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निकाय चुनावः बनारस के मुस्लिम इलाकों में कहीं ‘पंजा’ बढ़ा तो कहीं चली ‘साइकिल’
ब्यूरो,अमर उजाला,वाराणसी
Updated Mon, 27 Nov 2017 01:05 AM IST
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मतदान के लिए कतार
- फोटो : अमर उजाला
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'शहर की सरकार' चुनने में बनारस मुस्लिम मतदाताओं ने पूरा उत्साह दिखाया। मुस्लिम इलाकों में मतदान केंद्रों पर सुबह से शाम तक मतदाताओं की कतार लगी रही। हालांकि ये मतदाता ‘पंजा’ और ‘साइकिल’ में बंटे नजर आए। यहां ‘एक पंजा और एक साइकिल’ का नारा खूब चला। सिर्फ मुस्लिम मतदाता ही नहीं यादव वोट भी इन्हीं पार्टियों में बंटा नजर आया। हालांकि कुछ वोट भाजपा, बसपा और निर्दल प्रत्याशियाें को भी मिले हैं।
मुस्लिम और यादवों के सरदारों की मानें तो उनके समुदाय के वोट पार्षद पर सपा और महापौर पर कांग्रेस को पड़े हैं। रणनीतिकार मानते हैं कि हार-जीत किसी की भी हो लेकिन लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के बीच रहेगी। हार-जीत का अंतर कम रहेगा।
मदनपुरा, रेवड़ी तालाब, लल्लापुरा, बजरडीहा, दालमंडी, बेनियाबाग आदि मुस्लिम इलाकों के वोट कांग्रेस और सपा प्रत्याशियों को मिले हैं। वहीं सरैया, पीलीकोठी, बड़ी बाजार, जलालीपुरा, कोनिया, अलईपुरा आदि इलाके में भी मतदाताओं का रुझान सपा और कांग्रेस की ओर ही रहा।
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कुछ बूथों पर मुस्लिम मतदाता सरकार की नीतियों से नाराज नजर आए। जहीर अनवर, हाजी बाबू का कहना था कि कारोबार चौपट हो रहा है। जनता अब बदलाव चाहती है। 22 साल से विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है।
सीवर, सड़क, पानी और जाम की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई। अच्छे दिनों के सपनों की जगह बुरे दिन आ गए हैं। बीएचयू के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. कौशल किशोर मिश्र का कहना है कि मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा के साथ हैं जबकि पुरुष पीएम मोदी का विरोध कर रहे हैं।
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मुस्लिम और यादवों के सरदारों की मानें तो उनके समुदाय के वोट पार्षद पर सपा और महापौर पर कांग्रेस को पड़े हैं। रणनीतिकार मानते हैं कि हार-जीत किसी की भी हो लेकिन लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के बीच रहेगी। हार-जीत का अंतर कम रहेगा।
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मदनपुरा, रेवड़ी तालाब, लल्लापुरा, बजरडीहा, दालमंडी, बेनियाबाग आदि मुस्लिम इलाकों के वोट कांग्रेस और सपा प्रत्याशियों को मिले हैं। वहीं सरैया, पीलीकोठी, बड़ी बाजार, जलालीपुरा, कोनिया, अलईपुरा आदि इलाके में भी मतदाताओं का रुझान सपा और कांग्रेस की ओर ही रहा।
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कुछ बूथों पर मुस्लिम मतदाता सरकार की नीतियों से नाराज नजर आए। जहीर अनवर, हाजी बाबू का कहना था कि कारोबार चौपट हो रहा है। जनता अब बदलाव चाहती है। 22 साल से विकास के नाम पर कुछ नहीं हुआ है।
