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वाराणसी: प्रो. कपिल बोले- विकास में सिर्फ भौतिक सुविधाएं नहीं, इंसानी चेतना और सामाजिक जिम्मेदारियां भी जरूरी

Sat, 31 Oct 2026 01:26 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।
अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी। Published by: Aman Vishwakarma Updated Sat, 31 Oct 2026 01:26 PM IST
सार

बीएचयू में अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'जेंडर इन फ्लक्स' का उद्घाटन हुआ। मुख्य अतिथि पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर ने कहा कि विकास का आकलन भौतिक सुविधाओं के बजाय मानवीय चेतना और सामाजिक जिम्मेदारियों से होना चाहिए। कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने स्थानीय स्तर पर मौलिक शोध को बढ़ावा देने पर जोर दिया।

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Varanasi Kapil stated development requires not physical amenities human consciousness social responsibilities
कार्यक्रम में शामिल अतिथि। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

विकास का आकलन केवल भौतिक सुख-सुविधाओं के आधार पर नहीं किया जाना चाहिए, बल्कि इसमें इंसानी चेतना, सामाजिक जिम्मेदारियों और भावी पीढ़ियों के हितों को भी शामिल करना जरूरी है। भारतीय सभ्यता में अस्तित्व की एकता और सभी जीवन रूपों की परस्पर निर्भरता विकास की महत्वपूर्ण अवधारणाएं हैं। ये बातें शिक्षाविद पद्मभूषण प्रो. कपिल कपूर ने कहीं। वह शनिवार को काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) में आयोजित अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी 'जेंडर इन फ्लक्स' के उद्घाटन सत्र को संबोधित कर रहे थे।

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मुख्य अतिथि प्रो. कपिल कपूर ने कहा कि समाज के किसी भी प्रश्न पर विचार करते समय उसके तात्कालिक प्रभावों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उसके भावी पीढ़ियों और सामाजिक संबंधों पर पड़ने वाले दूरगामी प्रभावों को भी समझना जरूरी है। विकास की अवधारणा व्यापक होनी चाहिए, जिसमें मानवीय मूल्यों और सामाजिक उत्तरदायित्व को पर्याप्त महत्व मिले।
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इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड स्टडी, शिमला के पूर्व चेयरपर्सन और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के पूर्व प्रो-वाइस चांसलर प्रो. कपूर ने भारतीय सभ्यता की समग्र दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि सभी जीवन रूप एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसलिए सामाजिक और विकास संबंधी विमर्श में इस परस्पर निर्भरता को समझना आवश्यक है।

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बदलते समाज का हो स्थानीय विश्लेषण
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने कहा कि शोधकर्ताओं को बदलते समाज का स्थानीय स्तर पर विश्लेषण करना चाहिए। स्थानीय परिस्थितियों और सामाजिक बदलावों को समझकर ऐसे मौलिक शोध, पुस्तकें और अध्ययन सामग्री विकसित करने की जरूरत है, जिन्हें वैश्विक स्तर पर पढ़ा जाए और उन पर चर्चा हो। उन्होंने शोध को समाज से जोड़ने और भारतीय संदर्भों को अकादमिक विमर्श में प्रमुखता देने पर जोर दिया।

वहीं, पद्मश्री से सम्मानित निवेदिता भिड़े ने याज्ञवल्क्य-मैत्रेयी संवाद और रामायण-महाभारत के स्त्री पात्रों का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज के ऐतिहासिक अनुभवों और सामाजिक संबंधों को केंद्र में रखकर विमर्श विकसित किया जाना चाहिए। इससे समाज में स्त्री की भूमिका और बदलते सामाजिक संदर्भों को बेहतर ढंग से समझा जा सकेगा।

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