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दुष्कर्म के प्रकरण में वाराणसी कोर्ट की सख्त टिप्पणी,  पूछा- क्या एसएसपी से बड़ा है दुष्कर्म का आरोपी इंस्पेक्टर 

Fri, 20 Nov 2020 02:41 PM IST
स्‍वाधीन तिवारी पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी
पुष्पेंद्र कुमार त्रिपाठी, अमर उजाला, वाराणसी Published by: स्‍वाधीन तिवारी Updated Fri, 20 Nov 2020 02:41 PM IST
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Varanasi court's strict comment in the rape case
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

वाराणसी में दुष्कर्म के एक मामले में बार-बार सम्मन जारी होने के बावजूद आरोपी इंस्पेक्टर अमित कुमार के पेश न होने पर अदालत ने सख्त रुख अख्तियार किया है। अदालत ने पूछा है कि क्या एसएसपी से ज्यादा बड़े पद वाला दुष्कर्म सहित अन्य आरोपों का आरोपी इंस्पेक्टर अमित कुमार है।

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अदालत ने नाराजगी जाहिर करते हुए एसएसपी को पत्र लिखा है कि बार-बार सम्मन जारी होने के बाद भी उसे तामील क्यों नहीं कराया जा सका। इसके साथ ही इंस्पेक्टर अमित के खिलाफ 10 हजार का जमानती वारंट जारी कर अदालत ने मुकदमे की सुनवाई की अगली तिथि 30 नवंबर को नियत की है।
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दरअसल, मथुरा से आई एक युवती की तहरीर के आधार पर 8 जनवरी 2020 की देर रात तत्कालीन एसएसपी वाराणसी प्रभाकर चौधरी के आदेश से महिला थाने में क्राइम ब्रांच के तत्कालीन इंस्पेक्टर अमित कुमार के खिलाफ दुष्कर्म सहित अन्य आरोपों में मुकदमा दर्ज किया गया था।
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पीड़िता के अधिवक्ता सेंट्रल बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष विवेक शंकर तिवारी ने बताया कि अदालत से बार-बार सम्मन जारी होने के बावजूद भी पुलिस लाइन में ही नियुक्त इंस्पेक्टर अमित कुमार को उसे तामील न करा पाना हास्यास्पद है। पुलिस की लापरवाही को देखते हुए अदालत ने सख्त रुख अख्तियार करते हुए एसएसपी को पत्र लिखा है। इसके साथ ही आरोपी इंस्पेक्टर अमित के खिलाफ 10 हजार का जमानती वारंट जारी किया है।
 

प्रतिसार निरीक्षक ने कहा - गणना में आता है, सम्मन नहीं लेता
पीड़िता के अधिवक्ता विवेक शंकर तिवारी ने बताया कि पुलिस लाइन के प्रतिसार निरीक्षक की ओर से इंस्पेक्टर अमित के संबंध में रिपोर्ट दी गई है। रिपोर्ट के अनुसार इंस्पेक्टर अमित रोजाना गणना में आता है, लेकिन जब सम्मन के बारे में बताया जाता है तो वह उसे नहीं लेता है।

इसी वजह से सम्मन का तामीला नहीं कराया जा सका। अधिवक्ता ने कहा कि इस रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि प्रतिसार निरीक्षक पुलिस लाइन में सही तरीके से अपने दायित्वों का निर्वहन नहीं कर पा रहे हैं या फिर वह न्यायालय के आदेश को गंभीरता से नहीं ले रहे हैं।

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