुरानी तारीख में सभी मजहब के लोगों की आंख नम रहती हैं। दस मुहर्रम तक हरसू शोहदाए कर्बला का जिक्र और फिजा में सिर्फ सदाए हुसैन की गूंज सुनाई देती है। मैदान-ए-करबला में नाना के दीन व इंसानियत के खातिर इमाम हुसैैन और उनके 72 साथियों की यजीद की फौज के जुल्म ओ सितम से शहादत पर अमरोहा का माहौल इन दिनों बेहद गमगीन है। अजाखानों में मजलिसों के दौर के साथ ही इतवार अजाखाना वलिया से मातमी जुलूस निकलने का सिलसिला शुरू हो चुका है।
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