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तप का अर्थ है इच्छाओं का निरोध करना, तप की महिमा अपरंपार
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दिगंबर जैन समाज की ओर से दशलक्षण महापर्व के सातवें दिन शनिवार को जैन मंदिरों में जिनेंद्र भगवान का अभिषेक व पूजन हुआ। रत्नत्रय व्रत पूजन के साथ अरिहंत परमेष्ठी, सिद्ध परमेष्ठी, आचार्य परमेष्ठी, उपाध्याय परमेष्ठी, साधु परमेष्ठी को मंगलाचरण के रूप में प्रणाम किया गया। शनिवार को पर्व के सातवें दिन शाम को फेसबुक पर लाइव व्याख्यान करते हुए पं. सिद्धांत शास्त्री सांगानेर ने उत्तम तप धर्म पर प्रवचन दिए।
उन्होंने कहा कि चारों गतियों में तपस्या सिर्फ मनुष्य गति में की जा सकती है। तप का अर्थ है इच्छाओं का निरोध करना, तप की महिमा अपरंपार है। मुक्ति जब भी मिलेगी तपस्या से ही मिलेगी। तप के पीछे जैनियों का रहस्य छुपा है। जो हमारे एक-एक विकारों को दूर कर दे वही है तपस्या। जैसे वृक्ष की शोभा पत्तों से नहीं फलों से होती है। मंदिर की शोभा पत्थरों से नहीं मूर्ति से होती है। मकान की शोभा दरवाजे से नहीं मनुष्य से होती है उसी प्रकार मनुष्य की शोभा शृंगार से नहीं तपस्या से होती है।
पं. शास्त्री ने कहा बिना लक्ष्य का तप भौतिक संपदा दे सकता है पर आत्मिक संपदा नहीं दे सकता। जिस प्रकार सोना खूब तपने के बाद ही खरा सोना बनता है उसी तरह हम अपने जीवन में श्रद्धा के साथ तप, ध्यान, मंत्र जप, सामयिक, प्रतिक्रमण, भावना, शास्त्र अध्ययन, भगवान का पूजन प्रक्षाल करते हुए दूसरों की सेवा दान इत्यादि तप कर अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर सकते हैं।
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उन्होंने कहा कि चारों गतियों में तपस्या सिर्फ मनुष्य गति में की जा सकती है। तप का अर्थ है इच्छाओं का निरोध करना, तप की महिमा अपरंपार है। मुक्ति जब भी मिलेगी तपस्या से ही मिलेगी। तप के पीछे जैनियों का रहस्य छुपा है। जो हमारे एक-एक विकारों को दूर कर दे वही है तपस्या। जैसे वृक्ष की शोभा पत्तों से नहीं फलों से होती है। मंदिर की शोभा पत्थरों से नहीं मूर्ति से होती है। मकान की शोभा दरवाजे से नहीं मनुष्य से होती है उसी प्रकार मनुष्य की शोभा शृंगार से नहीं तपस्या से होती है।
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पं. शास्त्री ने कहा बिना लक्ष्य का तप भौतिक संपदा दे सकता है पर आत्मिक संपदा नहीं दे सकता। जिस प्रकार सोना खूब तपने के बाद ही खरा सोना बनता है उसी तरह हम अपने जीवन में श्रद्धा के साथ तप, ध्यान, मंत्र जप, सामयिक, प्रतिक्रमण, भावना, शास्त्र अध्ययन, भगवान का पूजन प्रक्षाल करते हुए दूसरों की सेवा दान इत्यादि तप कर अपने जीवन की सार्थकता को सिद्ध कर सकते हैं।
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