{"_id":"5b166cb54f1c1bfd6e8b63b0","slug":"world-environment-day-say-no-for-these-something","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"विश्व पर्यावरण दिवस: अभी देर नहीं हुई, बस इन चीजों को कहें ‘नो’ और निभाएं अपनी जिम्मेदारी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
विश्व पर्यावरण दिवस: अभी देर नहीं हुई, बस इन चीजों को कहें ‘नो’ और निभाएं अपनी जिम्मेदारी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
Updated Tue, 05 Jun 2018 07:33 PM IST
विज्ञापन
विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर बोले पर्यावरणविद और इस क्षेत्र में काम कर रहीं संस्थाओं के सदस्य
- फोटो : अमर उजाला
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जल प्रदूषण, वायु या फिर ध्वनि प्रदूषण् पर वैश्विक स्तर पर बहस हो रही है, योजनाएं बन रही हैं। हर व्यक्ति को इसके प्रति सचेत होने की जरूरत है। गंगा में गिरते नालों के प्रति सोचने की आवश्यकता है तो सड़कों पर उड़ती धूल, वाहनों के धुएं और शोर से आबोहवा में घुलते जहर से भी सावधान रहना होगा।
वक्त आ गया है कि हम स्वत: इसके दुष्परिणामों से वाकिफ हों। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला कार्यालय में सोमवार को आयोजित अमर उजाला संवाद में प्लास्टिक को हर हाल न कहने और खुले कूड़ा जलने देने का संकल्प दोहराया गया।
यह भी कहा गया कि कम से कम विश्व पर्यावरण दिवस के दिन हम प्लास्टिक को न कहकर इसकी शुरुआत एक दिन से होगी लेकिन तय है कि इसका परिणाम सुखद होगा। संवाद में शामिल पर्यावरणविदों संग पर्यावरण के लिए काम करने वाली अलग-अलग संस्थाओं के सदस्यों ने साफ कहा कि पर्यावरण लगातार चिंता का विषय है।
विज्ञापन
हम खुद पहले करें। पर्यावरण प्रहरी बनें। कार्यदायी संस्थाओं को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाएं। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण से बचाव के विकल्प हमारे पास मौजूद हैं, हम उन्हें अपनाएं। हम तोहफे में पौधे देने का नियम बना लें तो तस्वीर अभी भी बदल सकती है।
पर्यावरण एवं संपोष्य विकास संस्थान, बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजीव प्रताप सिंह ने कहा कि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए जरूरी है कि हम इसका स्वत: संज्ञान लें। प्लास्टिक को हम खुद ‘नो’ कहें। हमें अपने आप में बदलाव लाना होगा। शासन-प्रशासन को कड़ाई करने की जरूरत है। खुले में कूड़ा कोई जला रहा हो तो उस पर मुकदमा दर्ज हो, जुर्माना लगाया जाए। प्रोग्राम में बुके देने की बजाय पौधे दिए जाएं।
वनस्पति विज्ञान विभाग, अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज के डॉ. संजय सिंह ने कहा कि प्रदूषण बढ़ रहा है और ये वैश्विक समस्या के तौर पर उभरता जा रहा है लेकिन इसके साथ साथ हमारी अनुकूलित अवस्था भी कम हो रही है। जितना ज्यादा हम हाइजेनिक हो रहे हैं, प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है। प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। इसके पीछे शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। हमें गांव की ओर से फिर से लौटना होगा।
विज्ञापन
वक्त आ गया है कि हम स्वत: इसके दुष्परिणामों से वाकिफ हों। विश्व पर्यावरण दिवस की पूर्व संध्या पर अमर उजाला कार्यालय में सोमवार को आयोजित अमर उजाला संवाद में प्लास्टिक को हर हाल न कहने और खुले कूड़ा जलने देने का संकल्प दोहराया गया।
