{"_id":"5ba3a40c867a557f6c068b1d","slug":"world-famous-ram-nagar-ram-leela-is-a-symbol-of-communal-harmony","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"बनारसः रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला आज से शुरू, दिखता है सांप्रदायिक सौहार्द","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
बनारसः रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला आज से शुरू, दिखता है सांप्रदायिक सौहार्द
न्यूज डेस्क,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Thu, 20 Sep 2018 07:13 PM IST
विज्ञापन
रामनगर की रामलीला
- फोटो : file photo
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बनारस में रामनगर की ऐतिहासिक श्रीरामलीला अनंत चतुर्दशी के दिन यानी रविवार की शाम पांच बजे से शुरू हो जाएगी। धार्मिक और सांस्कृतिक नगरी वाराणसी के रामनगर में दो सौ से ज्यादा साल पुरानी व विश्वप्रसिद्ध रामलीला में आज भी प्राचीन परंपराओं का पालन होता है। 21वीं सदी में भी वाराणसी में कई पुरानी परम्पराएं मौजूद हैं और इन्हीं में से एक है रामनगर की मशहूर रामलीला।
गंगा के दूसरे तट पर बसा समूचा रामनगर इन दिनों राममय हो जाता है जहां धर्म एवं आध्यात्म की सरिता बहती है। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करने वाले रामनगर की रामलीला में तोपों से सलामी दी जाती है। इस लीला के नियमित दर्शक भी होते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने दायित्व के निर्वहन को लेकर प्रतिबद्ध रहते हैं। जंग बहादुर सिंह 32 वर्ष से तोपची का कार्य कर रहे हैं। इनके पिता केदार सिंह दादा महादेव सिंह भी तोपची का काम करते थे।
लीला के दौरान धनुष यज्ञ, नक्कटैया तथा लक्ष्मण शक्ति की लीला में तोप छोड़ा जाता है। लीला में पहले 21 तोपों की सलामी दी जाती थी लेकिन अब दो तोप में बारूद भरा जाता है लेकिन केवल एक से ही छोड़ा जाता है। जंग बहादुर सिंह जब तोप छोड़ते है तो उनके सहयोगी मनराज, क्षयवर, विजय तथा जितेंद्र सिंह ऊंचे स्थान पर ध्वज दिखाते हैं।
विज्ञापन
जंग बहादुर का मानना है कि जब बारूद भरा जाता है तो काफी रिस्की होता है। आखिर परंपरा है निभाना भी जरूरी है। तोप से संबंधित कार्य करने वाले लोग काशी राज दुर्ग के स्थायी कर्मचारी होते हैं।
विज्ञापन
गंगा के दूसरे तट पर बसा समूचा रामनगर इन दिनों राममय हो जाता है जहां धर्म एवं आध्यात्म की सरिता बहती है। सांप्रदायिक सौहार्द की मिसाल पेश करने वाले रामनगर की रामलीला में तोपों से सलामी दी जाती है। इस लीला के नियमित दर्शक भी होते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने दायित्व के निर्वहन को लेकर प्रतिबद्ध रहते हैं। जंग बहादुर सिंह 32 वर्ष से तोपची का कार्य कर रहे हैं। इनके पिता केदार सिंह दादा महादेव सिंह भी तोपची का काम करते थे।
विज्ञापन
लीला के दौरान धनुष यज्ञ, नक्कटैया तथा लक्ष्मण शक्ति की लीला में तोप छोड़ा जाता है। लीला में पहले 21 तोपों की सलामी दी जाती थी लेकिन अब दो तोप में बारूद भरा जाता है लेकिन केवल एक से ही छोड़ा जाता है। जंग बहादुर सिंह जब तोप छोड़ते है तो उनके सहयोगी मनराज, क्षयवर, विजय तथा जितेंद्र सिंह ऊंचे स्थान पर ध्वज दिखाते हैं।
विज्ञापन
