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Hindi News ›   Uttar Pradesh ›   Varanasi News ›   Vyomesh Shukla said Over past 25 years nature and character of Banarasi bustle have undergone transformation

25 साल 25 कहानियां: '25 वर्षों में बनारसी हो-हल्ले का स्वभाव और गुणधर्म बदल गया'

Wed, 13 May 2026 03:26 PM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Pragati Chand Updated Wed, 13 May 2026 03:26 PM IST
सार

Varanasi News: नागरी प्रचारिणी सभा के व्योमेश शुक्ल ने कहा कि बनारस में तर्क हल्ले के आगे हार मान लेता है। पहले वह हल्ला सुर और ताल, विद्या और विनय, राग और रंग के अखाड़े से निकलकर आता था।

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Vyomesh Shukla said Over past 25 years nature and character of Banarasi bustle have undergone transformation
व्योमेश शुक्ल, प्रधानमंत्री, नागरी प्रचारिणी सभा - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

हो-हल्ला बनारस का स्थायी भाव है। तबले की उठान, कथक के घुंघरुओं का अनुनाद, गायकी का रियाज, बटुकों का मंत्रोच्चार और शोहदों की गालियां, सब कुछ हल्ले की अल्पना में रंगों की तरह विन्यस्त है। इसमें हे, अरे और अबे जैसे संबोधन हैं। मशीनों, इंजनों, सीटियों, हूटरों, सायरनों और घंटों का निनाद है। कानाफूसी और चुप्पियां हैं। राम नाम सत्य है और महादेव का उद्घोष है। मुहर्रम की आठवीं तारीख पर कर्बला के शहीदों को आंसुओं का नजराना पेश करती शहनाई भी इसमें है।

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हालांकि, बीते 25 वर्षों में बनारसी हो-हल्ले का स्वभाव और गुणधर्म बदल गया है। बरसात के चार महीनों में यहां गंगाजी भी धीरे-धीरे कुछ बोलती हैं, लेकिन सुनने की कौन कहे, उनके पड़ोस में टहलते हुए हम मनुष्य खुद ही बोलते रहने में व्यस्त रह जाते हैं।
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बनारसवाले बातूनी हो गए। यूं, वाणी के वीर वे पहले भी कम नहीं थे, लेकिन पहले बोलना कुछ सुरीला था। उसमें सुनने की भी जगह थी। एक बार ध्रुव वैष्णव हिंदी कवि भारतेंदु हरिश्चंद्र ने धर्म-सुधारक दयानंद सरस्वती को शास्त्रार्थ के लिए चुनौती दी थी। जब वह तर्कों में दयानंद के सामने निरुत्तर हो जाते तो उनके साथ मौजूद कलाकारों, गायकों, नर्तकों, और मसखरों का मंडल जोर-जोर से डमरू, शंख, नगाड़े और तुरही आदि बजाने लगता। एक बार, दो बार, तीन बार दयानंदजी ने हाथ जोड़ लिए। उनका तर्क जीत गया था, लेकिन वे हार गए थे। बनारस के संगीत ने दुनिया की इस सबसे पुरानी जागती बस्ती के हो-हल्ले ने विद्वान को पराभूत कर दिया था।
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बनारस में तर्क हल्ले के आगे हार मान लेता है। पहले वह हल्ला सुर और ताल, विद्या और विनय, राग और रंग के अखाड़े से निकलकर आता था। शताब्दियों पुराने संस्कृत ग्रंथ कुट्टनीमतम् में ग्रंथकार दामोदर गुप्त ने एक स्थान पर काशी की शान में लिखा है कि यहां रमणियों के नूपुरों की ध्वनि से सब दिशाएं और आकाश बहरे हुए रहते हैं।


बिचारे गुरु क्या करें? शिष्य अशुद्ध पढ़ते हैं तो उन्हें टोक नहीं सकते। सुनें तो टोकें। ऐसा था बनारस। वेदाध्ययन में खलल भी पड़े तो नूपुर-ध्वनि से। शब्द को अपदस्थ करे तो संगीत। कंधे पर विराट अतीत का बोझ लेकर इतिहास की सीढ़ियों पर ऊपर चढ़ते-चढ़ते बनारस कुछ ठिठक गया है। वह जाना ऊपर चाहता है, लेकिन नीचे की ओर बहुत आकर्षण है। नीचे आत्मविश्वास है, सुख है, सुविधाएं हैं, एक प्रबल और खूब बोलता हुआ वर्तमान है। ऊपर तप है, रियाज है, अच्छे को और अच्छा बनाने का संघर्ष है और वह मौन है, जो आवाजों के इस असमाप्त मेले में कहीं खो गया है। सार्थक और निरर्थक ध्वनियों के इस समवेत ऑर्केस्ट्रा में पिछले पचीस वर्षों से उस चुप की जगह खाली है। -व्योमेश शुक्ल, प्रधानमंत्री, नागरी प्रचारिणी सभा

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