सीवर, सड़क, पानी और जाम की समस्या दिन-ब-दिन बढ़ती ही गई। अच्छे दिनों के सपनों की जगह बुरे दिन आ गए हैं। बीएचयू के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रो. कौशल किशोर मिश्र का कहना है कि मुस्लिम महिलाएं तीन तलाक के मुद्दे पर भाजपा के साथ हैं जबकि पुरुष पीएम मोदी का विरोध कर रहे हैं।
बढ़े वोटिंग प्रतिशत ने बढ़ाई बेचैनी
चंद्रशेखर आजाद वार्ड का वोटिंग प्रतिशत 86.36 रहा
- फोटो : अमर उजाला
वाराणसी नगर निगम में 2012 के मुकाबले इस बार मतदान प्रतिशत में तकरीबन दस फीसदी की बढ़ोतरी ने राजनीतिक दलों की बेचैनी बढ़ा दी है। खासकर भाजपा, सपा और कांग्रेस की ओर से इसे अपने-अपने हक में बताने की होड़ लगी है। जीत सुनिश्चित होने के दावे किए जा रहे हैैं लेकिन सियासी सूत्रों का दावा है कि अंदरखाने सबकी बेचैनी बढ़ी है। बढ़े वोट प्रतिशत का गुणा-गणित बैठाने के लिए बूथवार मतदान प्रतिशत की समीक्षा की जा रही है लेकिन अलग-अलग वार्डों में समीकरणों के उतार-चढ़ाव को लेकर पार्टियां उलझन में हैं।
1995 में वाराणसी के नगर निगम बनने के बाद से चुनाव का यह पांचवां मौका है। अब तक नगर निगम की महापौर सीट पर चारों बार भाजपा का ही कब्जा रहा है। शहर में भाजपा के परंपरागत वोटरों की अच्छी-खासी तादाद है। पिछड़ा वर्ग और निमभन आय वर्ग के वोटरों तक अपनी पहुंच के लिए हाल के वर्षों में पार्टी ने लगातार कोशिशें की हैं और परंपरागत छवि को भी तोड़ा है। तीन तलाक के मसले पर कुछ मुस्लिम महिलाओं के भी समर्थन की बात चर्चा में रही है।
नगर निगम पर लगातार कब्जा होने के बावजूद यहां की बुनियादी सुविधाओं की खस्ताहाली विपक्षियों के लिए प्रमुख चुनावी मुद्दा बनी। खासकर सपा और कांग्रेस ने भाजपा के नगर निगम के 22 साल के कार्यकाल को मुद्दा बनाया। दोनों ही पार्टियों के लिए परंपरागत वोटरों के साथ ही मुस्लिम मतों का भरोसा है। इस बार जातिगत समीकरणों के आधार पर भी वोटरों के बंटने की बात कही जा रही है।
मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटिंग प्रतिशत बेहतर रहा है। आम तौर पर भाजपा विरोधी मतदान का रुझान होने के नाते माना जा रहा है कि मुस्लिम मत सपा और कांग्रेस के बीच बंटे। सियासी रणनीतिकारों के मुताबिक इस बार हार-जीत का अंतर कम रह सकता है। भाजपा को कांग्रेस और सपा ने कांटे की टक्कर दी है लेकिन मुस्लिम मत कहीं एक जगह नहीं गए। मतों के इस बंटवारे से भाजपा को लाभ होगा। 2012 के चुनाव में तकरीबन 33 फीसदी वोटिंग हुई थी और भाजपा के रामगोपाल मोहले मेयर चुने गए थे।
1995 में वाराणसी के नगर निगम बनने के बाद से चुनाव का यह पांचवां मौका है। अब तक नगर निगम की महापौर सीट पर चारों बार भाजपा का ही कब्जा रहा है। शहर में भाजपा के परंपरागत वोटरों की अच्छी-खासी तादाद है। पिछड़ा वर्ग और निमभन आय वर्ग के वोटरों तक अपनी पहुंच के लिए हाल के वर्षों में पार्टी ने लगातार कोशिशें की हैं और परंपरागत छवि को भी तोड़ा है। तीन तलाक के मसले पर कुछ मुस्लिम महिलाओं के भी समर्थन की बात चर्चा में रही है।
नगर निगम पर लगातार कब्जा होने के बावजूद यहां की बुनियादी सुविधाओं की खस्ताहाली विपक्षियों के लिए प्रमुख चुनावी मुद्दा बनी। खासकर सपा और कांग्रेस ने भाजपा के नगर निगम के 22 साल के कार्यकाल को मुद्दा बनाया। दोनों ही पार्टियों के लिए परंपरागत वोटरों के साथ ही मुस्लिम मतों का भरोसा है। इस बार जातिगत समीकरणों के आधार पर भी वोटरों के बंटने की बात कही जा रही है।