जंग बहादुर का मानना है कि जब बारूद भरा जाता है तो काफी रिस्की होता है। आखिर परंपरा है निभाना भी जरूरी है। तोप से संबंधित कार्य करने वाले लोग काशी राज दुर्ग के स्थायी कर्मचारी होते हैं।
मुस्लिम बनते हैं सहभागी, आरती के समय जलाते हैं महताबी
विश्वप्रसिद्ध श्रीराम लीला
- फोटो : अमर उजाला
रामनगर की विश्वप्रसिद्ध श्रीराम लीला में सौहार्द देखने को मिला है। यहां मुस्लिम परिवारों की भी सहभागिता रहती है। आरती के समय महताबी जलाने के लिए से राज, लालू खां और कादिर रहते हैं। इसके अलावा लंका मैदान पर रणभूमि में मुस्लिम परिवार द्वारा शस्त्र प्रदर्शन किया जाता है।
लालू खां ने बताया कि हमारे पुश्तैनी से रामलीला में प्रयोग होने वाले पुतले, महताबी और पटाखे तैयार करते आ रहे हैं। दादा हाजी अली हुसैन ने परिवार के लोगों प्रशिक्षण दिया। महताबी, पटाखे और पुतला श्रीराम लीला का आकर्षण होता है। इसके साथ ही प्रतिदिन होने वाली आरती के लाल और सफेद महताबी की जगमग करते ही जनसमूह भगवान राम के जयघोष से लीलास्थल गूंज उठता है।
आरती के समय लीला प्रेमी आगे नही पहुंच पाते वह महताबी की रोशनी में भगवान राम के दर्शन को सफल मानते हैं। रामलीला में प्रयोग होने वाले पुतले, महताबी और पटाखे की तैयारी में रामबाग परिसर में सेराज , जमील, हलीम, सैफूददीन समेत 25 लोग एक माह पहले से लगे है। लालू खां ने बताया पुतलों के निर्माण मे एक सौ पचास बांस लग जाते है। तांत दो क्विंटल, कागज पांच कुंतल, मैदा तीन कुंतल तथा रंग आदि समान लग जाते हैं।
लालू खां ने बताया कि हमारे पुश्तैनी से रामलीला में प्रयोग होने वाले पुतले, महताबी और पटाखे तैयार करते आ रहे हैं। दादा हाजी अली हुसैन ने परिवार के लोगों प्रशिक्षण दिया। महताबी, पटाखे और पुतला श्रीराम लीला का आकर्षण होता है। इसके साथ ही प्रतिदिन होने वाली आरती के लाल और सफेद महताबी की जगमग करते ही जनसमूह भगवान राम के जयघोष से लीलास्थल गूंज उठता है।
आरती के समय लीला प्रेमी आगे नही पहुंच पाते वह महताबी की रोशनी में भगवान राम के दर्शन को सफल मानते हैं। रामलीला में प्रयोग होने वाले पुतले, महताबी और पटाखे की तैयारी में रामबाग परिसर में सेराज , जमील, हलीम, सैफूददीन समेत 25 लोग एक माह पहले से लगे है। लालू खां ने बताया पुतलों के निर्माण मे एक सौ पचास बांस लग जाते है। तांत दो क्विंटल, कागज पांच कुंतल, मैदा तीन कुंतल तथा रंग आदि समान लग जाते हैं।
नाव की भी होती है अहम भूमिका
रामनगर की श्रीराम लीला में भगवान राम को गंगा जी, यमुना जी पार कराने एवं भगवान विष्णु के क्षीरसागर की आरती के समय नाव की आवश्यकता पड़ती है। महलिया टोला निवासी बब्लू साहनी 12 वर्षों से नाव की सेवा दे रहे हैं। इसमें इनके बड़े भाई सुक्खु ,और भोपाल साहनी साथ देते हैं।
बब्बू साहनी बताते हैं कि रामलीला शुरू होने से दो दिन पहले नाव रामबाग पोखरा में लगा देते हैं। पहले दिन की आरती इसी नाव पर होती है। श्रीराम वन गमन के समय एक नाव गंगा जी में जो प्रतीक रूप में रामपुर, सगरा पोखरा पर होती है। भरत जी के आगमन पर भी हम लोग सेवा करते हैं।
बब्बू साहनी बताते हैं कि रामलीला शुरू होने से दो दिन पहले नाव रामबाग पोखरा में लगा देते हैं। पहले दिन की आरती इसी नाव पर होती है। श्रीराम वन गमन के समय एक नाव गंगा जी में जो प्रतीक रूप में रामपुर, सगरा पोखरा पर होती है। भरत जी के आगमन पर भी हम लोग सेवा करते हैं।