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वेदव्यास की तपस्थली कर्णघंटा कुंड बदहाल
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Fri, 03 Jun 2016 01:31 AM IST
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काशी को स्मार्ट सिटी बनाने की तो चिंता है लेकिन धरोहरों को बचाने की नहीं। कभी जहां महर्षि वेदव्यास ने पुराणों की रचना की थी, वह कर्णघंटा तीर्थ बदहाल है। काशी खंडोक्त प्राचीन मंदिर ढह रहे हैं। कुंड भी आने वाले दिनों में अतीत का पन्ना बन जाएगा। मुहल्ले के कूड़े से पटने की वजह से वहां लोग अब दर्शन-पूजन करना तो दूर कुछ देर खड़े होने में भी हिचकते हैं।
बुलानाला से काशीपुरा जाने वाली सड़क पर महज दस कदम बढ़ते ही बाएं हाथ कर्णघंटा कुंड है। महर्षि वेदव्यास ने इसी जगह पुराणों की रचना शुरू की थी।
महर्षि व्यास का काशी में इकलौता मंदिर कर्णघंटा में ही है, जहां आषाढ़ में गुरु पूर्णिमा पर मेला लगता है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास को इसी कुंड पर पहली बार हनुमान जी के दर्शन हुए थे। उन्होंने काशी में हनुमानजी का प्रथम मंदिर इसी कुंड पर स्थापित किया था। कंठेश्वर महादेव के अलावा छप्पन विनायकों में से एक गणेश का भी मंदिर इसी कुंड पर है। आज हालत ये है कि कुंड के चारों तरफ अवैध कब्जा कर लिया गया है। लोगों का कहना है कि कुंड की शीघ्र ड्रेजिंग कराकर सफाई नहीं कराई गई तो यह भी गुजरे जमाने का किस्सा बनकर रह जाएगा।
पौराणिक कुंड की दशा इतनी खराब हो चुकी है कि अब वहां न तो जल है न जीवन की उम्मीद। यानी इस कुंड की हजारों मछलियों की जान भी खतरे में है। विशाल कुंड में महज तीन मीटर एरिया में कीचड़युक्त गंदा पानी रह गया है। मछलियां उसमें छटपटाती नजर आती हैं। कुंड के पीछे स्थित एक मठ से 10-20 बाल्टी पानी रोज छोड़ा जा रहा है जो इस भीषण गर्मी में पर्याप्त नहीं।
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बुलानाला से काशीपुरा जाने वाली सड़क पर महज दस कदम बढ़ते ही बाएं हाथ कर्णघंटा कुंड है। महर्षि वेदव्यास ने इसी जगह पुराणों की रचना शुरू की थी।
महर्षि व्यास का काशी में इकलौता मंदिर कर्णघंटा में ही है, जहां आषाढ़ में गुरु पूर्णिमा पर मेला लगता है। मान्यता है कि गोस्वामी तुलसीदास को इसी कुंड पर पहली बार हनुमान जी के दर्शन हुए थे। उन्होंने काशी में हनुमानजी का प्रथम मंदिर इसी कुंड पर स्थापित किया था। कंठेश्वर महादेव के अलावा छप्पन विनायकों में से एक गणेश का भी मंदिर इसी कुंड पर है। आज हालत ये है कि कुंड के चारों तरफ अवैध कब्जा कर लिया गया है। लोगों का कहना है कि कुंड की शीघ्र ड्रेजिंग कराकर सफाई नहीं कराई गई तो यह भी गुजरे जमाने का किस्सा बनकर रह जाएगा।
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पौराणिक कुंड की दशा इतनी खराब हो चुकी है कि अब वहां न तो जल है न जीवन की उम्मीद। यानी इस कुंड की हजारों मछलियों की जान भी खतरे में है। विशाल कुंड में महज तीन मीटर एरिया में कीचड़युक्त गंदा पानी रह गया है। मछलियां उसमें छटपटाती नजर आती हैं। कुंड के पीछे स्थित एक मठ से 10-20 बाल्टी पानी रोज छोड़ा जा रहा है जो इस भीषण गर्मी में पर्याप्त नहीं।
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