मुस्लिम बहुल इलाकों में वोटिंग प्रतिशत बेहतर रहा है। आम तौर पर भाजपा विरोधी मतदान का रुझान होने के नाते माना जा रहा है कि मुस्लिम मत सपा और कांग्रेस के बीच बंटे। सियासी रणनीतिकारों के मुताबिक इस बार हार-जीत का अंतर कम रह सकता है। भाजपा को कांग्रेस और सपा ने कांटे की टक्कर दी है लेकिन मुस्लिम मत कहीं एक जगह नहीं गए। मतों के इस बंटवारे से भाजपा को लाभ होगा। 2012 के चुनाव में तकरीबन 33 फीसदी वोटिंग हुई थी और भाजपा के रामगोपाल मोहले मेयर चुने गए थे।
वार्डों में पार्षद पद पर उलटफेर की संभावना
आधी आबादी ने दिखाया दम
- फोटो : अमर उजाला
नगर निकाय चुनाव में मेयर पद के अलावा वार्डों में पार्षद प्रत्याशी अपने-अपने इलाके में एक दूसरे को खूब टक्कर दी है। स्थानीय और अपने व्यक्तिगत व्यवहार पर भी पार्षदों ने मतों को अपने पाले मेें किया है।
चुनाव के दौरान ऐसी भी चर्चा रही कि मुहल्ले के पार्षद प्रत्याशी को मतदान हुआ है तो मेयर सीट के लिए किसी दूसरे को। इसका फायदा भी मेयर और पार्षद दोनों प्रत्याशियों को मिला है। ऐसे में इस बार सदन में पार्षदों की संख्या किसी दल की घट-बढ़ सकती है।
पिछली बार सदन में सपा के 38 पार्षद थे जबकि भाजपा के 26 थे। बाद में पांच पार्षद भाजपा में शामिल हो गए थे तो उनकी संख्या सदन में 31 हो गई थी। वहीं दो पार्षद में एक-एक निर्दल और बसपा के थे।
सदन संचालित करने की होगी दिक्कत
जापान सरकार के सहयोग से कंवेंशन सेंटर बनाने के लिए नगर निगम सदन और प्रेक्षागृह को तोड़ा जा रहा है। ऐसे में नगर निगम ने सदन को चौकाघाट स्थित सांस्कृतिक संकुल में चलाने का निर्णय लिया था। लेकिन अब वहां भी सदन चलाने में दिक्कत आएगी।
वजह, मुख्यमंत्री के आदेश पर संकुल का रिडेवलपमेंट किया जाना है। इसके लिए वीडीए 47 करोड़ से अधिक रुपये का प्रस्ताव भी शासन को भेज चुका है। शासन से धन जारी होने के बाद संकुल के मरम्मत का काम शुरू हो गया तो सदन चलाने के लिए निगम प्रशासन को अब कहीं दूसरी जगह तलाश करनी पड़ेगी।
चुनाव के दौरान ऐसी भी चर्चा रही कि मुहल्ले के पार्षद प्रत्याशी को मतदान हुआ है तो मेयर सीट के लिए किसी दूसरे को। इसका फायदा भी मेयर और पार्षद दोनों प्रत्याशियों को मिला है। ऐसे में इस बार सदन में पार्षदों की संख्या किसी दल की घट-बढ़ सकती है।
पिछली बार सदन में सपा के 38 पार्षद थे जबकि भाजपा के 26 थे। बाद में पांच पार्षद भाजपा में शामिल हो गए थे तो उनकी संख्या सदन में 31 हो गई थी। वहीं दो पार्षद में एक-एक निर्दल और बसपा के थे।
सदन संचालित करने की होगी दिक्कत
जापान सरकार के सहयोग से कंवेंशन सेंटर बनाने के लिए नगर निगम सदन और प्रेक्षागृह को तोड़ा जा रहा है। ऐसे में नगर निगम ने सदन को चौकाघाट स्थित सांस्कृतिक संकुल में चलाने का निर्णय लिया था। लेकिन अब वहां भी सदन चलाने में दिक्कत आएगी।
वजह, मुख्यमंत्री के आदेश पर संकुल का रिडेवलपमेंट किया जाना है। इसके लिए वीडीए 47 करोड़ से अधिक रुपये का प्रस्ताव भी शासन को भेज चुका है। शासन से धन जारी होने के बाद संकुल के मरम्मत का काम शुरू हो गया तो सदन चलाने के लिए निगम प्रशासन को अब कहीं दूसरी जगह तलाश करनी पड़ेगी।