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अधिमास के कारण 148 दिन विश्राम करेंगे भगवान विष्णु
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वाराणसी। पुरुषोत्तम मास के कारण प्रमादी नवसंवत्सर 13 महीने का होगा। 19 सालों के बाद अश्विन मास में अधिमास पड़ने के कारण इसके कई शुभाशुभ फलयोग भी बन रहे हैं। अधिमास अर्थात मलमास होने के कारण चातुर्मास की अवधि भी एक माह बढ़ जाएगी। सूर्यपुराण में कहा गया है कि आश्विने परचक्रेण तस्करै: पीडि़ता: प्रजा:। सुभिक्षं क्षेममारोग्यं दुर्भिक्षं दक्षिणापथे। अर्थात जब अश्विन मास में अधिक मास होता है तो दूसरे के शासन व चोरों से जनता दुखी हो जाती है। सुभिक्ष, कल्याण, निरोगता, दक्षिण में दुर्भिक्ष, राजाओं का नाश और ब्राह्मणों की वृद्धि होती है। ज्योतिषाचार्य पं. गणेश प्रसाद मिश्र ने बताया कि मलमास की अवधि 18 सितंबर से 16 अक्तूबर के मध्य होगी। जिस महीने में सूर्य संक्रांति ना हो वह महीना अधिमास होता है। अधिमास 32 महीने, 16 दिन और 4 घटी के अंतर से आया करता है। लोक व्यवहार में अधिमास अधिक मास, मलमास, मलिम्लुच मास और पुरुषोत्तम मास नाम से विख्यात है। दो आश्विन मास में की स्थिति 19 साल बाद बनी है। इसके पूर्व 2001, 1982, 1963, 1899 में अश्विन मास में अधिमास पड़ा था। अब आश्विन मास में अधिमास 2039 में होगा।
आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार मास के लिए शयन करते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी का नाम देवशयनी है। इसका नाम पद्मा एकादशी भी है। जो इस वर्ष एक जुलाई को पड़ रही है। भगवान का जागरण चार मास बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है। इन चार मासों में सभी प्रकार के शुभ कर्म वर्जित होते हैं। परंतु इस वर्ष इन चार मासों के बीच में अधिमास आ जाने से चार मास यानि 118 दिन की जगह पांच मास लगभग 148 दिन भगवान विश्राम करेंगे। संत-महात्माओं का चातुर्मास भी इतने ही दिन का होगा।
इस वर्ष जनवरी से दिसंबर तक विवाह के लिए 65 दिन ही मुहूर्त थे। विवाह मुहूर्त कम होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस बार एक जुलाई को देवशयनी एकादशी है। जबकि देव उठनी एकादशी 25 नवंबर को होगी। इससे जाहिर है कि इस बार देवों के विश्राम और चातुर्मास की अवधि 148 दिन की करीब 5 माह की रहेगी।
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पुरुषोत्तम मास के कारण नए वर्ष में शारदीय नवरात्रि एक महीने देरी से आएगी। दरअसल पितृमोक्ष अमावस्या के बाद 18 सितंबर से 16 अक्तूबर तक पुरुषोत्तम मास रहेगा। इस कारण 17 अक्टूबर से नवरात्रि पर्व शुरू होगा। चातुर्मास के दौरान इस मास के होने के कारण शादियों के मुहूर्त पर असर नहीं पड़ रहा है। इसके दो साल पहले जब अधिमास भाद्रपद में पड़ा था तब ऐसी स्थिति नहीं बनी थी। पिछले वर्ष तो 11 जुलाई तक मुहूर्त था। हरिशयनी 12 जुलाई को थी। इस बार एक जुलाई को हरिशयनी हो जाने से मंगल कार्य बंद हो जाएंगे।
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आषाढ़ शुक्ल एकादशी को भगवान विष्णु चार मास के लिए शयन करते हैं। आषाढ़ शुक्ल एकादशी का नाम देवशयनी है। इसका नाम पद्मा एकादशी भी है। जो इस वर्ष एक जुलाई को पड़ रही है। भगवान का जागरण चार मास बाद कार्तिक शुक्ल पक्ष की एकादशी को होता है। इन चार मासों में सभी प्रकार के शुभ कर्म वर्जित होते हैं। परंतु इस वर्ष इन चार मासों के बीच में अधिमास आ जाने से चार मास यानि 118 दिन की जगह पांच मास लगभग 148 दिन भगवान विश्राम करेंगे। संत-महात्माओं का चातुर्मास भी इतने ही दिन का होगा।
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इस वर्ष जनवरी से दिसंबर तक विवाह के लिए 65 दिन ही मुहूर्त थे। विवाह मुहूर्त कम होने की एक बड़ी वजह यह भी है कि इस बार एक जुलाई को देवशयनी एकादशी है। जबकि देव उठनी एकादशी 25 नवंबर को होगी। इससे जाहिर है कि इस बार देवों के विश्राम और चातुर्मास की अवधि 148 दिन की करीब 5 माह की रहेगी।
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पुरुषोत्तम मास के कारण नए वर्ष में शारदीय नवरात्रि एक महीने देरी से आएगी। दरअसल पितृमोक्ष अमावस्या के बाद 18 सितंबर से 16 अक्तूबर तक पुरुषोत्तम मास रहेगा। इस कारण 17 अक्टूबर से नवरात्रि पर्व शुरू होगा। चातुर्मास के दौरान इस मास के होने के कारण शादियों के मुहूर्त पर असर नहीं पड़ रहा है। इसके दो साल पहले जब अधिमास भाद्रपद में पड़ा था तब ऐसी स्थिति नहीं बनी थी। पिछले वर्ष तो 11 जुलाई तक मुहूर्त था। हरिशयनी 12 जुलाई को थी। इस बार एक जुलाई को हरिशयनी हो जाने से मंगल कार्य बंद हो जाएंगे।