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कूड़े का ढेर बन गया तुलसीदास का बनवाया कुंड
ब्यूरो/अमर उजाला, वाराणसी
Updated Wed, 22 Jun 2016 01:39 AM IST
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कूड़े का ढेर बन गया तुलसीदास का बनवाया कुंड
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प्राचीन हनुमान कुंड विलुप्त होने के कगार पर है। कभी इस कुंड में काशीवासी ही नहीं, देश भर से आने वाले श्रद्धालु डुबकी लगाते थे। मुक्ति के लिए वहां वट की छांव में भजन और दक्षिणामुखी बड़े हनुमान के दर्शन के लिए भक्तों की भीड़ लगती थी, लेकिन अब गंदगी का साम्राज्य फैला है। कुंड में नहाना तो दूर, अब इसके जल को कोई स्पर्श तक नहीं करता। इस कुंड की स्थापना कभी गोस्वामी तुलसीदास ने कराई थी।
जिवधीपुर (बजरडीहा) में 15वीं शताब्दी में संत तुलसी दास ने पहला हनुमान मंदिर इसी जगह स्थापित किया था। दक्षिणाभिमुखी बड़े हनुमान मंदिर परिसर में ही हनुमान कुंड की खुदाई कराई गई। असि नदी के बेसिन में स्थित इस विशाल कुंड की सुरक्षा दीवार और सीढ़ियां अब भी सलामत हैं।
यहां के रहने वाले ललित मिस्त्री बताते हैं कि बचपन में वह इस कुंड में स्नान कर चुके हैं। तब इलाके के लोग इसी कुंड में डुबकी लगाकर बड़े हनुमान का दर्शन करते थे। मंदिर परिसर में कुंड के तट पर ही व्यायामशाला भी है। इस व्यायामशाला में अब भी 50 से अधिक युवा नियमित रियाज करते हैं। राजकुमार प्रजापति, जगन्नाथ ओझा बताते हैं कि कभी इस कुंड में व्याधियों से मुक्ति के लिए लोग स्नान करने के लिए आते थे।
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बाद में उपेक्षा के चलते लोग इस कुंड के भीटे पर कब्जा कर मकान बनाने लगे। नगर निगम के कर्मचारी तो बजरडीहा इलाके का कूड़ा इसी कुंड परिसर में गिरा रहे हैं। इसके अलावा आसपास के घरों की सीवर लाइन भी इसी कुंड से जोड़ दी गई है। लोगों का कहना है कि प्रशासन इसी तरह उदासीन बना रहा तो आने वाले वर्षों में यह कुंड भी अपना अस्तित्व खो देगा।
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जिवधीपुर (बजरडीहा) में 15वीं शताब्दी में संत तुलसी दास ने पहला हनुमान मंदिर इसी जगह स्थापित किया था। दक्षिणाभिमुखी बड़े हनुमान मंदिर परिसर में ही हनुमान कुंड की खुदाई कराई गई। असि नदी के बेसिन में स्थित इस विशाल कुंड की सुरक्षा दीवार और सीढ़ियां अब भी सलामत हैं।
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यहां के रहने वाले ललित मिस्त्री बताते हैं कि बचपन में वह इस कुंड में स्नान कर चुके हैं। तब इलाके के लोग इसी कुंड में डुबकी लगाकर बड़े हनुमान का दर्शन करते थे। मंदिर परिसर में कुंड के तट पर ही व्यायामशाला भी है। इस व्यायामशाला में अब भी 50 से अधिक युवा नियमित रियाज करते हैं। राजकुमार प्रजापति, जगन्नाथ ओझा बताते हैं कि कभी इस कुंड में व्याधियों से मुक्ति के लिए लोग स्नान करने के लिए आते थे।
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बाद में उपेक्षा के चलते लोग इस कुंड के भीटे पर कब्जा कर मकान बनाने लगे। नगर निगम के कर्मचारी तो बजरडीहा इलाके का कूड़ा इसी कुंड परिसर में गिरा रहे हैं। इसके अलावा आसपास के घरों की सीवर लाइन भी इसी कुंड से जोड़ दी गई है। लोगों का कहना है कि प्रशासन इसी तरह उदासीन बना रहा तो आने वाले वर्षों में यह कुंड भी अपना अस्तित्व खो देगा।