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काशी की हास्य व्यंग्य परंपरा के शीर्षस्थ कवि थे भैयाजी
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वाराणसी। काशी की हास्य व्यंग्य परंपरा के शीर्षस्थ कवि मोहनलाल गुप्ता उर्फ भैयाजी बनारसी की 106वीं जयंती पर काशी उन्हें नमन करेगी। साहित्यकार डॉ. रामसुधार सिंह ने कहा कि बनारस के रचनाकारों की जिस पीढ़ी का प्रतिनिधित्व भैयाजी कर रहे थे, वह अपनों से ज्यादा दूसरों के लिए चिंतित और समर्पित पीढ़ी थी। यह कहना है का।
उन्होंने कहा कि भारतीय मनीषियों की सोच और आमजन के संघर्षों से जूझने की शक्ति के कारण ही भारत में महामारी की स्थिति नियंत्रण में हैं। 11 मई को भैयाजी की 106वीं जयंती पर यह देखना होगा है कि भैयाजी बनारसी ने इस जीवन को किस रूप में देखा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब पूरा विश्व निराशा के गहन अंधकार में घिर गया था तो हिंदी के प्रत्येक छायावादी कवि ने गौतम बुद्ध को याद किया और उनके संबंध में कविताएं लिखीं। लेकिन काशी के कवियों ने धारा से अलग हटकर जीवन को हास्य एवं व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया। भैयाजी बनारसी जिंदगी को आलू, चाट और कचालू से उपमित करते हैं, ‘जिंदगी रेत और बालू है, जिंदगी भुना हुआ आलू है। भैया जी मुस्कुराके कहते हैं जिंदगी चाट है कचालू है।’ उन्होंने हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में बेढब और बेधड़क की परंपरा को आगे बढ़ाया। पद्य की तरह उनका गद्य भी सटीक, सधा हुआ और चोट करने वाला होता था। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें बच्चों की सरकार, हाथी घोड़ा पालकी, देश हमारा, आजारी निंदिया प्रमुख हैं। उनकी जयंती पर साहित्यकार समाज उन्हें नमन करता है।
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उन्होंने कहा कि भारतीय मनीषियों की सोच और आमजन के संघर्षों से जूझने की शक्ति के कारण ही भारत में महामारी की स्थिति नियंत्रण में हैं। 11 मई को भैयाजी की 106वीं जयंती पर यह देखना होगा है कि भैयाजी बनारसी ने इस जीवन को किस रूप में देखा है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद जब पूरा विश्व निराशा के गहन अंधकार में घिर गया था तो हिंदी के प्रत्येक छायावादी कवि ने गौतम बुद्ध को याद किया और उनके संबंध में कविताएं लिखीं। लेकिन काशी के कवियों ने धारा से अलग हटकर जीवन को हास्य एवं व्यंग्य के माध्यम से व्यक्त किया। भैयाजी बनारसी जिंदगी को आलू, चाट और कचालू से उपमित करते हैं, ‘जिंदगी रेत और बालू है, जिंदगी भुना हुआ आलू है। भैया जी मुस्कुराके कहते हैं जिंदगी चाट है कचालू है।’ उन्होंने हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में बेढब और बेधड़क की परंपरा को आगे बढ़ाया। पद्य की तरह उनका गद्य भी सटीक, सधा हुआ और चोट करने वाला होता था। उन्होंने कई पुस्तकें लिखीं, जिनमें बच्चों की सरकार, हाथी घोड़ा पालकी, देश हमारा, आजारी निंदिया प्रमुख हैं। उनकी जयंती पर साहित्यकार समाज उन्हें नमन करता है।
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