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पंजाब के कुएं में मिले कंकालों पर बड़ा खुलासा: गंगा घाटी के रहने वाले थे 1857 की क्रांति के गुमनाम शहीद

Thu, 28 Apr 2022 06:29 PM IST
उत्पल कांत न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, वाराणसी Published by: उत्पल कांत Updated Thu, 28 Apr 2022 06:29 PM IST
सार

वैज्ञानिकों की दो अलग अलग टीम ने डीएनए और आइसोटोप एनालिसिस किया और निष्कर्ष निकाला की शहीद लोग गंगा घाटी क्षेत्र के रहने वाले थे।

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Truth Revealed in DNA test that skeleton of martyrs found from well in Punjab was  Ganges valley war revolution of 1857
पंजाब के अजनाला कस्बे के एक पुराने कुएं से मिले थे कंकाल - फोटो : सोशल मीडिया।

विस्तार

ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भारतीय लोगों के साथ अनगिनत बर्बरताएं हुईं। अतीत में झांककर देखें तो उस दौर में क्रूरता का एक नया अध्याय सामने आता है। पंजाब के अजनाला कस्बे के गुरुद्वारे में स्थित कुएं में 2014 में 282 नरकंकाल मिले थे। पहले इन्हें 1947 में विभाजन के दौरान हुए दंगों से जोड़कर देखा जा रहा था। लेकिन, बृहस्पतिवार को फ्रंटियर्स इन जेनेटिक्स जर्नल में प्रकाशित शोध में इस बात की पुष्टि की गई कि ये कंकाल असल में 1857 की क्रांति से जुड़े सैनिकों के हैं, जिनकी हत्या अंग्रेजों ने की थी। 

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बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के जंतु विज्ञान विभाग के प्रोफेसर ज्ञानेश्वर चौबे कहते हैं कि भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों के इतिहास में यह एक महत्वपूर्ण अध्याय है। डीएनए का अध्ययन करने वाली टीम के अहम सदस्य प्रो. चौबे ने कहा, यह अध्ययन दो बातों की पुष्टि करता है। पहली, कुएं से जो कंकाल मिले हैं वे 1857 की क्रांति के दौरान शहीद हुए सैनिकों के हैं। दूसरी बात यह कि कंकाल पंजाब से नहीं, बल्कि गंगा के मैदान से संबंध रखते हैं। 
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अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता और प्राचीन डीएनए के विशेषज्ञ नीरज राय के मुताबिक, वैज्ञानिक शोध इतिहास को अधिक साक्ष्य-आधारित तरीके से देखने में मदद करते हैं। शुरुआत में कंकालों को लेकर विवाद था, कुछ इतिहासकार इन्हें भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान मारे गए लोगों के बता रहे थे।

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डीएनए के 50 सैंपल, आइसोटोप एनालिसिस के 85 सैंपल पर अध्ययन

1857 की क्रांति से जोड़कर देखने वालों के भी दो धड़े थे। एक धड़ा मानता था कि कंकाल पंजाबी सैनिकों के हैं। दूसरा धड़ा उन्हें मियां मीर छावनी लाहौर में तैनात 26वीं देशी पैदल सेना रेजिमेंट के सैनिक मानता था। पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ के एक मानवविज्ञानी डॉ. जेएस सहरावत ने बताया कि सैनिक कहां के थे, यह जानने के लिए स्टेबल आइसोटोप तकनीक से 85 नमूनों का विश्लेषण किया गया।

इसके अलावा 50 नमूनों का डीएनए विश्लेषण भी किया गया। विभिन्न एतिहासिक, फोरेंसिक व अन्य वैज्ञानिक सबूतों के आधार पर सहरावत ने दावा किया है कि कुए से मिले कंकाल गंगा के मैदानी इलाकों के रहने वाले सैनिकों के हैं। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश, बिहार, दिल्ली, बंगाल व ओडिशा के निवासी थे।

शोधदल से जुड़े सीसीएमबी हैदराबाद के निदेशक वैज्ञानिक डॉ. के थंगराज ने बताते हैं कि डीएनए विश्लेषण लोगों के वंश को समझने में मदद करता है, और आइसोटोप विश्लेषण भोजन की आदतों पर प्रकाश डालता है। दोनों शोध इस बात का समर्थन करते हैं कि कुएं में मिले मानव कंकाल पंजाब या पाकिस्तान में रहने वाले लोगों के नहीं थे। बल्कि, डीएनए अनुक्रम यूपी, बिहार और पश्चिम बंगाल के लोगों के साथ मेल खाते हैं, क्योंकि ज्यादातर लोग शाकाहारी थे।

