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मंदिरों में बदलेगी प्रसाद की व्यवस्था: तिरुपति प्रकरण से सबक, अब पंचमेवा, फल, बताशा और रामदाना का होगा प्रसाद

Tue, 24 Sep 2024 09:02 AM IST
प्रगति चंद आलोक कुमार त्रिपाठी, वाराणसी।
आलोक कुमार त्रिपाठी, वाराणसी। Published by: प्रगति चंद Updated Tue, 24 Sep 2024 09:02 AM IST
सार

तिरुपति बालाजी के प्रसाद में चर्बी मिलने की रिपोर्ट सामने आने के बाद अब देश भर के मंदिरों में प्रसाद का स्वरूप बदलने की तैयारी है। काशी विद्वत परिषद ने इसके लिए खाका तैयार किया है। 

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Tirupati Balaji Prasad incident big change in arrangement of Prasad in temples
देश भर के मंदिरों में बदलेगा प्रसाद का स्वरूप - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

तिरुपति बालाजी मंदिर की घटना के बाद अब देश भर के मंदिरों में प्रसाद की व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी है। श्री काशी विद्वत परिषद सनातनी हिंदुओं की आस्था के अनुसार ही प्रसाद चढ़ाने और ग्रहण करने की व्यवस्था करने की तैयारी में है। अखाड़ा परिषद, अखिल भारतीय संत समिति और सरकार के सहयोग से प्रसाद की नई व्यवस्था लागू की जाएगी। अब मंदिरों में पंचमेवा, फल, बताशा और रामदाना के प्रसाद चढ़ाने की व्यवस्था की जाएगी।

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द्वादश ज्योर्तिलिंग, देवी मंदिरों और देश भर के सभी छोटे-बड़े देवालयों में प्रसाद अर्पण करने में बड़ा बदलाव होगा। भगवान को शुद्ध और सात्विक प्रसाद अर्पण हो, इसके लिए काशी विद्वत परिषद ने सनातनी परंपरा और पुराणों के अनुसार भगवान को सात्विक भोग चढ़ाने का खाका तैयार किया है। इसके तहत अब मंदिरों में भगवान को पंचमेवा, फल, बताशा और रामदाना चढ़ाने की पुरानी व्यवस्था को लागू किया जाएगा। इसमें न तो किसी तरह की मिलावट की आशंका रहेगी और न ही किसी तरह की गड़बड़ी हो सकेगी।
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काशी विद्वत परिषद के महामंत्री प्रो. रामनारायण द्विवेदी ने बताया कि तिरुपति बालाजी में जो हुआ उससे 30 करोड़ से अधिक हिंदुओं की धार्मिक भावना आहत हुई है। इसे देखते हुए ही मंदिरों की प्रसाद व्यवस्था में बदलाव की जरूरत है। अखाड़ा परिषद, संत समिति और देश भर के धर्माचार्यों से इसके लिए संपर्क किया जा रहा है। जल्द ही देश भर के संतों के साथ बैठक होगी और कार्ययोजना पर सरकार से समन्वय स्थापित कर इसे देशभर के देवालयों में लागू कराया जाएगा।

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परमात्मा का आशीर्वाद मानकर ग्रहण किया जाता है प्रसाद

सात्विक पुरुष, संत और साधक जो आहार ग्रहण करते हैं, उसी तरह का पवित्र प्रसाद अपने परमात्मा को भी अर्पित किया जाता है। इसमें शुचिता और पवित्रता का ध्यान रखा जाता है। प्रसाद चढ़ाने के बाद इसे परमात्मा का आशीर्वाद मानकर ग्रहण किया जाता है। हर सनातनी के घर में यह परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। अपने भोजन के पहले परमात्मा को प्रसाद ग्रहण कराने की परंपरा रही है। इसके अलावा एक रोटी गोमाता को और अंतिम रोटी श्वान को निकलती थी। बड़े देवालयों में भी यही परंपरा बड़े स्तर पर निभाई जाती है और प्रसाद भक्तों में वितरित होता है।



प्रसाद की शुचिता की जिम्मेदारी नागरिकों की
प्रो. द्विवेदी ने बताया कि भगवान का प्रसाद ग्रहण करने से मन में प्रसन्नता और आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार होता है। अच्छी बुद्धि का निर्माण होता है। अद्वैत दर्शन में पंचमय कोश की परिकल्पना है और इसमें अन्नमय कोश का वर्णन है। भारत की आध्यात्मिक ऊर्जा के केंद्र हैं मंदिर हैं। आध्यात्मिक ऊर्जा, शक्ति और चेतना के संचार के लिए मंदिरों के भोग राग में शुचिता का ध्यान देना नागरिकों का भी कर्तव्य है और जो लोग वहां महत्वपूर्ण दायित्वों पर बैठे हैं उनकी भी जिम्मेदारी है।
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