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Varanasi News: जन औषधि केंद्रों से 30 रुपये की दवा 150 में, बेची जा रहीं मोनोपॉली दवाएं; जानें पूरा खेल

Sun, 17 May 2026 01:37 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sun, 17 May 2026 01:37 PM IST
सार

Varanasi News: वाराणसी के सरकारी अस्पतालों के जनऔषधि केंद्रों पर सस्ती दवाओं की जगह महंगी मोनोपॉली दवाएं बेचे जाने का मामला सामने आया है। कई केंद्रों पर जरूरी दवाओं की कमी है, जिससे मरीजों से अधिक कीमत वसूली जा रही है। स्वास्थ्य विभाग और ड्रग विभाग की निगरानी न होने से मरीजों को निजी कंपनियों की महंगी दवाएं खरीदनी पड़ रही हैं।

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Varanasi News Medicines Worth 30 Being Sold for 150 at Jan Aushadhi Kendras—Monopoly Drugs Being Peddled
जनऔषधि केंद्र। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

Varanasi News: जिले के सरकारी अस्पतालों के जनऔषधि केंद्रों पर सस्ती दवाओं के नाम पर मोनोपॉली दवाएं बेची जा रही हैं। यहां 30 रुपये की दवा 150 रुपये तक में दी जा रही है। जिला मंडलीय अस्पताल समेत शहर के 104 जन औषधि केंद्रों पर दवाओं की किल्लत है। 

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इन केंद्रों पर दर्द निवारक दवाओं से लेकर बीपी और शुगर की दवा तक नहीं है। कई जगहों पर दवाएं न होने के कारण मरीजों को मोनोपॉली और महंगी दवाएं दी जा रही हैं। आवश्यक दवाएं खरीदने के लिए मरीजों को मजबूरी में निजी दुकानों के चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
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जन औषधि केंद्रों में 17 रुपये की दर्द निवारक एसीक्लोफेनेक पैरासिटामॉल और सरेसियोपेप्टिडेज के लिए 130 रुपये एमआरपी की दवा दी जा रही है। इसके बदले मनमाना पैसा वसूला जा रहा है। इन जन औषधि केंद्रों पर स्वास्थ्य विभाग का कोई नियंत्रण नहीं है। ड्रग विभाग की ओर से कभी भी दवाओं की गुणवत्ता और कीमतों की जांच नहीं होती है। ऑडिट के अभाव में स्टॉक में हेराफेरी और बाहरी निजी कंपनियों की महंगी जेनेरिक दवाएं बेचने का रास्ता साफ हो गया है।

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सरकारी दवाओं से कई गुना ज्यादा होती है कीमत : जिला अस्पताल के एक कर्मचारी ने बताया कि जब मरीज सस्ती जन औषधि दवा मांगने पहुंचता है, तो उसे स्टॉक खत्म होने का हवाला दिया जाता है। इसके विकल्प के रूप में संचालक उसे वही दवा किसी दूसरी कंपनी का थमा देते हैं। इसकी कीमत सरकारी दर से कई गुना ज्यादा होती है। कई संचालक सरकारी जेनेरिक दवाओं के बजाय ज्यादा एमआरपी वाली निजी जेनेरिक कंपनियों की दवाओं को प्राथमिकता दे रहे हैं। 

अस्पताल के भीतर ही मिले दवा : अपर निदेशक
रामनगर के लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल में ईसीजी रूम ओपीडी परिसर में ही बनाया जाएगा। मरीजों को अस्पताल में इधर-उधर चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा। शनिवार को अपर निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण डॉ. एनडी शर्मा ने निरीक्षण कर सीएमएस डॉ. जीसी द्विवेदी को निर्देशित किया। अपर निदेशक ने अस्पताल में सबसे पहले ओपीडी ब्लॉक का जायजा लिया और विभिन्न विभागों में मरीजों को दी जा रही चिकित्सा सेवाओं की जानकारी ली। 

सीएमएस ने बताया कि नई सीबी नाट मशीन एक्टिव कर दी गई है। एक दिन में 17 संदिग्ध टीबी मरीजों की जांच भी की गई थी। अपर निदेशक ने टीबी जांच व्यवस्था को महत्वपूर्ण बताते हुए नियमित जांच और समय पर रिपोर्ट उपलब्ध कराने के निर्देश दिए। अंत में अपर निदेशक ने अस्पताल के चिकित्सकों और स्टाफ के साथ बैठक की। 

केस 1: अर्दली बाजार के अनिकेत कुमार को आंख में इंफेक्शन होने पर ईएसआईसी अस्पताल में चिकित्सक ने सिप्रोफ्लॉक्सासिन आई ड्रॉप, एसीक्लोफेनेक के साथ पैरासिटामोल और एमॉक्सिसाइक्लिन दवा लिख दी। जन औषधि केंद्र पर यह दवा सामान्य तौर पर 100 रुपये में आसानी से मिल जाती है, लेकिन यही दवा मरीज को जिला अस्पताल के जन औषधि केंद्र से अन्य कंपनी की और 230 रुपये में दी गई।

केस 2: शिवपुर के रामेश्वर प्रसाद को थाइराॅइड की दवा नियमित रूप से चलती है। जिला अस्पताल में चिकित्सकों ने उन्हें थायरॉक्सिन 75 एमजी और एक कैल्शियम की दवा लिख दी। अस्पताल में दवा काउंटर पर दवा समाप्त होने पर वह जन औषधि केंद्र में लेने गए। दो दवाएं जो सामान्य तौर 150-190 रुपये में मिल जाती हैं, इसके लिए उनसे 280 रुपये लिए गए। इसमें भी थायरॉक्सिन दवा सही दी गई, लेकिन कैल्शियम के नाम पर मोनोपॉली कंपनी की जेनेरिक दवा दी गई।

ये होती हैं मोनोपॉली दवाएं 
यह किसी खास बीमारी की दवा नहीं होती है। फार्मास्युटिकल व्यापार और वितरण के एक विशेष मॉडल है। इस व्यापार मॉडल में कंपनी किसी निश्चित क्षेत्र में अपने फ्रैंचाइज पार्टनर को दवा बेचने के विशेष अधिकार देती है। इससे क्षेत्र में कोई अन्य डिस्ट्रीब्यूटर या रिटेलर कंपनी की उसी दवा को उसी नाम से नहीं बेच सकता। इससे बाज़ार में प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाती है और व्यापारी का मुनाफा बढ़ जाता है।

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