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जहां भी जाएंगे, वहां कसाई मिलेंगे...आखिर जाएंगे कहां
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Sat, 18 Jun 2016 01:49 AM IST
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संत विवेक दास
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श्रम के बल पर दुनिया को सुखी जीवन का संदेश और कुरीतियों और विसंगतियों के लिए किसी को भी न बख्शने वाले संत कबीर की जयंती 20 जून को है। अमर उजाला ने शुक्रवार को कैराना और कांधला में चल रहे घटनाक्रम के संदर्भ में संत कबीर के दर्शन और उनके मत के बारे में कबीरचौरा स्थित मूलगादी मठ के आचार्य संत विवेक दास से खास बातचीत की।
जो तूं बाभन बभनी जाया/और राह ते क्यों नहिं आया/जो तूं तुरुक तुरकनी जाया/पेटहिं क्यों नहिं सुन्नत कराया...। श्रम और कर्म की साधना पर आधारित प्रेम-शांति का संदेश देने वाले संत कबीर ने तमाम विरोधों के बावजूद काशी को कभी नहीं छोड़ा। चाहे कैराना से लोगों के पलायन करने का मामला हो या कांधला से, लोगों को भागना नहीं चाहिए। कबीर पलायनवादी नहीं थे। उन्होंने हमेशा श्रम के बूते लड़ कर अधिकार प्राप्त करने का संदेश दिया। इसीलिए वो जिंदगी भर झीनी-झीनी चदरिया बुनते रहे। कबीर के विचार भागने का नहीं, हालात से लड़ने का साहस देते हैं। घर छोड़ने या जंगल में जाकर धूनी रमाने से भगवान नहीं मिलते। मेहनत के बल पर जिंदगी की गाड़ी खींचने से आत्म संतुष्टि ही नहीं मिलती, परमात्मा से भी मिलन हो जाता है। इसलिए घर में मन लगाओ। यह कहना है कबीर चौरा मूलगादी मठ के आचार्य संत विवेक दास का।
अमर उजाला से खास बातचीत में आचार्य ने कैराना और कांधला के हालात पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने इस भगदड़ के माहौल को रोकने के लिए कबीर के संदेश की ताकत पहचानने की जरूरत बताई। कहा कि कबीर कहते थे कि न कोई हिंदू बनकर आया है न मुसलमान। आचार्य कहते हैं कि संत कबीर ने मानव को जीने-रहने का सहज-सुलभ रास्ता बताया है। कबीर कहते हैं कि आदमी घर न छोड़े, जंगल में नहीं जाए। कंदराओं में तपस्या करने की जरूरत नहीं होगी। आदमी जब काम करेगा, मेहनत करेगा, तब इसी के बल पर आध्यात्म के शिखर पर पहुंच जाएगा। यह सिर्फ कथनी में नहीं करनी में भी कबीर ने सच करके दिखाया है। इसीलिए जीवन भर उन्होंने बुनकरी की। बुनकरी उनके पेट का धंधा नहीं था, इसलिए कि राजा काशी नरेश वीरदेव सिंह, बांधवगढ़ के राजा राम सिंह और लखनऊ के नवाब बिजली खां पठान उनके शिष्य थे। फिर भी वह कपड़ा बुनते रहे, श्रम करते रहे। इसलिए कि काशी में बुनकरी को लेकर हीन भावना थी। वह इस मेहनत के जरिए श्रम और साधना को जीवन जीने के सबसे सहज मार्ग के रूप में साबित कर रहे थे। वह कहते हैं कि कर बहियां बल आपने छोड़ पराई आस.../जाके आंगन नदी बहे सो कस मरत पियास...।
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कैराना और कांधला के लोगों को कबीर को पढ़ना चाहिए। कबीर ने कहा है कि- संतों पांडे निपुन कसाई/बकरा मारि भैंसा पर धाबै दिल में दरद न आई...। एके मटिया एक कुम्हारा/एक सभन्ह का सिरजन हारा...। इसलिए किसी को भागने की जरूरत नहीं है। भाग कर कहां जाएंगे। जहां भी जाएंगे, वहां लड़ना पड़ेगा। आसपास के माहौल से।
