तीन साल बाद की वापसी: बनारस की वेटलिफ्टर बेटी का उज्बेकिस्तान में परचम, कॉमनवेल्थ गेम्स 2022 की राह हुई आसान
कॉमनवेल्थ गेम्स 2018 में बनारस की बेटी पूनम यादव ने स्वर्ण पदक जीतकर देश को गौरवान्वित किया था। तीन साल बाद उन्होंने वापसी की है और उज्बेकिस्तान में परचम लहराया है।
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उज्बेकिस्तान में सात से 17 दिसंबर के बीच चल रहे कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में वाराणसी के दादूपुर गांव (हरहुआ) की रहने वाली पूनम यादव ने तीन साल बाद वापसी करते हुए रजत पदक पर कब्जा जमाया है। पूनम ने पूर्वोत्तर रेलवे की ओर से हिस्सा लेते हुए 76 किलो भार वर्ग में 220 किलो भार उठाकर पदक जीता।
इसके साथ ही पूनम ने विश्व वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में सातवां स्थान हासिल कर बर्मिंघम 2022 में होने वाली कॉमनवेल्थ गेम्स के लिए टिकट पाने का रास्ता आसान कर लिया। पूनम पूर्वोत्तर रेलवे वाराणसी मंडल में टिकट निरीक्षक के पद पर तैनात हैं।
तीन साल बाद वापसी, पहले ही प्रयास में पदक जीती
पूनम ने बताया कि कोरोना महामारी और शादी होने के तीन साल बाद मुंबई में कठिन परिश्रम के तीन साल लंबे अंतराल के बाद पहले प्रयास में देश के लिए पदक जीत पाई हुई। इससे पहले पूनम 2018 के कॉमनवेल्थ गेम्स में स्वर्ण पदक जीत चुकी है।
पूनम की दोनों बहन भी वेटलिफ्टर, भाई भी बढ़ा रहा काशी का मान
इधर, पूनम के परिवार और ससुराल में खुशी का माहौल रहा। पिता कैलाश यादव ने बेटी की जीत पर खुशी जाहिर करते हुए गांव और परिवार मिठाई बांटकर खुशियां मनाई। कैलाश ने बताया कि मेरी तीन बेटियों में सबसे बड़ी बेटी शशि ने वेटलिफ्टिंग की बदौलत रेलवे में नौकरी पाई।
दूसरी बेटी पूनम ने भी बड़ी बेटी के नक्शे कदम पर चलकर रेलवे में नौकरी और शादी के बाद भी खेल भावना का दामन नहीं छोड़ा। जिसका नतीजा है देश के लिए रजत पदक। तीसरी बेटी पूजा भी नेशनल स्तर की वेटलिफ्टर है। इनके अलावा दो बेटे है जो एथलेटिक्स और हॉकी में काशी का मान बढ़ा रहे है।
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