यूपी: सांस्कृतिक राजधानी की पहचान है काशी की देव दीपावली, अहिल्याबाई होल्कर ने स्थापित किया था हजारा दीप
महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत हजारा दीपस्तंभ स्थापित किया था। यह हजारा दीप देव दीपावली की परंपरा का साक्षी है। काशी में देव दीपावली की शुरुआत भी यहीं से हुई थी।
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शरद पूर्णिमा से पूर्वजों के लोक को रोशन करने के लिए दीपदान की परंपरा कार्तिक पूर्णिमा पर देवाराधना का महापर्व बन जाती है। कार्तिक मास में बांस-बल्लियों के सहारे टिमटिमाते आकाशदीप कार्तिक पूर्णिमा पर गंगा के तट पर दैदीप्यामन होते हैं। गंगा के 84 घाटों पर सात किलोमीटर की शृंखला में दीप से दीप जल उठते हैं।
गंगा की धारा में दीपों की अलौकिक छटा निखर उठती है। शाम होते ही सभी घाट दीपों की रोशनी में नहा उठते हैं और ऐसे दृश्य को यादों में सहेजने के लिए घाटों पर देश ही नहीं विदेश से अतिथि आते हैं। कार्तिक पूर्णिमा की रात गंगा के अर्द्धचंद्राकार घाटों की छटा देवलोक का अहसास कराती है।
15 सालों में ही काशी की देव दीपावली देश की सांस्कृतिक राजधानी की एक अलग पहचान बन चुकी है। देव दीपावली पर श्रद्धालुओं की भीड़ ने इसको काशी का पांचवां लक्खा मेला बना दिया है।
शंकराचार्य की प्रेरणा से हुई थी शुरुआत
केंद्रीय देव दीपावली समिति के अध्यक्ष आचार्य वागीश दत्त मिश्र ने बताया कि दो दशकों से काशी की देव दीपावली ने महापर्व का स्वरूप ले लिया है। शंकराचार्य की प्रेरणा से प्रारंभ होने वाला यह दीपोत्सव पहले केवल पंचगंगा घाट की शोभा था। आगे चलकर काशी के सभी घाटों पर दीपों की शृंखला बढ़ती चली गई और 15 सालों में इसका स्वरूप आज भव्यतम हो चुका है।
अहिल्याबाई होल्कर ने स्थापित किया था हजारा दीप
पंचगंगा घाट का हजारा दीपस्तंभ देव दीपावली के दिन 1001 से अधिक दीपों की लौ से जगमगाता है। काशी की देव दीपावली प्राचीनता और परंपरा का अद्भुत संगम है। महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने पंचगंगा घाट पर पत्थरों से बना खूबसूरत हजारा दीपस्तंभ स्थापित किया था। यह हजारा दीप देव दीपावली की परंपरा का साक्षी है। काशी में देव दीपावली की शुरुआत भी यहीं से हुई थी।