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उस्ताद बिस्मिल्लाह खां की जयंती पर विशेष: अल्लाह की इबादत और सरस्वती वंदना का जरिया थी शहनाई

Mon, 21 Mar 2022 10:08 AM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Mon, 21 Mar 2022 10:08 AM IST
सार

भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। बिस्मिल्लाह खां ने अपने लिए वह मुकाम बनाया है कि जब-जब शहनाई का नाम लिया जाता है उनका नाम सबसे पहले आता है। एक तरह से शहनाई और बिस्मिल्लाह एक दूसरे के पर्याय हैं।

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Ustad Bismillah Khan Jaynti Special story Shehnai was  means of worshiping Allah and worshiping Saraswati
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

धर्म की सीमाओं से परे भारतरत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां मां सरस्वती के अनन्य भक्त थे। वह अक्सर मंदिरों में शहनाई बजाया करते थे। शहनाई उनके लिए अल्लाह की इबादत और सरस्वती वंदना का जरिया थी। संगीत के माध्यम से उन्होंने एकता, शांति और प्रेम का संदेश दिया था। दालमंडी के हड़हा सराय के मकान की सबसे ऊपरी मंजिल की खिड़की जब भी खुलती थी तो शहनाई के सुरों से देवत्व का साक्षात्कार कराती थी। 

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उस्ताद का जन्म 21 मार्च 1916 को बिहार के डुमरांव में हुआ था। भारत रत्न उस्ताद बिस्मिल्लाह खां जब तक रहे बाबा विश्वनाथ को शहनाई बजाकर जगाया करते थे। उस्ताद के कमरे की खिड़की तो अभी खुलती है, लेकिन बिस्मिल्लाह की शहनाई अब नहीं गूंजती है।
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शहनाई से टपकता था बनारस का रस
उस्ताद की दत्तक पुत्री पद्मश्री डॉ. सोमा घोष का कहना है कि बाबा मंगलागौरी और पक्का महाल में रियाज करते हुए जवान हुए। इसी का असर था कि बनारस का रस उनकी शहनाई से टपकता था। 
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साहित्य नाटक अकादमी के अध्यक्ष पद्मश्री डॉ. राजेश्वर आचार्य का कहना है कि भारत की आजादी और बिस्मिल्लाह खां की शहनाई का भी खास रिश्ता रहा है।

1947 में आजादी की पूर्व संध्या पर जब लालकिले पर देश का झंडा फहराया गया तो उनकी शहनाई ने भी वहां आजादी का संदेश बांटा था। अपने जीवन काल में उन्होंने ईरान, इराक, अफगानिस्तान, जापान, अमेरिका, कनाडा और रूस में अपनी शहनाई की जादुई धुनें बिखेरीं। उन्होंने गूंज उठी शहनाई, सत्यजीत रे की फिल्म जलसाघर में संगीत दिया। अखिरी बार उन्होंने आशुतोष गोवारिकर की हिंदी फिल्म स्वदेश में शहनाई का जादू चलाया था।

नाते-रिश्तेदारों को है सरकारी मदद की दरकार

भारत रत्न के पोते आफाक अहमद ने बताया कि दादा के जाने के बाद से न तो अधिकारी आते हैं और न ही उनके चाहने वाले। परिवार के पास शहनाई के अलावा और कोई दूसरा हुनर नहीं है। हम लोग आज भी शहनाई वादन के जरिए ही परिवार का गुजारा कर रहे हैं। उस्ताद का पूरा कुनबा हड़हा सराय के मकान में ही रहता है। कुछ लोग बाहर चले गए हैं तो कुछ ने दूसरी जगह अपने आवास बना लिए हैं। 

चार किमी पैदल ही चलकर पहुंचे थे शहनाई बजाने

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बिस्मिल्लाह खां - फोटो : SELF

पद्मविभूषण पं. छन्नू लाल मिश्र एक बार का वाकया बताते हैं कि राय कृष्ण दास के बगीचे में रामचरित मानस का पाठ रखा गया था। पं. बैजनाथ ने उस्ताद से कहा कि अंतिम दिन शहनाई बजा देता त मजा आ जात...। बिस्मिल्लाह ने कहा बिल्कुल आएंगे। बैजनाथ ने कहा कि गाड़ी भेज दें तो बिस्मिल्लाह का जवाब था भगवान के काम में कैसी गाड़ी, फिर समापन के दिन हड़हा सराय से पैदल ही चार किलोमीटर दूर बागीचे में पहुंच गए। तबले पर संगत के लिए पं. किशन महाराज थे। 

वो मंजर हमें यहां कहां से मिलेगा...

शिया जामा मस्जिद के हाजी फरमान हैदर ने बताया कि एक बार अमेरिकी राष्ट्रपति ने अमेरिका में बस जाने का न्योता दिया। 1955 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने उनकी शहनाई सुनी तो उन्हें लंच पर आमंत्रित किया। अमेरिकी राष्ट्रपति ने पूछा आपके घर में कितने लोग हैं।

उस्ताद ने कहा कि 54 लोग। राष्ट्रपति ने कहा कि खाने पर कितना खर्च आता है। उस्ताद ने पूछा कि यह क्यों पूछ रहे हैं तो राष्ट्रपति ने कहा कि जितना भी खर्च आता है उसका दोगुना देंगे। तनख्वाह देंगे। घर देंगे अमेरिका बस जाओ। बिस्मिल्लाह ने जवाब दिया साहेब बस तो जाएं, लेकिन सुबह-सुबह जब हम घर से निकलते हैं और दोनों तरफ  लोग खड़ा होकर आदाब-आदाब करते हैं वो मंजर हमें यहां कहां से मिलेगा।

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