आचार्य कहते हैं कि- कबिरा तेरी झोपड़ी गलकट्टों के पास /जो करेगा सो भरेगा तूं क्यों होत उदास...। जहां जाएंगे, वहां कसाई मिलेंगे...। आखिर जाएंगे कहां। अपने मन को पवित्र करिए, कसाई से घृणा करने की जरूरत नहीं...।
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जो तूं बाभन बभनी जाया/और राह ते क्यों नहिं आया/जो तूं तुरुक तुरकनी जाया/पेटहिं क्यों नहिं सुन्नत कराया...। श्रम और कर्म की साधना पर आधारित प्रेम-शांति का संदेश देने वाले संत कबीर ने तमाम विरोधों के बावजूद काशी को कभी नहीं छोड़ा। चाहे कैराना से लोगों के पलायन करने का मामला हो या कांधला से, लोगों को भागना नहीं चाहिए। कबीर पलायनवादी नहीं थे। उन्होंने हमेशा श्रम के बूते लड़ कर अधिकार प्राप्त करने का संदेश दिया। इसीलिए वो जिंदगी भर झीनी-झीनी चदरिया बुनते रहे। कबीर के विचार भागने का नहीं, हालात से लड़ने का साहस देते हैं। घर छोड़ने या जंगल में जाकर धूनी रमाने से भगवान नहीं मिलते। मेहनत के बल पर जिंदगी की गाड़ी खींचने से आत्म संतुष्टि ही नहीं मिलती, परमात्मा से भी मिलन हो जाता है। इसलिए घर में मन लगाओ। यह कहना है कबीर चौरा मूलगादी मठ के आचार्य संत विवेक दास का।
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अमर उजाला से खास बातचीत में आचार्य ने कैराना और कांधला के हालात पर खुलकर चर्चा की। उन्होंने इस भगदड़ के माहौल को रोकने के लिए कबीर के संदेश की ताकत पहचानने की जरूरत बताई। कहा कि कबीर कहते थे कि न कोई हिंदू बनकर आया है न मुसलमान। आचार्य कहते हैं कि संत कबीर ने मानव को जीने-रहने का सहज-सुलभ रास्ता बताया है। कबीर कहते हैं कि आदमी घर न छोड़े, जंगल में नहीं जाए। कंदराओं में तपस्या करने की जरूरत नहीं होगी। आदमी जब काम करेगा, मेहनत करेगा, तब इसी के बल पर आध्यात्म के शिखर पर पहुंच जाएगा। यह सिर्फ कथनी में नहीं करनी में भी कबीर ने सच करके दिखाया है। इसीलिए जीवन भर उन्होंने बुनकरी की। बुनकरी उनके पेट का धंधा नहीं था, इसलिए कि राजा काशी नरेश वीरदेव सिंह, बांधवगढ़ के राजा राम सिंह और लखनऊ के नवाब बिजली खां पठान उनके शिष्य थे। फिर भी वह कपड़ा बुनते रहे, श्रम करते रहे। इसलिए कि काशी में बुनकरी को लेकर हीन भावना थी। वह इस मेहनत के जरिए श्रम और साधना को जीवन जीने के सबसे सहज मार्ग के रूप में साबित कर रहे थे। वह कहते हैं कि कर बहियां बल आपने छोड़ पराई आस.../जाके आंगन नदी बहे सो कस मरत पियास...।
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कैराना और कांधला के लोगों को कबीर को पढ़ना चाहिए। कबीर ने कहा है कि- संतों पांडे निपुन कसाई/बकरा मारि भैंसा पर धाबै दिल में दरद न आई...। एके मटिया एक कुम्हारा/एक सभन्ह का सिरजन हारा...। इसलिए किसी को भागने की जरूरत नहीं है। भाग कर कहां जाएंगे। जहां भी जाएंगे, वहां लड़ना पड़ेगा। आसपास के माहौल से।
आचार्य कहते हैं कि- कबिरा तेरी झोपड़ी गलकट्टों के पास /जो करेगा सो भरेगा तूं क्यों होत उदास...। जहां जाएंगे, वहां कसाई मिलेंगे...। आखिर जाएंगे कहां। अपने मन को पवित्र करिए, कसाई से घृणा करने की जरूरत नहीं...।