ब्रिटिश अधिकारी की किताब से मिले सुबूत

1857 के दौरान पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर ने अपनी किताब द क्राइसिस ऑफ पंजाब 1857 में पंजाब में हुए नरसंहार के बारे में लिखा भी है कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था, क्योंकि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी। काफी प्रयास के बाद 2014 में यह कुआं मिला था। 
 
शोध प्रकाशन रोकने की हुई कोशिश
शोध टीम के सदस्य बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने बताया कि आम तौर पर कोई शोध पत्र छपने के पहले उसका रिव्यू किया जाता है। इसमें कम से कम एक एडिटर और दो विशेषज्ञ होते हैं। यह शोध पत्र जब प्रकाशित होने के लिए गया तो एडिटर अंग्रेजी मूल के थे और उन्होंने इसे रोकने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हो पाए। ऐसा इसलिए कि दोनों विशेषज्ञों ने इसे अच्छी स्टडी बताने के साथ ही यह भी कहा कि शोध सभी मानको को पूरा करती है। 

गुमनाम नायकों के इतिहास में जुड़ेगा प्रमुख अध्याय

प्रो. चौबे ने बताया कि इस अध्ययन के निष्कर्ष भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम के गुमनाम नायकों के इतिहास में एक प्रमुख अध्याय जोड़ देंगे। यह अध्ययन दो बातों की पुष्टि करता है। पहली, कुएं से जो कंकाल मिले हैं, वे 1857 की क्रांति के दौरान शहीद हुए सैनिकों के हैं। दूसरी बात यह कि कंकाल पंजाब से नहीं, बल्कि गंगा के मैदान से संबंध रखते हैं। टीम के प्रमुख शोधकर्ता और प्राचीन डीएनए के एक्सपर्ट डॉ. नीरज राय ने कहा कि टीम द्वारा किया गया वैज्ञानिक शोध इतिहास को साक्ष्य-आधारित तरीके स्थापित करने में मदद करता है।

ऐसे शुरू हुई अजनाला में मिले सैनिकों के अवशेषों की जांच

1857 में पंजाब के अमृतसर में तैनात रहे ब्रिटिश कमिश्नर फेडरिक हेनरी कूपर ने अपनी किताब द क्राइसिस ऑफ पंजाब में 1857 में पंजाब में हुए इस नरसंहार का वर्णन किया है। पंजाब की एक शोधार्थी जब इंग्लैंड गईं तो उन्होंने इस किताब को पढ़ा। पुस्तक में कई चौंकाने वाली बातें लिखी थीं। लिखा था कि अमृतसर के अजनाला गांव के एक गुरुद्वारे के नीचे कुआं है, जिसमें 282 सैनिकों को 1857 में मारकर फेंका गया था।

साथ ही लिखा था कि इन सैनिकों ने अंग्रेजों से गद्दारी की थी, लेकिन यह असली देशभक्त थे जो अंग्रेजों के छक्के छुड़ा रहे थे। इस कुएं को काफी प्रयास के बाद खोजा गया और तमाम सैनिकों के अवशेष मिले। इनकी जांच पंजाब विश्वविद्यालय के एन्थ्रोपोलाजिस्ट डॉ. जेएस सेहरावत को सौंपी गई।

वर्ष 2014 से वह लगातार इन अवशेषों पर जांच कर रहे हैं और चौंकाने वाले खुलासे कर रहे हैं। इन सैनिकों की पहचान करके उनके परिजनों को अवशेष देना उनका उद्देश्य है, ताकि उनका अंतिम संस्कार किया जा सके। डॉ. जेएस सेहरावत ने इन कंकालों का डीएनए और आइसोटोप अध्ययन, सीसीएमबी हैदराबाद, बीरबल साहनी इंस्टीट्यूट लखनऊ और बीएचयू जंतु विज्ञान विभाग के प्रो.ज्ञानेश्वर चौबे के साथ ही मिलकर किया।

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