विज्ञापन
यह भी कहा गया कि कम से कम विश्व पर्यावरण दिवस के दिन हम प्लास्टिक को न कहकर इसकी शुरुआत एक दिन से होगी लेकिन तय है कि इसका परिणाम सुखद होगा। संवाद में शामिल पर्यावरणविदों संग पर्यावरण के लिए काम करने वाली अलग-अलग संस्थाओं के सदस्यों ने साफ कहा कि पर्यावरण लगातार चिंता का विषय है।
विज्ञापन
हम खुद पहले करें। पर्यावरण प्रहरी बनें। कार्यदायी संस्थाओं को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाएं। पर्यावरण संरक्षण और प्रदूषण से बचाव के विकल्प हमारे पास मौजूद हैं, हम उन्हें अपनाएं। हम तोहफे में पौधे देने का नियम बना लें तो तस्वीर अभी भी बदल सकती है।
पर्यावरण एवं संपोष्य विकास संस्थान, बीएचयू के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. राजीव प्रताप सिंह ने कहा कि प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए जरूरी है कि हम इसका स्वत: संज्ञान लें। प्लास्टिक को हम खुद ‘नो’ कहें। हमें अपने आप में बदलाव लाना होगा। शासन-प्रशासन को कड़ाई करने की जरूरत है। खुले में कूड़ा कोई जला रहा हो तो उस पर मुकदमा दर्ज हो, जुर्माना लगाया जाए। प्रोग्राम में बुके देने की बजाय पौधे दिए जाएं।
वनस्पति विज्ञान विभाग, अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज के डॉ. संजय सिंह ने कहा कि प्रदूषण बढ़ रहा है और ये वैश्विक समस्या के तौर पर उभरता जा रहा है लेकिन इसके साथ साथ हमारी अनुकूलित अवस्था भी कम हो रही है। जितना ज्यादा हम हाइजेनिक हो रहे हैं, प्रदूषण की समस्या बढ़ रही है। प्रतिरोधक क्षमता कम हो रही है। इसके पीछे शहरीकरण एक बहुत बड़ा कारण है। हमें गांव की ओर से फिर से लौटना होगा।
बनारस में प्रदूषण के आंकड़ें हैरान करने वाले
- डब्ल्यूएचओ के अनुसार बीते दिनों में वाराणसी सबसे प्रदूषित शहरों में तीसरे नंबर पर था। पिछले महीनों से एक्यूआई इंडेक्स 200 के ऊपर रहा। जनवरी-फरवरी में ये आंकड़ा 400 पार कर गया।
- चार महीनों में महज तीन दिन ही हवा की स्थिति सांस लेने लायक थी। मानक के अनुसार पीएम 2.5, 60 और पीएम 10, 100 से अधिक नहीं होना चाहिए।
- प्रतिदिन शहर से 350 एमएलडी मलजल निकलता है। इसे शोधित करने के लिए तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता 102 एमएलडी है। 248 एमएलडी सीवेज नदियों में बहाया जाता है।
- प्रदूषण को कम करने के लिए वन विभाग नदियों के किनारे गंगा हरीतिमा अभियान चलाने जा रहा है। इसके तहत 102 हेक्टेयर जमीन में 96 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य है।
- चार महीनों में महज तीन दिन ही हवा की स्थिति सांस लेने लायक थी। मानक के अनुसार पीएम 2.5, 60 और पीएम 10, 100 से अधिक नहीं होना चाहिए।
- प्रतिदिन शहर से 350 एमएलडी मलजल निकलता है। इसे शोधित करने के लिए तीन सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की क्षमता 102 एमएलडी है। 248 एमएलडी सीवेज नदियों में बहाया जाता है।
- प्रदूषण को कम करने के लिए वन विभाग नदियों के किनारे गंगा हरीतिमा अभियान चलाने जा रहा है। इसके तहत 102 हेक्टेयर जमीन में 96 हजार पौधे लगाने का लक्ष्य है।
पर्यावरणविदों ने रखी अपनी राय
प्लास्टिक पर प्रतिबंधित है। सड़क किनारे खुले में कूड़ा जलाने पर सजा निर्धारित है लेकिन कहीं कुछ नहीं हो रहा। इंप्लीमेंटिंग अथॉरिटी यानी की सरकार का स्वच्छता अभियान चल रहा है। हम सूखा और गीला कूड़ा अलग अलग करके कूड़े वाले को देते हैं लेकिन जहां कूड़ा निस्तारण हो रहा है, वहां दोनों मिलाए जा रहे हैं। इसकी निगरानी नहीं होती।
