उम्मीद की मशाल: अधूरी पढ़ाई के मलाल ने थमा दी शिक्षा की लालटेन, स्नातक के बाद गरीब बच्चों का बन गए सहारा
गांव उगापुर (पांडापुर) के रहने वाले मनोज यादव ने 2013 में बीएचयू से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। स्नातक के बाद जब खुद की पढ़ाई अधूरी रह गई तो इस मलाल ने उनको एक नई राह दे दी। खुद आगे नहीं पढ़ सके तो गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का अभियान शुरू कर दिया।
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अपने लिए जिये तो क्या जिए, तू जी ऐ दिल जमाने के लिए...। जी हां कुछ ऐसी ही राह मनोज की है। स्नातक के बाद जब खुद की पढ़ाई अधूरी रह गई तो इस मलाल ने उनको एक नई राह दे दी। खुद आगे नहीं पढ़ सके तो गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने का अभियान शुरू कर दिया। आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों को निशुल्क शिक्षा से जोड़ने की छोटी सी पहल अब व्यापक हो चुकी है। पांच वर्षों से जारी अभियान में मनोज एक हजार से ज्यादा बच्चों को शिक्षित कर चुके हैं।
चौबेपुर थाना क्षेत्र के गांव उगापुर (पांडापुर) के रहने वाले मनोज यादव ने 2013 में बीएचयू से स्नातक की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई के दौरान मां प्रभावती देवी गांव के ही प्राथमिक विद्यालय में रसोइया थीं। इससे किसी तरह घर का खर्चा चल रहा था। उसी में से कुछ पैसे बेटे को पढ़ाई के लिए भेजती थीं।
विवाह के बाद पत्नी ने भी अभियान में दिया साथ
मनोज ने भी बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर मुश्किल से बीएचयू की फीस और पढ़ाई पूरी की, इसके बाद पैसों के अभाव में आगे की पढ़ाई नहीं कर सके। मनोज ने तभी गरीब बच्चों को निशुल्क शिक्षा देने की ठानी, हालांकि इसमें किसी का सहयोग नहीं मिला। इसके बावजूद यह अभियान निरंतर जारी रखा।
2015 में विवाह के बाद इस अभियान में पत्नी अनीता ने भी सहयोग किया। इसके बाद मनोज ने 2017 से अभियान को धार देनी शुरू की। अभियान के तहत दोना पत्तल बनाने वाले परिवार के बच्चों, घुमंतू परिवार के बच्चों और मलिन बस्तियों में रहने वाले बच्चों को उनके पास जाकर निशुल्क शिक्षा देने लगे। इनमें से कई बच्चे हाईस्कूल और इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण भी कर चुके हैं।
शिक्षित करने की मुहिम में नहीं मिला किसी का साथ
मनोज ने बताया कि घर में पांच सदस्य हैं, माता-पिता, मैं, पत्नी और डेढ़ साल का बच्चा, थोड़ी बहुत खेतीबाड़ी और छोटी सी दुकान है। जैसे तैसे स्नातक की पढ़ाई पूरी की। आईएएस बनाने की इच्छा थी, लेकिन आर्थिक स्थति और परिवार की समस्याओं ने राहें रोक दीं। मैने ठाना कि जिस गरीबी की मार हमें झेलनी पड़ी वह किसी और गरीब बच्चे को न झेलनी पड़े। कोई कभी-कभी 500 या 1000 की मदद दे देता तो कोई कॉपी और पेन देकर सहयोग कर देता है। दस किलोमीटर के दायरे में पड़ने वाली हर मलिन बस्ती में जा-जाकर मैं बच्चों को शिक्षित कर रहा हूं।
यू-ट्यूब पर भी चलाते हैं ऑनलाइन कक्षा
मनोज गरीब बच्चों को मलीन बस्तियों और झुग्गी झोपड़ियों में जाकर पढ़ाने के साथ यू-ट्यूब पर भी सक्रिय हैं। मनोज ने बताया यू-ट्यूब पर एक चैनल ‘मनोज यादव सोशल वर्कर’ बनाया है। इसके माध्यम से भी कक्षाएं संचालित करता हूं। ताकि मेरे वीडियो से लोग गरीब बच्चों के शिक्षा के लिए संपर्क कर सकें और चैनल से जुड़कर शिक्षा की इस मुहिम में सहभागी बन सके।