तीन वर्षों में तेजी से बदला काशी के घाटों का स्वरूप, घाटों पर बने होटल जिम्मेदार
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इसके अलावा मोक्षदायिनी के तट पर खुले होटल, गेस्ट हाउसों ने घाट के वातावरण को भी बदल दिया है। घाटों के किनारे खुले होटल व रेस्टोरेंट में चल रही गतिविधियों से स्थानीय नागरिकों के साथ ही आने वाले श्रद्धालु भी परेशान हैं। गंगा तट पर रहने वाले नागरिकों को अपने जर्जर भवनों की मरम्मत की इजाजत नहीं है पर इन होटलों का दिन ब दिन विस्तार होता जा रहा है। हाल यह है कि इन होटलों को प्रशासनिक मान्यता भी मिल चुकी है।
मणिकर्णिका घाट हो, रामघाट हो, मेहता घाट, गणेश घाट, पंचगंगा घाट, आरपी घाट से सटे घाटों पर भी होटल एवं रेस्टोरेंट खुल गए हैं। हनुमान घाट, शिवाला, निर्वाणी घाट और राजा चेतसिंह घाट का भी यही हाल है।
घाटों की पड़ताल के दौरान पता चला कि इन घाटों की रंगत अब पूरी तरह से बदल चुकी है। घाट की सीढ़ियों पर कुर्सियां और टेबल लगे हुए हैं। चीनी, जापानी, व्यंजनों के साथ ही शराब और बीयर भी परोसी जाती है। शराब व बीयर की बोतले घाट के किनारें देखी जा सकती हैं। घाट के किनारे पड़े पुराने भवनों को होटल में तब्दील करने की तैयारियां चल रही हैं।
स्थानीय नागरिक संदीप पांडेय, नरेंद्र, गोविंद ने बताया कि घाट के किनारे कई भवन ऐसे पड़े हुए हैं जिन पर होटल संचालकों की नजरें गड़ी हुई हैं। शिवाला घाट पर तो शहर का सीवेज सीधे नाले से होकर गंगा में गिरता है।
नाले के पास घाट पर दो मिनट खड़ा होना भी बेहद मुश्किल है। हरिश्चंद्र घाट पर दाह संस्कार करने वाले इसी घाट के बगल में स्नान भी करते हैं और बगल में पशुपालक अपने जानवरों को भी नहलाते हैं।
इन होटलों व रेस्टोरेंट की गंदगी गंगा में ही जा रही है। उस तरफ प्रशासन का तनिक भी ध्यान नहीं। जलपुलिस भी इस पर ध्यान नहीं देती। उन्होंने बताया कि तीन वर्ष के भीतर घाटों का स्वरूप तेजी से बदला है। शाम के समय घाटों का नजारा ही कुछ अलग होता है।
गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है शिवाला घाट
घाट पर ही काशी नरेश द्वारा स्थापित ब्रहे्ंद्र मठ है, जिसमें दक्षिण भारतीय तीर्थ यात्रियों के निवास की व्यवस्था है। बीसवीं शताब्दी के मध्य तक सांस्कृतिक दृष्टि से यह घाट महत्वपूर्ण था। बुढ़वा मंगल मेला इसी घाट पर होता था। शिवाला घाट पर मुहर्रम की दसवीं तारीख को कुछ ताजियों को गंगा जी में बहाया जाता है। यह स्थान बनारस की गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल है।
केदार मठ के महंत स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि गंगा को अविरल किए बिना उसकी सफाई नहीं की जा सकती है। शिव की नगरी काशी में गंगा की दुर्दशा बेहद चिंतनीय है। सभी को इस बारे में विचार करना चाहिए।
आम जनता को गंगा की दुर्दशा को दूर करने के लिए आगे आना होगा। सरकार के प्रयास के बाद भी इस दिशा में सार्थक परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं। शहर की गंदगी, सीवेज और कूड़ा सीधे गंगा में गिराया जा रहा है। इसको सख्ती से रोक लगाने की जरूरत है।