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जांच में बनारस के पानी के नमूने हुए पास
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भारतीय मानक ब्यूरो की जांच में दिल्ली समेत 10 शहरों के नमूने फेल हो गए हैं। यह बेहद चिंताजनक स्थिति हैं। बनारस में पेयजल में सीवर के पानी की शिकायतें तो मिली हैं लेकिन पेयजल के नमूने गुणवत्ता में बेहतर पाए गए हैं। लखनऊ के स्टेट हेल्थ सेंटर द्वारा वाराणसी के पेयजल के नमूने जांच में खरे उतरे हैं। जलकल विभाग के अधिकारियों का दावा है कि वह बनारस की जनता को शुद्ध पेयजल की सप्लाई कर रहे हैं। जलकल के जीएम नीरज गौंड़ का कहना है कि वाराणसी के पेयजल के नमूने सैंपलिंग में फेल नहीं हुए हैं। सीवर लाइन ध्वस्त होने के कारण ही गंदे पानी की आपूर्ति की शिकायतें मिलती हैं।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भू भौतिकी विभाग की जांच रिपोर्ट के अनुसार रामनगर तथा शहर के आसपास के गांवों में आर्सेनिक और नाइट्रेट की मात्रा मिली हैं। इससे वैज्ञानिकों के कान खड़े हो गए हैं। वहीं दूसरी तरफ शहर में क्षतिग्रस्त सीवर लाइनें पीने योग्य पानी को प्रदूषित कर रही हैं। गंगा में भी प्रदूषण का स्तर खतरनाक बना हुआ है। नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार, अस्सी से लेकर आदिकेशव घाट तक लिए गए जल के नमूनों की जांच के परिणाम बेहद चौंकाने वाले आए हैं। डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा वरुणा संगम पर खतरनाक स्तर तक कम है। कुछ साल पहले गंगा में घुलनशील आक्सीजन का स्तर पांच या छह मिलीग्राम प्रति लीटर होता था, लेकिन अब अस्सी घाट पर एक मिलीग्राम और आदिकेशव घाट पर घुलनशील आक्सीजन की स्थिति शून्य तक पहुंच गई है। आंकड़े बताते हैं कि गंगा में रोजाना 350 एमएलडी सीवेज गिराया जा रहा है। पहले गंगा में प्रवाह के कारण मल जल घुल जाता था, लेकिन पानी और प्रवाह कम होने से समस्या बढ़ गई है। इसी तरह गंगा में फीकल कॉलीफार्म 500 के अंदर होना चाहिए, लेकिन तुलसी घाट पर यह आंकड़ा 70 हजार और दशाश्वमेध घाट पर 50 हजार पहुंच गया है। वरुणा संगम पर भी स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां फीकल कॉलीफार्म की स्थिति छह करोड़ के पास पहुंच चुकी है। गंगा के बीओडी लेवल की आदर्श स्थिति तीन मिलीग्राम प्रति लीटर है, जबकि तुलसी घाट पर सात मिलीग्राम, दशाश्वमेध घाट पर छह मिलीग्राम और वरुणा के संगम पर 45 मिलीग्राम पहुंच गई है। बीओडी का खतरनाक स्तर बताता है कि गंगा में आर्गेनिक लोड कितना है।
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काशी हिंदू विश्वविद्यालय के भू भौतिकी विभाग की जांच रिपोर्ट के अनुसार रामनगर तथा शहर के आसपास के गांवों में आर्सेनिक और नाइट्रेट की मात्रा मिली हैं। इससे वैज्ञानिकों के कान खड़े हो गए हैं। वहीं दूसरी तरफ शहर में क्षतिग्रस्त सीवर लाइनें पीने योग्य पानी को प्रदूषित कर रही हैं। गंगा में भी प्रदूषण का स्तर खतरनाक बना हुआ है। नदी विज्ञानी प्रो. बीडी त्रिपाठी के अनुसार, अस्सी से लेकर आदिकेशव घाट तक लिए गए जल के नमूनों की जांच के परिणाम बेहद चौंकाने वाले आए हैं। डिजाल्व आक्सीजन की मात्रा वरुणा संगम पर खतरनाक स्तर तक कम है। कुछ साल पहले गंगा में घुलनशील आक्सीजन का स्तर पांच या छह मिलीग्राम प्रति लीटर होता था, लेकिन अब अस्सी घाट पर एक मिलीग्राम और आदिकेशव घाट पर घुलनशील आक्सीजन की स्थिति शून्य तक पहुंच गई है। आंकड़े बताते हैं कि गंगा में रोजाना 350 एमएलडी सीवेज गिराया जा रहा है। पहले गंगा में प्रवाह के कारण मल जल घुल जाता था, लेकिन पानी और प्रवाह कम होने से समस्या बढ़ गई है। इसी तरह गंगा में फीकल कॉलीफार्म 500 के अंदर होना चाहिए, लेकिन तुलसी घाट पर यह आंकड़ा 70 हजार और दशाश्वमेध घाट पर 50 हजार पहुंच गया है। वरुणा संगम पर भी स्थिति बेहद चिंताजनक है। यहां फीकल कॉलीफार्म की स्थिति छह करोड़ के पास पहुंच चुकी है। गंगा के बीओडी लेवल की आदर्श स्थिति तीन मिलीग्राम प्रति लीटर है, जबकि तुलसी घाट पर सात मिलीग्राम, दशाश्वमेध घाट पर छह मिलीग्राम और वरुणा के संगम पर 45 मिलीग्राम पहुंच गई है। बीओडी का खतरनाक स्तर बताता है कि गंगा में आर्गेनिक लोड कितना है।
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