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उम्मीदों की मशाल: अशिक्षा की कोठरी में जला रहीं शिक्षा की लौ, आर्थिक रूप से कमजोर बच्चों के लिए पहल

Mon, 09 Jan 2023 01:43 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Mon, 09 Jan 2023 01:43 PM IST
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Ummid ki mashal Flame of education burning in illiteracy closet, initiative for economically weak children
बच्चों को पढ़ातीं भावना अग्रवाल - फोटो : अमर उजाला

अक्सर छोटी-छोटी आंखों के बड़े-बड़े सपने हकीकत में नहीं बदल पाते। कोई क्लेक्टर बनाना चाहता है तो कोई डॉक्टर, कोई बड़ा होकर अधिकारी तो कोई टीचर, ताकि वे बड़े होकर देश की सेवा कर सकें। बहुत सी ऐसी ख्वाहिशें आर्थिक तंगी के कारण अधूरी रह जातीं हैं। लेकिन काशी में ऐसे ही छोटे-छोटे बच्चों की हसरत पूरा करने में निस्वार्थ भाव से एक महिला जुटी है। कबीर नगर में रहने वाली भावना अग्रवाल बच्चों को शिक्षित कर रहीं हैं।

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पढ़ाई से नहीं था नाता, अब उठी लीं किताबें
भावना बताती हैं, घर के पास नगर निगम का पार्क है, वहां बच्चे झगड़ा व गाली गलौच करते रहते थे। मैंने इन बच्चों को पहले समझाया, फिर धीरे-धीरे बच्चों में सुधार आने लगा। इसके बाद मैंने बच्चों को पार्क में बिठाकर पढ़ाना शुरू किया, इससे उनके मन में पढ़ाई के प्रति लगन पैदा हुई। पहले दो बच्चे, फिर चार और अब मेरे पास 50 से ज्यादा बच्चे हैं। कई बच्चे तो ऐसे हैं, जो प्राथमिक पाठशाला में जाते तो हैं, लेकिन उन्हें नाम और मात्रा तक नहीं आती थी। आज वो बच्चे किताबें लेकर खुद पढ़ रहे हैं।
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हुनर से जिंदगी संवारने का काम
छह महीने पहले शुरू हुई इस पाठशाला में बेटियों की संख्या ज्यादा है। ऐसे में भावना ने सोचा क्यों न इन बेटियों को शिक्षा के साथ रोजगार से जोड़ा जाए। इसके लिए उन्होंने बेटियों को किताबी ज्ञान के साथ मेहंदी का प्रशिक्षण भी देना शुरू किया। ताकि ये किशोरियां अपने हुनर से जिंदगी संवार सकें।

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कम पड़ जाती है जगह

Ummid ki mashal Flame of education burning in illiteracy closet, initiative for economically weak children
बच्चों को पढ़ातीं भावना अग्रवाल - फोटो : अमर उजाला

रक्तदान कर कई लोगों की जिंदगी में उजाला ला चुकीं भावना बताती हैं कि जब इस पाठशाला की शुरुआत की थी तो मेरे पास बहुत कम बच्चे थे। लेकिन आज ये कारवां इतना बढ़ गया है कि घर में बच्चों को बैठाकर पढ़ाने के लिए जगह कम पड़ जाती है। कई बार आर्थिक समस्याओं से जूझते इस तरह के बच्चे अपनी पारिवारिक स्थिति से जीत नहीं पाते और पढ़ाई छोड़कर काम करने लगते हैं। मेरी कोशिश है कि इन बच्चों को शिक्षित कर उनका भविष्य संवार सकूं।

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