- ओंकार, क्लाइमेट एजेंडा
पर्यावरण का सबसे प्रमुख हिस्सा नदियां हैं। नदियों के प्रदूषण को खत्म करने के लिए जरूरी है उन्हें अविरल किया जाए। रही बात वायु प्रदूषण की तो इसके लिए जरूरी है कि हम इसके दुष्परिणामों को जानें। प्रदूषण के डेटा शेयर किए जाने चाहिए। हम संकल्प लें कि न हम प्लास्टिक इस्तेमाल करेंगे और न ही कूड़ा जलने देंगे।
- इंजीनियर राहुल कुमार सिंह, क्रांति फाउंडेशन
जब तक समस्या निजी न हो, जिम्मेदारी कोई नहीं समझता। प्रदूषण की समस्या निजी हो गई है। हम बाहर मास्क पहनकर निकल रहे हैं लेकिन इसके लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए जा रहे। जिस तरह पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को शामिल किया गया है, ठीक वैसे ही पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार बनाने की कोशिश स्कूलों से होनी चाहिए।
- साची श्रीवास्तव, क्लाइमेट एजेंडा
पर्यावरण संरक्षण में एकल प्रयास भी योगदान दिया जा सकता है। छतों पर रूफ गार्डेनिंग कर, घरों में वर्टिकल और हैंगिंग गार्डनिंग से आबोहवा को शुद्ध किया जा सकता है। रही बात कूड़े के निस्तारण की तो प्लास्टिक को छोड़कर हर कूड़े को रिसाइकल कर उसका कंपोस्ट बनाया जा सकता है। इसके लिए बस इच्छाशक्ति की जरूरत है।
- अविषेक कुमार, गार्डन ऑन कांक्रीट
विकास की दौड़ में पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं, जो पर्यावरणीय पारिस्थितिकी के लिए बेहद जरूरी थीं। हम खुद को इतना जिम्मेदार बनाएं कि जिस तरह मार्निंग वॉक के लिए आधा-एक घंटा निकालते है, वैसे ही रोजाना 15 मिनट श्रमदान करें। इस श्रमदान में साफ-सफाई के साथ पौधरोपण को शामिल करें।
- अरविंद कुमार चक्रवाल, अनमोल सेवा समिति
- ओंकार, क्लाइमेट एजेंडा
पर्यावरण का सबसे प्रमुख हिस्सा नदियां हैं। नदियों के प्रदूषण को खत्म करने के लिए जरूरी है उन्हें अविरल किया जाए। रही बात वायु प्रदूषण की तो इसके लिए जरूरी है कि हम इसके दुष्परिणामों को जानें। प्रदूषण के डेटा शेयर किए जाने चाहिए। हम संकल्प लें कि न हम प्लास्टिक इस्तेमाल करेंगे और न ही कूड़ा जलने देंगे।
- इंजीनियर राहुल कुमार सिंह, क्रांति फाउंडेशन
जब तक समस्या निजी न हो, जिम्मेदारी कोई नहीं समझता। प्रदूषण की समस्या निजी हो गई है। हम बाहर मास्क पहनकर निकल रहे हैं लेकिन इसके लिए सामूहिक प्रयास नहीं किए जा रहे। जिस तरह पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को शामिल किया गया है, ठीक वैसे ही पर्यावरण के प्रति भी जिम्मेदार बनाने की कोशिश स्कूलों से होनी चाहिए।
- साची श्रीवास्तव, क्लाइमेट एजेंडा
पर्यावरण संरक्षण में एकल प्रयास भी योगदान दिया जा सकता है। छतों पर रूफ गार्डेनिंग कर, घरों में वर्टिकल और हैंगिंग गार्डनिंग से आबोहवा को शुद्ध किया जा सकता है। रही बात कूड़े के निस्तारण की तो प्लास्टिक को छोड़कर हर कूड़े को रिसाइकल कर उसका कंपोस्ट बनाया जा सकता है। इसके लिए बस इच्छाशक्ति की जरूरत है।
- अविषेक कुमार, गार्डन ऑन कांक्रीट
विकास की दौड़ में पेड़-पौधों से लेकर पशु-पक्षियों की कई प्रजातियां विलुप्त हो गई हैं, जो पर्यावरणीय पारिस्थितिकी के लिए बेहद जरूरी थीं। हम खुद को इतना जिम्मेदार बनाएं कि जिस तरह मार्निंग वॉक के लिए आधा-एक घंटा निकालते है, वैसे ही रोजाना 15 मिनट श्रमदान करें। इस श्रमदान में साफ-सफाई के साथ पौधरोपण को शामिल करें।
- अरविंद कुमार चक्रवाल, अनमोल सेवा समिति